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Elgar Parishad Case: वरवरा राव की याचिका पर 19 जुलाई को सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के आदेश को दी है चुनौती 

Tue, 12 Jul 2022 12:50 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: प्रांजुल श्रीवास्तव Updated Tue, 12 Jul 2022 12:50 PM IST
सार

मेडिकल जमानत पर जेल से बाहर वरवरा राव को आज आत्मसमर्पण करना पड़ा। इलाज के लिए उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट से डिफॉल्ट जमानत मांगी थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।

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Elgar Parishad Case: Supreme Court to hear Varavara Rao's  permanent medical bail plea petition on July 19
वरवरा राव

विस्तार

भीमा कोरगांव-एल्गार परिषद मामले में वरवरा राव की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 19 जुलाई को सुनवाई करेगा। याचिका में बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें कोर्ट ने उनकी डिफाल्ट जमानत की अपील को खारिज कर दिया था। इसके साथ ही न्यायमूर्ति यू यू ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने मंगलवार को राव की अंतरिम सुरक्षा भी बढ़ा दी। बता दें,  83 वर्षीय वरवरा राव चिकित्सीय आधार पर जमानत पर थे। जबकि, अन्य दो कार्यकर्ता जेल में बंद हैं। 

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राव को करना पड़ा आत्मसमर्पण 
मेडिकल जमानत पर जेल से बाहर वरवरा राव को आज आत्मसमर्पण करना पड़ा। इलाज के लिए उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट से डिफॉल्ट जमानत मांगी थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस मामले को 19 जुलाई को पहले आइटम के रूप में पोस्ट किया जाए।
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सुधा भारद्वाज को मिली थी डिफॉल्ट जमानत
तीनों आरोपियों ने न्यायमूर्ति शिंदे की अगुवाई वाली पीठ द्वारा पारित 1 दिसंबर, 2021 के एक आदेश को चुनौती दी थी। इस मामले में सह-अभियुक्त वकील सुधा भारद्वाज को डिफाल्ट जमानत दी गई थी, लेकिन कुछ अन्य आरोपी व्यक्तियों को डिफॉल्ट जमानत से वंचित कर दिया गया था। तीनों याचिकाकर्ता भी इसी में शामिल हैं। उस समय हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा था कि भारद्वाज के अलावा अन्य आरोपियों ने कानून द्वारा निर्धारित समय के भीतर निचली अदालत के समक्ष डिफॉल्ट जमानत के लिए अपनी याचिका दायर नहीं की थी। 
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2017 का है मामला 
मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित 'एल्गार परिषद' सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित है। इसके बारे में पुणे पुलिस ने दावा किया था कि अगले दिन महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई थी। पुणे पुलिस ने दावा किया था कि कॉन्क्लेव को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था। मामले में एक दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को आरोपी बनाया गया है। केस को बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को स्थानांतरित कर दिया गया था। 

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