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Lok Sabha Elections: पूर्वोत्तर में 25 सीटों पर रोचक सियासी समीकरण, दिल और दिल्ली से नजदीकियों का इम्तिहान

Fri, 12 Apr 2024 07:20 AM IST
निर्मल कांत डॉ. इन्दुशेखर पंचोली, अमर उजाला, नई दिल्ली
डॉ. इन्दुशेखर पंचोली, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 12 Apr 2024 07:20 AM IST
सार

Election Special: असम में बिहू की तैयारियों के साथ लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां भी रफ्तार पकड़ रही हैं। महिलाओं में जैसा उत्साह इस समृद्ध लोक-उत्सव के प्रति है, वैसा चुनाव के प्रति अभी सतह पर भले न दिखे, लेकिन पहले दौर के मतदान की तारीख नजदीक आने के साथ रंगत दिखने लगेगी। यह कहना है सोनितपुर की शिक्षिका कोकिला गोस्वामी का। वह कहती हैं, मामा (हिमंत बिस्व सरमा) की नाक नीचे नहीं होने देंगे।

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Election special: Political battle for 25 seats in North-East, test of heart and closeness to Delhi
लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर के प्रमुख चेहरे - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हर महीने की दस तारीख आते ही असम की 26 लाख से ज्यादा महिलाओं के बैंक खातों में अरुणोदय योजना के तहत 1,250 रुपये जमा हो जाते हैं। बीते साल सरकार ने 2.23 लाख महिलाओं के छोटे कर्ज माफ किए। इससे पहले, नौ लाख महिलाओं के 1,600 करोड़ के कर्ज भी माफ किए जा चुके हैं। 39 लाख स्वयं सहायता समूह की सदस्यों और ग्रामीण उद्यमी महिलाओं को महिला उद्यमिता अभियान में 10,000 रुपये की मदद दी जा रही है। ये लाभ जो केंद्रीय योजनाओं के अतिरिक्त हैं, बताते हैं कि पूरे देश की तरह असम में भी भाजपा सरकार ने निजी लाभार्थियों का नया समूह खड़ा कर लिया है। यही भाजपा में नए मामा मुख्यमंत्री के उदय का आधार बना है। असम में सीएम हिमंत बिस्व सरमा की यह नई पहचान है। महिलाएं-बेटियां ही नहीं, अधिसंख्य युवा व बुजुर्ग भी उन्हें मामा के नाम से संबोधित करते हैं। नलबाड़ी के बुजुर्ग रामशरण दास से जब सवाल होता है कि वह तो आपके बेटे की उम्र के हैं? जवाब आता है, वह अब सबके मामा हैं।

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इतना भर ही नहीं है। सालों तक परेशानी का बायस बने रहे बाहरी बनाम असमी मुसलमानों के विवाद के बीच, सरकार ने 2022 में पांच सह-मुस्लिम समूहों को स्थानीय का दर्जा दिया। उन्हें पूर्वी-बंगाल के प्रवासी मुसलमानों से अलग पहचान मिली है। यह एक ऐसा कदम है, जिससे भाजपा को लोकसभा संग्राम-2024 में खासा लाभ मिलने का भरोसा है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिला मतदाताओं को लुभाने में भाजपा ने कोई कमी नहीं छोड़ी है। यह बताता है कि भाजपा के लिए असम कितना महत्वपूर्ण है।
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पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की 25 में से 14 लोकसभा सीट इसी असम में हैं। बीते आम चुनाव में भाजपा ने एनडीए के जरिये इनमें से 18 सीट पर कब्जा जमाया था। अब मुख्यमंत्री सरमा का दावा है, इस बार 22 सीट जीतेंगे। इनमें 16 भाजपा की होंगी। 
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भाजपा का दावा यह भी है। ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट और इंडिया-गठबंधन के बीच प्रवासी मुसलमानों के वोट बंटेंगे। फ्रंट ने पिछले चुनाव में बदरुद्दीन अजमल के नेतृत्व में एक सीट जीती थी, तो एक-एक सीट एमएनएफ और निर्दलीय, जबकि चार सीटें कांग्रेस के पास गई थीं।

भाजपा मुसलमान मतदाताओं के एक वर्ग को लेकर आशान्वित भी है। हालांकि, बिस्व सरमा कहते हैं कि उन्हें बंगाली मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए। अलबत्ता मुसलमान महिलाओं के 10% तक वोट मिलने की उम्मीद उन्हें भी है। बीते साल सीएए विरोध के बीच नेल्ली नरसंहार के 40 वर्ष पूरे हुए थे, तो वह मुद्दा बना था। इस बार, चुनावी वर्ष होने के बावजूद इसकी चर्चा नहीं है। मतदाताओं के बीच पीएम आवास योजना, स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम, उज्ज्वला योजना पर ज्यादा बात हो रही है। बीते साल हुए परिसीमन के बाद यह पहला चुनाव है...जो भाजपा के लिए फायदेमंद दिख रहा है। सीएम बिस्व सरमा मानते हैं कि स्थानीय समुदायों को इससे निर्णायक राजनीतिक भूमिका मिलेगी।

परिसीमन का सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस के गौरव गोगोई को हुआ। उनकी कलियाबोर सीट ही खत्म हो गई। चुनाव लड़ने उन्हें जोरहाट जाना पड़ा। सिलचर सामान्य से एससी सीट हो गई। तेजपुर का नाम सोनितपुर कर दिया गया है। गुवाहाटी में भाजपा पहले से ही मजबूत थी, बाकी सीटों पर भी उसे मजबूती मिली है। डिब्रूगढ़ में केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को कोई परेशानी नहीं है। हालांकि राज्य की सियासत में बदरुद्दीन अजमल अब भी असरदार बने हुए हैं।

मणिपुर: संघर्ष से बढ़ीं भाजपा की मुश्किलें
मैतेई और कुकी समुदायों के बीच 3 मई, 2023 से शुरू हुए हिंसक संघर्ष ने भाजपा के लिए पूर्वोत्तर में चुनौती खड़ी की है। सुरक्षा बलों से लूटे गए 5,000 हथियार हिंसक संघर्ष को बढ़ा रहे हैं। हजारों परिवार विस्थापित हैं। कई लोगों के पास अपने पहचान पत्र नहीं हैं। वे मतदान को लेकर आश्वस्त भी नहीं हैं।

मणिपुर में राहुल गांधी दो बार आ चुके हैं। जिसका वोटर्स में सकारात्मक असर है। मतदान से पहले पीएम नरेंद्र मोदी भी दौरा कर सकते हैं। बाहरी सीट पर दो चरणों में मतदान होगा, जो पहली बार हो रहा है। भाजपा ने यह सीट सहयोगी नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) को दी है। जबकि, मणिपुर इनर सीट से केंद्रीय मंत्री आरके रंजन सिंह का टिकट काटकर राज्य में मंत्री बसंत सिंह को उतारा है।

मुक्त आवागमन व्यवस्था का अंत, असर मिलाजुला
मणिपुर हिंसा के बाद भारत-म्यांमार सीमा के आरपार मुक्त आवागमन व्यवस्था (एफएमआर) को गृह मंत्रालय ने खत्म कर दिया। माना जा रहा है, इसका मणिपुर के साथ मिजोरम और नगालैंड की एक-एक लोकसभा सीट पर व्यापक असर हो सकता है। मणिपुर सरकार एफएमआर को उपद्रवियों और मादक पदार्थ तस्करों के लिए मददगार मानती थी, लेकिन कुकी संगठनों और मिजोरम-नगालैंड के कुछ संगठनों ने इस फैसले का विरोध किया है। नगालैंड में सर्वदलीय सरकार है। भाजपा ने यहां मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो के दल नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के उम्मीदवार को उतारा है।

कुल सीट-2
2019 के नतीजे: भाजपा-1, एनपीएफ-1

असम: बड़े आंदोलनों की जन्मभूमि है ऊपरी असम
समृद्धि, राजनीति को किस तरह ललचाती है, इसकी मिसाल ऊपरी असम है। यह इलाका राज्य की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करता है। चाय बागान व तेल इस क्षेत्र की पहचान हैं। यह क्षेत्र कभी टिम्बर के कारोबार का गढ़ हुआ करता था। यहीं लखीमपुर, डिब्रूगढ़ और जोरहाट सीटें हैं। इसी इलाके में असमी अस्मिता बड़ा मुद्दा बना। मूल असमियों के साथ जनजातीय, टी ट्राइब्स, हिंदी भाषी, नेपाली और मारवाड़ी यहीं बसे हैं। यहां तीन बड़े आंदोलन हुए है। 1979-85 के बीच छात्र आंदोलन हुआ, उल्फा की हिंसा से प्रभावित क्षेत्र भी यही था और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में जबरदस्त आंदोलन भी इसी इलाके में हुआ।

आंदोलनों का चरित्र चुनावी सियासत से मेल नहीं खाता, लिहाजा पिछले विस चुनाव में सीएए विरोधी आंदोलन के बावजूद भाजपा ने वापसी की। सीएए का असर इसी इलाके में पड़ने के बावजूद आम चुनावों से पहले राज्य सरकार उग्र विरोध थामने में सफल रही। दूसरी तरफ, बराक घाटी क्षेत्र है, जहां बंगाली हावी हैं। असम आंदोलन का विरोध यहीं से हुआ। राज्य की सियासत में भाजपा की एंट्री भी यहीं से हुई। एनआरसी में कवर न हो पाने वाले करीब चार लाख हिंदुओं को सीएए से लाभ मिलने की उम्मीद है।

कुल सीट-14
2019 के नतीजे : भाजपा 9, कांग्रेस 3, AIUDF 1, अन्य 1

बांग्लाभाषी मुसलमानों का दबदबा घटेगा
राज्य में जो 1.26 लाख संदिग्ध मतदाता हैं, उनमें हिंदू बंगाली भी काफी हैं। सीएए उन इलाकों में लागू नहीं होगा, जहां छठे शेड्यूल की काउंसिल हैं। असम में कार्बी-आंग्लोंग, उत्तरी कछार हिल्स, बॉर्डर लैंड, प्रादेशिक काउंसिल सीएए से अप्रभावी रहेंगे। मिजोरम और मेघालय की तीन क्षेत्रीय परिषदें इससे बाहर हैं। नगालैंड, अरुणाचल, मणिपुर, त्रिपुरा व सिक्किम के एक हिस्से में ही सही, इसका असर जरूर होगा।

जम्मू-कश्मीर के बाद सर्वािधक करीब 34% मुसलमान असम में हैं। इनमें से 4 फीसदी ही असम के मूल निवासी हैं। बाकी बांग्लाभाषी मुसलमान हैं, जो बाहरी हैं और भाजपा विरोधी रहे हैं। एक समय वे कांग्रेस के साथ थे, अब बदरुद्दीन अजमल की पार्टी का आधार हैं। नगांव, बरपेटा, धुबरी, कलियाबोर व करीमगंज लोकसभा सीटों पर बंगाली मुसलमान निर्णायक हुआ करते थे। परिसीमन के बाद वे नगांव और धुबरी में सीमित रह गए, कुछ करीमगंज में समायोजित हो गए।

यह रोचक है, बरपेटा सीट पर जहां पूरी तरह बंगाली मुसलमान हार-जीत का फैसला करते थे, वहां इस बार गैर मुस्लिम प्रत्याशियों में मुख्य मुकाबला है। कांग्रेस पिछली बार बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन में थी, तो तीन सीटें जीतने में कामयाब रही थी। इस बार गठबंधन ही नहीं हो पाया।

मेघालय : एनडीए ने सीएम संगमा को सौंपी कमान
यहां की दो सीटों, शिलांग व तुरा में कई दल आमने-सामने हैं। शिलांग में नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी), कांग्रेस, वॉइस ऑफ पीपल पार्टी, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी, हिल स्टेट पीपल डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रत्याशी उतारे हैं। वाॅइस ऑफ पीपल पार्टी बाहरियों और हिंदी विरोध के मुद्दे पर पनपी है। उसके विधायकों ने सदन में हिंदी में अभिभाषण देने पर राज्यपाल से मूल प्रति छीन ली थी। भाजपा ने ये सीटें एनपीपी को दे दी हैं। एनपीपी ने दोनों पर महिला प्रत्याशी उतारे हैं। तुरा पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा की परंपरागत सीट है, जो 1991 से संगमा परिवार के पास ही है। उनके बेटे कॉनराड संगमा सीएम हैं और सांसद बेटी अगाथा संगमा फिर किस्मत आजमा रही हैं। विरासत की दौड़ में अगाथा के सामने दोनों उम्मीदवार संगमा ही हैं। बीते चुनाव में, अगाथा से हारे पूर्व सीएम मुकुल संगमा ने भाई जेनिथ को तृणमूल से उतारा है। वहीं, कांग्रेस सालेंग संगमा के भरोसे है।

कुल सीट-2
2019: कांग्रेस-1, एनपीपी-1

अरुणाचल : कांग्रेस की चुनौती
अरुणाचल प्रदेश : पूरब और पश्चिम दो सीटें हैं। भाजपा के क्रमश: तापिर गाओ व केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू सांसद हैं। दोनों इस बार भी उम्मीदवार हैं। रिजिजू का सामना कांग्रेस के नबाम तुकी से और गाओ का कांग्रेस के ही बोसीराम सिरम से होगा। यहां विधानसभा चुनाव भी साथ ही हो रहे हैं, जिनमें भाजपा 10 सीटें पहले ही निर्विरोध जीत चुकी है।

नगालैंड: इकलौती सीट अभी भाजपा की सहयोगी नेशनल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के पास है। एनडीपीपी से डॉ. चुम्बेन मुरी और कांग्रेस से एसएस जमीर किस्मत आजमा रहे हैं।

मिजोरम: नई और सत्ताधारी पार्टी जोरम पीपल्स मूवमेंट ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने मिजो नेशनल फ्रंट को हराया था।

सिक्किम: इकलौती सीट सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा के पास है। मोर्चा के इंद्रा हैंग सुब्बा फिर प्रत्याशी हैं। उनका मुकाबला भाजपा के दिनेशचंद्र नेपाल व सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रत्याशी से होगा। यहां भी विस चुनाव हो रहे हैं।

त्रिपुरा: भाजपा को विपक्ष का साथ
राज्य में दो लोकसभा सीटें हैं। 2019 में दोनों भाजपा के खाते में गई थीं। इस बार उसे प्रमुख विपक्षी दल टिपरा मोथा पार्टी का समर्थन है। इसका नेतृत्व त्रिपुरा के पूर्व शाही परिवार के प्रमुख प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा कर रहे हैं। वे त्रिपुरा की स्थानीय आबादी की पहचान, इतिहास, संस्कृति और भाषा का संरक्षण चाहते हैं। सामने कांग्रेस और माकपा गठबंधन है। दोनों एक-एक सीट आपस में बांट भाजपा और सहयोगियों का मुकाबला करेंगे। भाजपा ने यहां पूर्व सीएम विप्लव देब और पूर्व महारानी कृति सिंह देबबर्मा को अवसर दिया है।

पिछले चुनावों में किस दल को कितनी सीटें


विकास परियोजनाओं से बदल रही तस्वीर
भाजपा ने भरोसेमंद सहयोगियों के साथ दो दशक में पूर्वोत्तर में जनाधार खासा बढ़ाया है। 2004 व 2009 में जहां पार्टी के 4 सांसद थे, 2014 में दोगुने हुए और 2019 में 14 पर पहुंच गए। सहयोगी दलों के सांसदों के साथ एनडीए की ताकत 18 तक पहुंची है।


मणिपुर की नस्ली हिंसा ने जरूर देश को बेचैन किया। अलबत्ता संस्थागत उपेक्षा की समाप्ति के साथ विदेशी घुसपैठ, उग्रवाद, राज्यों के आपसी सीमा विवाद, सशस्त्र संघर्ष के दौर से पूर्वोत्तर के राज्य बाहर आए हैं। आधारभूत विकास परियोजनाओं से इन राज्यों की तस्वीर बदल रही है। दस वर्षों में 11 शांति समझौतों पर दस्तखत हुए हैं। यहां  2014 से अब तक 9,500 से अधिक विद्रोहियों ने आत्मसमर्पण किया है। उग्रवाद की घटनाओं में भी 71% की कमी आई है।

बेशक, पीएम नरेंद्र मोदी को इसका श्रेय जाता है। दस साल में पूर्वोत्तर को भारत का प्रवेशद्वार बनाने की सफल कहानी में दम है। कांग्रेस छोड़ भाजपा के चहेते बने नेता आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस की केंद्र सरकारों ने हमारी सरकारों को भ्रष्ट और कंगाल बनाने में कमी नहीं छोड़ी।

वे कहते हैं, केंद्र की मोदी सरकार ने विकास के लिए खजाने का मुंह खोल दिया है। पिछली सरकारों ने एक लाख 62 हजार करोड़ दिए, जबकि एनडीए सरकार 10 साल में चार लाख 15 हजार करोड़ दे चुकी है। पीएम मोदी कहते हैं कि पूर्वोत्तर न तो दिल्ली से दूर है और न ही दिल से। जाहिर है, यह चुनाव इन्हीं नजदीकियों का बड़ा इम्तिहान है।

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