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एल्गार परिषद मामला: वरवरा राव व अन्य दो की जमानत याचिका खारिज, कोर्ट ने कहा- दोबारा समीक्षा की आवश्यकता नहीं

Wed, 04 May 2022 12:34 PM IST
प्रांजुल श्रीवास्तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: प्रांजुल श्रीवास्तव Updated Wed, 04 May 2022 12:34 PM IST
सार

कवि वरवरा राव, अरुण फरेरा और वर्नोन गोंजाल्विस की जमानत याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को खारिज कर दिया है। इस याचिका में उन्होंने डिफाल्ट जमानत से इनकार करने वाले आदेश की समीक्षा करने की मांग की थी।

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Elgar Parishad case: bail plea of Varavara Rao and two other,  dismissed by Bombay high court
वरवरा राव

विस्तार

एल्गार परिषद-माओवादी लिंक मामले में गिरफ्तार किए गए कवि वरवरा राव, अरुण फरेरा और वर्नोन गोंजाल्विस की जमानत याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को खारिज कर दिया है। इस याचिका में उन्होंने डिफाल्ट जमानत से इनकार करने वाले आदेश की समीक्षा करने की मांग की थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि उसके लिए यह कहना मुश्किल है कि उनके द्वारा पहले दिए गए फैसले में कोई तथ्यात्मक त्रुटि थी और इसकी समीक्षा की आवश्यकता है। न्यायमूर्ति एस एस शिंदे और एन जे जमादार की खंडपीठ ने कहा, दोबारा समीक्षा के लिए कोई मामला नहीं बनता है।

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गौरतलब है कि कवि वरवरा राव फिलहाल मेडिकल जमानत पर बाहर हैं, जबकि अन्य दो कार्यकर्ता जेल में बंद हैं। एनआईए का कहना था कि याचिका के माध्यम से आरोपी रिकॉर्ड के सत्यापन और मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के आदेश को बदलने की मांग कर रहे थे।
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तीनों आरोपियों ने न्यायमूर्ति शिंदे की अगुवाई वाली पीठ द्वारा पारित 1 दिसंबर, 2021 के एक आदेश को चुनौती दी थी। इस मामले में सह-अभियुक्त वकील सुधा भारद्वाज को डिफाल्ट जमानत दी गई थी, लेकिन कुछ अन्य आरोपी व्यक्तियों को डिफ़ॉल्ट जमानत से वंचित कर दिया गया था। तीनों याचिकाकर्ता भी इसी में शामिल हैं। उस समय हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए कहा था कि भारद्वाज के अलावा अन्य आरोपियों ने कानून द्वारा निर्धारित समय के भीतर निचली अदालत के समक्ष डिफॉल्ट जमानत के लिए अपनी याचिका दायर नहीं की थी। 
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मामला 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में आयोजित 'एल्गार परिषद' सम्मेलन में दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों से संबंधित है। इसके बारे में पुणे पुलिस ने दावा किया था कि अगले दिन महाराष्ट्र शहर के बाहरी इलाके में स्थित कोरेगांव-भीमा युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई थी।


पुणे पुलिस ने दावा किया था कि कॉन्क्लेव को माओवादियों का समर्थन प्राप्त था। मामले में एक दर्जन से अधिक कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों को आरोपी बनाया गया है। केस को बाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को स्थानांतरित कर दिया गया था।
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