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आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 सरकार ने खींचीं अर्थव्यवस्था की खूबसूरत तस्वीर

Tue, 30 Jan 2018 01:57 PM IST
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली
शरद गुप्ता, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 30 Jan 2018 01:57 PM IST
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economic survey have given the beautiful picture of economy
बजट

संसद में सोमवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में इस बात के कोई संकेत नहीं मिले कि इस बार का केंद्रीय बजट कैसा होगा। यह जरूर बताया गया कि जीडीपी की मौजूदा विकास दर को देखने से जाहिर है कि देश अब जीएसटी और नोटबंदी जैसे कड़े फैसलों के असर से बाहर निकल आया है। केंद्रीय बजट से दो दिन पहले सरकार के आर्थिक विभाग द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला आर्थिक

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सर्वेक्षण दरअसल न सिर्फ पिछले एक साल के आर्थिक कामकाज का लेखा-जोखा होता है बल्कि उसमें सरकार को अर्थव्यवस्था में सुधार के उपाय भी बताए जाते हैं। इन्हीं उपायों और सलाह की झलक अकसर बजट में मिलती है। लेकिन इस बार आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार की कसीदे ज्यादा पढ़े गए हैं। बताया गया कि किस तरह देश नोटबंदी और जीएसटी के असर से बाहर आ चुका है और उसकी विकास दर अगले वर्ष 7-7.5 फीसदी रहने की संभावना है। बचत घाटा पिछले तीन सालों में 3.9 प्रतिशत से घटकर 3.2 फीसदी पर आ गया है। सरकारी बैंकों को दिए गए पैकेज से उनकी हालात बेहतर हुई है और इंडियन बैंकरप्सी कोड एक बडा सुधारवादी कदम है।
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सर्वेक्षण में किसानों की आर्थिक हालात पर चिंता भी जताई गई। इस बार 27.6 करोड टन खाद्यान्न का रिकॉर्ड पैदावार हुआ है जो पिछली बार के मुकाबले लगभग चार फीसदी ज्यादा है। आलू की फसल पिछले साल के मुकाबले 11 प्रतिशत बेहतर हुई है। दूध मछली और मांस के पैदावार में हम दुनिया में हम पहले नंबर पर हैं। लेकिन सर्वे में यह नहीं बताया गया कि इसके बावजूद किसानों की हालत सुधारने के लिए सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए।
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सर्वेक्षण में यह चिंता जताई कि कम कीमत पर पॉवर परचेस अग्रीमेंट होने के बाद कम्पनियां करार तोड़  रही हैं। इसीलिए सौर और वायु ऊर्जा उत्पादन पर से सब्सिडी घटाने की वकालत की। इसी तरह सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने रोजगार के अवसर न होने पर चिंता तो जताई लेकिन यह बताने में नाकामयाब रहे कि इस दिशा में सरकार को क्या करना चाहिए। तेजी से भागते स्टॉक मार्केट पर भी वह चिंतित दिखे। इसके लिए भी उन्होंने निवेश के अवसरों की कमी को दोषी ठहराया। उन्हें चिंता थी कि अगर किसी वजह से  शेयर बाजार गिरते हैं तो आम आदमी के धनराशि की सुरक्षा सरकार कैसे करेगी। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि सरकार निवेश के अवसर कैसे पैदा कर सकती है।

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