ED raids: जांच एजेंसियों के निशाने पर विपक्ष! क्या सियासत में कोई बड़ा गुल खिलाएगी यह छापेमारी
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विस्तार
दिल्ली से लेकर हैदराबाद और पटना तक एजेंसियों के निशाने पर विपक्ष के बड़े-बड़े नेता आ गए हैं। इसी छापेमारी के दौरान विपक्षी नेताओं का समूह एकजुट होकर सत्ता पक्ष के विरोध में बड़ा धड़ा बनाने में लगा है। फिलहाल केसीआर की मुहिम पर खड़ा हो रहा विपक्ष तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र तक की बड़ी बड़ी रैलियां कर चुका है। इसी कड़ी में शुक्रवार को जंतर-मंतर पर भी 14 बड़े विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन भी शुरू हुआ। हालांकि विपक्षी दलों के इस समूह में फिलहाल दूर-दूर तक कांग्रेस तो नजर नहीं आ रही है। लेकिन सियासी गलियारों में चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या एजेंसियों की छापेमारी से विपक्ष को कोई सियासी रूप से फायदा हो पाएगा या नहीं।
विपक्ष के नेता लगातार हमलावर
बीते कुछ समय से केंद्रीय एजेंसियों का शिकंजा हैदराबाद से लेकर पटना और दिल्ली में जमकर कसा जा रहा है। इन एजेंसियों ने आम आदमी पार्टी के दूसरे नंबर के सबसे बड़े नेता और दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जेल के पीछे पहुंचा दिया। आम आदमी पार्टी के ही पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन पहले से ही जेल में हैं। दिल्ली की एक्साइज पॉलिसी मामले में आम आदमी पार्टी से लेकर हैदराबाद में बीआरएस की बड़ी नेता और केसीआर की बेटी कविता से भी जांच एजेंसियां पूछताछ कर रही हैं। सिर्फ दिल्ली और हैदराबाद में आम आदमी पार्टी और बीआरएसी नहीं बल्कि बिहार की राजनीति के माहिर लालू यादव पर भी जांच एजेंसियों ने शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। केंद्रीय जांच एजेंसियों की छापेमारी को लेकर विपक्ष के नेता लगातार हमलावर रहे हैं। मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद ही विपक्ष के ज्यादातर नेताओं ने न सिर्फ केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग की बात की बल्कि प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी भी लिखी।
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सियासी जानकारों का कहना है कि जांच एजेंसियों के शिकंजा कसने से ही विपक्ष के नेता एकजुट हो रहे हैं। विपक्ष के नेताओं का लगातार यह आरोप रहा है कि केंद्र जांच एजेंसियों के माध्यम से उनके ऊपर न सिर्फ दबाव डालता है, बल्कि विपक्ष को कमजोर करने के लिए जेल भी भेज रहा है। मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव से लेकर कांग्रेस के नेताओं ने विरोध जताया। प्रधानमंत्री मोदी को जो चिट्ठी लिखी गई, उसमें सभी प्रमुख नेताओं ने जांच एजेंसियों की कार्यवाही पर आपत्ति जताई थी। राजनीतिक विश्लेषक ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि बीते कुछ समय से जिस तरीके से सियासत में विपक्षी एकजुटता बढ़ी है, वह किसी न किसी तरीके से भाजपा को मात देने के लिए ही एकजुट हो रही है। भले ही इसके पीछे वजह जांच एजेंसियों की कार्रवाइयां रहीं हों। हालांकि वह यह चिंता जरूर जाहिर करते हैं कि विपक्षी एकजुटता तो दिख रही है, लेकिन क्या यह 2024 के चुनावों तक कायम रह पाएगी या नहीं, यही देखना सबसे ज्यादा दिलचस्प होगा।
बड़ा मोर्चा बनाने की तैयारी
जिस तरीके से केसीआर ने विपक्ष को एकजुट करना शुरू किया है, ठीक उसी तरह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी पिछले साल विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम शुरू की थी। इसे लेकर तृणमूल कांग्रेस ने दिल्ली में एक बड़ी बैठक भी की। बैठक में पहले से तय विपक्षी दलों के कुछ नेता शामिल हुए, तो कुछ नहीं शामिल हुए थे। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि उस वक्त विपक्षी नेताओं को जोड़ने की ममता बनर्जी की मुहिम को झटका लगा था। हालांकि उसके बाद ममता बनर्जी ने दिल्ली में विपक्षी नेताओं को जोड़ने की कोई बड़ी बैठक नहीं की, लेकिन अंदर ही अंदर सभी प्रमुख विपक्षी दल आपस में लगातार बातचीत करते रहे। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार सुदर्शन कहते हैं कि अब जब लगातार विपक्षी नेताओं पर जांच एजेंसियों की छापेमारी हो रही है और पूछताछ के लिए बुलाया जा रहा है, तो सभी विपक्षी दल एकजुट होकर बड़ा मोर्चा बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
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राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा हो या केसीआर की तेलंगाना में आयोजित की गई रैली। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्मदिन पर विपक्षी नेताओं का जमावड़ा हो या लालू यादव पर हो रही छापेमारी और सिसोदिया की गिरफ्तारी में विपक्षी नेताओं का एकजुट होकर बोलना। ऐसे सियासी माहौल को देखते हुए अनुमान यही लग रहा है कि 2024 से पहले सभी विपक्षी एक साथ एकजुट होंगे। लेकिन इसमें सबसे बड़ा संशय कांग्रेस और जेडीयू के जुड़ने और न जुड़ने का बना हुआ है। सुदर्शन कहते हैं कि केसीआर की रैली में भले ही आरजेडी से कोई ना पहुंचा हो, लेकिन उस रैली में शामिल हुए अखिलेश यादव के साथ तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन के जन्मदिन पर आयोजित हुए कार्यक्रम में तेजस्वी यादव भी पहुंचे थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि स्टालिन के जन्मदिन पर आयोजित हुए कार्यक्रम में कांग्रेस के भी नेता शामिल थे। जो भविष्य की राजनीति की और कुछ इशारे कर रहे थे।
कांग्रेस को लेकर संशय बरकरार
हालांकि जिस तरीके से आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद कांग्रेस ने अपना रवैया अपनाया है, यह कुछ और ही इशारा कर रहा है। कांग्रेस के कुछ नेताओं खासकर राज्य स्तर के प्रवक्ता आम आदमी पार्टी पर हुई इस कार्रवाई का विरोध करने की वजह उनकी करनी का फल बता रहे हैं। जबकि कांग्रेस के बड़े नेताओं की ओर से किए गए ट्वीट में जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर सवालिया निशान उठाया गया है। राजनीतिक विश्लेषक ओम प्रकाश मिश्रा कहते हैं कि विपक्षी नेताओं के एकजुट होने में सबसे बड़ा बैरियर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी का भी उठता रहा है। क्योंकि ज्यादातर प्रमुख बड़ी पार्टियों के नेता प्रधानमंत्री पद के चेहरे और दावेदारी में आगे रहे हैं। हालांकि विपक्षी दलों को एकजुट करने वाले नेताओं में शामिल एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि प्रधानमंत्री पद के चेहरे की बात अब दूर की बातों में शामिल है। सभी विपक्षी दलों को एकजुट करके 2024 में लोकसभा चुनावों की रणनीति बनाने की तैयारी की जा रही है।