ED Director Sanjay Mishra: याचिकाकर्ता विनीत नारायण बोले- अगर ईडी चीफ सही फैसले लेते तो आज यह नहीं होता
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विस्तार
सत्ता के गलियारों से लेकर बाबूशाही के गलियारों तक सबसे ज्यादा चर्चा इस वक्त सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की है, जिसमें देश के सबसे ताकतवर एजेंसी ईडी निदेशक संजय मिश्रा के तीसरे कार्यकाल को अवैध घोषित किया है। संजय मिश्रा के मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले विनीत नारायण कहते हैं कि जो फैसला आया है वह बहुत सीमित है। उन्होंने अपनी याचिका में एक प्रतिवेदन भी किया है, जिसमें हर तीन महीने पर प्रवर्तन निदेशालय में दर्ज होने वाली एफआईआर और लिए गए फैसलों के साथ की जाने वाली कार्रवाई की प्रगति रिपोर्ट भी देश के सामने रखी जानी चाहिए। फिलहाल उनका कहना है कि संजय मिश्रा जिस तरीके से ईडी निदेशक के तौर पर काम रहे थे, उस को ध्यान में रखकर ही उन्होंने जनहित याचिका दायर की थी। अमर उजाला डॉट कॉम से हुई विशेष बातचीत में विनीत नारायण ने याचिका दाखिल करने से लेकर हवाला मामले में 'विनीत नारायण फैसले' पर भी बातचीत की।
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इसलिए दाखिल हुई थी संजय मिश्रा के कार्यकाल पर याचिका
ईडी के निदेशक संजय मिश्रा के तीसरे मिले कार्यकाल को लेकर जनहित याचिका करने वाले विनीत नारायण कहते हैं कि संजय मिश्रा ईडी निदेशक के नाते अपने पूरे कार्यकाल में और विशेषकर जो उनको तीन साल का उनको सेवा विस्तार मिला, उसमें जिस तरह काम कर रहे थे वह सर्वोच्च न्यायालय के विनीत नारायण फैसले और सीवीसी एक्ट समेत कॉमन कॉज के अनुरूप नहीं था। विनीत नारायण कहते हैं कि यही वजह रही कि ईडी निदेशक संजय मिश्रा के कार्यकाल को उन्होंने जनहित याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। वह कहते हैं कि इससे पहले उन्होंने हवाला कांड के दौरान एक याचिका दाखिल की थी। याचिका के आधार पर आए फैसले से दिसंबर 1997 में एक्ट बनाया गया था। जिसके तहत जांच एजेंसियों में अपॉइंटमेंट से लेकर उनकी जिम्मेदारियों तक का निर्देश दिया गया था।
निष्पक्षता से जांच करते तो यह सवाल न उठते
जनहित याचिका करने वाले विनीत नारायण का कहना है कि अगर संजय मिश्रा निष्पक्षता से हर उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करते, जिसमें ईडी को शक होता है या अपराध के प्रमाण होते हैं। तब जरूर उनके सेवा विस्तार के गैरकानूनी होने के बाद भी यह कहा जा सकता है कि वह निष्पक्षता से कार्रवाई कर रहे हैं। याचिकाकर्ता विनीत नारायण का कहना है कि अपने अवैध कार्यकाल के दौरान उन्होंने जितने लोगों को नोटिस भेजे, छापे मारे या कार्यवाइयां की, उनमें अधिकांश विपक्षी दलों के नेता शामिल थे। उनका कहना है कि ईडी जिन विपक्षी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर रही थी, वह जब सत्ता पक्ष में शामिल हो गए, तो उनके खिलाफ की जाने वालीं कार्रवाई रोक दी गईं। विनीत नारायण का आरोप है कि इस तरीके से ईडी की ओर से को जाने वाली कार्रवाइयों से शक होता है कि देश की प्रमुख एजेंसी के जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति की मंशा क्या है। इसी सब को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जनहित याचिका दायर कर उनके सेवा विस्तार को चुनौती दी थी।
कांग्रेस नेताओं की याचिका को बताया गया था राजनीति से प्रेरित
जनहित याचिका दाखिल करने वाले विनीत नारायण कहते हैं कि उनकी ही तरह की याचिका कांग्रेस के नेताओं की ओर से भी दाखिल की गई थी। उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में बहस के दौरान कांग्रेस नेताओं की याचिका पर सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी थी कि उनकी याचिका अपने नेताओं के खिलाफ चल रही कार्यवाही से प्रेरित है। उनका कहना है कि इस बहस के दौरान विनीत नारायण और कॉमन कॉज की ओर से दायर की गई जनहित याचिका को वैध बताया गया था।
हर तीन माह में ईडी की कार्रवाई का मूल्यांकन भी होना चाहिए
वह कहते हैं कि अभी जो फैसला आया है वह बहुत ही सीमित है। क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में एक प्रतिवेदन किया था कि जब सुप्रीम कोर्ट के द्वारा यह निर्देश देते हुए एक्ट बनाया गया था, तो उसमें यह भी प्रावधान था कि ईडी कि जो कार्रवाई करे उसका हर तीन महीने पर मूल्यांकन भी हो। इसमें कितने मामले दाखिल हुए, जांच कैसे हुई, कितनी एफआइआर हुईं, कितने सुबूत जुटाए गए और उसमें क्या कार्रवाई की गई, इन सब का भी जिक्र होना जरूरी है। विनीत नारायण कहते हैं कि अपनी जनहित याचिका में इस तरीके के किए गए प्रतिवेदन में उन्होंने मांग की थी कि बीते पांच साल में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से की गई ऐसी सभी जानकारियों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वह कहते हैं कि अभी इस मामले में आगे और भी कई बड़ी कार्रवाई होंगी। विनीत नारायण का कहना है कि ऐसे मामलों में लगातार कानूनी लड़ाई लड़ते रहेंगे।