Election Results: कांग्रेस के ‘अति आत्मविश्वास’ की हार, अब मुख्यमंत्री तो फिर से वही अनुभवी चेहरे होंगे
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तीन अहम राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की धमाकेदार जीत ने यह साबित कर दिया है कि कांग्रेस की तमाम मेहनत और जीत के अति आत्मविश्वास को जनता ने एक बार फिर नकार दिया है। तेलंगाना को लेकर बेशक कांग्रेस खुश है, लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे अपने दो महत्वपूर्ण राज्यों को गंवाने के पीछे वहां की जनता में सरकार के खिलाफ नाराज़गी और मोदी के चेहरे का जादू फिर से दिखाई दे रहा है। अमित शाह की यह रणनीति भी जबरदस्त रूप से काम आई कि तमाम सीटों पर मौजूदा सांसदों को मैदान में उतार कर उनके प्रभाव वाली दूसरी विधानसभा सीटों पर भी अपना मजबूत जनाधार दिखाया जाए। अब मुख्य तौर पर सवाल मुख्यमंत्री को लेकर उठ रहे हैं कि क्या मध्यप्रदेश, राजस्थान औऱ छत्तीसगढ़ में भाजपा किसे ताज पहनाएगी।
यह बात मीडिया में लगातार उठ रही थी कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को लेकर पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बहुत खुश नहीं है और हो सकता है कि इस बार शिवराज सिंह को कोई केंद्रीय भूमिका में लाकर वहां किसी नए चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया जाए। लेकिन ऐसा लगता नहीं है। पार्टी ने बेशक चुनाव से पहले मुख्यमंत्री के चेहरे के बगैर अपनी रणनीति बनाई हो औऱ मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा हो, लेकिन चुनाव में जिस तरह बंपर जीत उसे मिली है, उसमें पार्टी भी शिवराज सिंह चौहान को नकार कर नहीं चल सकती। शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बेशक पिछला चुनाव भाजपा नहीं जीत पाई, लेकिन चंद ही महीनों में ज्योतिरादित्य सिंधिया को अपने साथ लाकर शिवराज सिंह चौहान ने जिस तरह फिर से अपनी सरकार बना ली, वह भाजपा नेतृत्व दरकिनार नहीं कर सकता। साथ ही जिस तरह अपनी योजनाओं से शिवराज की महिलाओं में लोकप्रियता और एक पारिवारिक छवि है, उसे भी नकारा नहीं जा सकता। जाहिर है शिवराज सिंह चौहान की ही इस बार भी सबसे मजबूत दावेदारी साबित हो रही है। बेशक अभी भी कई नाम लिए जा रहे हों, लेकिन फिलहाल उम्मीद यही है कि पार्टी शिवराज सिंह चौहान को ही एक बार फिर यह ताज पहनाएगी।
दूसरी तरफ, राजस्थान की बात की जाए तो वहां भी वसुंधरा राजे सिंधिया के अलावा भाजपा के लिए किसी और को सत्ता सौंपना आसान नहीं होगा। बेशक वहां भी वसुंधरा को लेकर मीडिया में यही कहा गया कि पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज किया, उनके चेहरे पर चुनाव नहीं लड़ा और दीया कुमारी समेत गजेंद्र सिंह शेखावत जैसे नेताओं के नाम को प्रमुखता से उठाया गया। लेकिन पार्टी नेतृत्व के लिए बतौर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दरकिनार कर पाना आसान नहीं है। वसुंधरा के तेवर को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं और मोदी से उनकी नाराज़गी की चर्चा भी होती रही है, इसके बावजूद वसुंधरा ने इस बार कभी कोई तेवर नहीं दिखाए औऱ चुपचाप अपना काम करती रहीं। जाहिर है उनके कद को पार्टी को कम से कम अब नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। बेशक राजस्थान की जनता को एक बार फिर वसुंधरा के सिर पर ही ताज नजर आ रहा है। चुनाव बेशक मोदी के चेहरे पर लड़ा गया हो, लेकिन प्रदेश के लिए फिलहाल वसुंधरा ही सबपर भारी नजर आ रही हैं।
छत्तीसगढ़ की बात की जाए, तो बेशक वहां भूपेश बघेल अति आत्मविश्वास का शिकार हुए हैं। कांग्रेस के लिए और खासकर भूपेश बघेल के लिए यह एक सदमे वाली खबर है। लेकिन क्या भाजपा के लिए यहां मुख्यमंत्री का चेहरा चुनना मुश्किल होगा। क्या एक बार फिर रमन सिंह को यहां की बागडोर सौंपी जाएगी या फिर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण साव या नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल को आगे लाया जाएगा। लेकिन रमन सिंह की क्षमता और उनके अनुभव को लेकर भाजपा नेतृत्व कोई असमंजस में नहीं दिखता। ऐसे में अब भी यही लगता है कि भाजपा मुख्यमंत्री के तौर पर रमन सिंह को ही एक बार फिर मौका दे सकती है।
ऐसी स्थिति में बेशक एक बार फिर वही तीन अहम चेहरे एक बार फिर मुख्यमंत्री के तौर पर सामने नजर आ रहे हैं, जिनपर जनता पहले भी भरोसा जता चुकी है। जाहिर है कि प्रशासनिक अनुभव के साथ साथ कुछ ही महीनों बाद होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी फिलहाल कोई जोखिम लेना उचित नहीं समझेगी और इन्हीं चेहरों पर भरोसा करेगी। इन तीन राज्यों में पार्टी की जीत से यह साबित हो चुका है कि फिलहाल कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं है और इंडिया गठबंधन के आकार लेने के बाद से उसके लिए स्थितियां और बिगड़ी हैं। यह भी कहा जा रहा है कि अगर कांग्रेस अपनी ताकत अकेले दम पर बढ़ाने की कोशिश करे, तो शायद उसे कुछ फायदा हो भी सकता है। तेलंगाना में उसकी कामयाबी यही बताती है। लेकिन फिलहाल तीन अहम राज्यों में जिस तरह कांग्रेस ने अपनी जमान खोई है और अति आत्मविश्वास का शिकार हुई है, इससे खामोशी से काम कर रही भाजपा ने जबरदस्त कामयाबी हासिल की है।
चुनावी विश्लेषण होते रहेंगे। मुद्दे की बात होती रहेगी साथ ही रणनीतिक तौर पर पार्टियां और मीडिया के महारथी अपना अपना गणित बताते रहेंगे, लेकिन इन नतीजों ने यह बात फिर से साफ कर दी है कि 2024 में एक बार फिर भाजपा जबरदस्त बहुमत के साथ सत्ता में लौटने वाली है। अब न तो कांग्रेस और न ही इंडिया गठबंधन उसके लिए कोई बड़ी चुनौती की तरह रहने वाला है। जाहिर है ऐसे वक्त में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की चिंता बढ़ गई है कि क्या उत्तर भारत में उनकी स्वीकारोक्ति उतनी नहीं हो पा रही है या राहुल गांधी या प्रियंका गांधी को अब भी जनता गंभीरता से नहीं ले रही है? बेशक कांग्रेस के लिए यह गंभीर आत्ममंथन का वक्त है। उसे यह भी समझ लेना चाहिए कि अब भी मोदी मैजिक खत्म नहीं हुआ है, जनता के दिमाग में अब भी मोदी का विकल्प कोई और नजर नहीं आ रहा है। इस जादू को तोड़ना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है और यह एक बड़ी चुनौती के तौर पर अगले कुछ महीनों तक बनी रहेगी।