DRDO: 220 साल पुराने 41 आयुद्ध कारखानों के कंपनी में तब्दील होने के बाद क्या अगला नंबर डीआरडीओ का है?
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
गौरवपूर्ण इतिहास वाले 220 वर्ष पुराने 41 आयुध कारखानों के कंपनी में तब्दील होने के बाद अब रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) भी 'निजीकरण' की राह पर जा सकता है। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ 'एआईडीईएफ' के महासचिव सी. श्रीकुमार के मुताबिक केंद्र सरकार की ऐसी मंशा दिखाई पड़ रही है कि आयुध कारखानों के 'निगमीकरण' और ईएमई में 'जीओसीओ' मॉडल लाने के बाद अब 'डीआरडीओ' पर नजर है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन की लैब को पहले ही निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया गया है। हमारे देश के लोगों के पैसे से स्थापित की गई लैब की तमाम सुविधाओं का इस्तेमाल प्राइवेट क्षेत्र करने लगा है। सरकार ने पूर्व मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय कमेटी गठित की है। इस कमेटी को डीआरडीओ की कायापलट करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
नौ सदस्यीय कमेटी गठित की गई
इस बाबत एआईडीईएफ से जुड़ी सभी मान्यताप्राप्त यूनियनों को एक सर्कुलर भेजा गया है। इसमें सी. श्रीकुमार का कहना है कि इसरो और एटोमिक एनर्जी की तरह नए लेबर कोड प्रभावी होने के बाद डीआरडीओ को भी इंडस्ट्री की परिभाषा से छूट प्रदान कर दी जाएगी। के. विजय राघवन की अध्यक्षता में जो 9 सदस्यीय कमेटी गठित की गई है, वह प्रधानमंत्री के निर्देश पर काम करती है। इस कमेटी को जो जिम्मेदारी दी गई है, उसमें रक्षा विभाग (आरएंडडी) एवं डीआरडीओ का पुनर्गठन और भूमिका को फिर से परिभाषित करना, शामिल है। इसके अलावा इनका आपसी और शैक्षणिक समुदाय व इंडस्ट्री के साथ संबंध तय किया जाएगा। शैक्षणिक समुदाय, एमएसएमई और कटिंग एज टेक्नालॉजी के क्षेत्र में स्टार्टअप की सहभागिता निर्धारित होगी।
ठीक नहीं डीआरडीओ के प्रति सरकार का नजरिया
डीआरडीओ में हाई क्वॉलिटी मैनपावर लाना, प्रोजेक्ट आधारित मैनपावर की व्यवस्था, जिसका आधार इंसेन्टिव और डिसइंसेन्टिव हो। नॉन परर्फोमर को बाहर निकालना, एनआरआई एवं विदेशी कंसलटेंट के अनुभाव का इस्तेमाल और अंतरदेशीय सहयोग, जैसी बातों पर ध्यान दिया जाएगा। कमेटी की जिम्मेदारियों में प्रोजेक्ट की रफ्तार बढ़ाने के लिए आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था, पर्सनल एवं फाइनेंस सिस्टम तैयार करना आदि शामिल है। डीआरडीओ के लैब ढांचे का युक्तिकरण एवं प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन तय किया जाएगा। सी. श्रीकुमार के अनुसार, ये सब बातें, डीआरडीओ के प्रति सरकार का नजरिया, बताने के लिए काफी हैं। हालांकि अभी तक हमें रक्षा मंत्रालय और डीआरडीओ की तरफ से कोई आधिकारिक कम्युनिकेशन प्राप्त नहीं हुआ है। इसके बावजूद उक्त कमेटी के गठन के बाद डीआरडीओ यूनियन को सचेत रहना है। एआईईडीएफ की 17 सितंबर को होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारी कमेटी की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।
30,000 करोड़ रुपये का कारोबार होने की बात
41 आयुध कारखानों के निगमीकरण को अब डेढ़ साल से ज्यादा समय हो गया है। केंद्र सरकार ने आयुध कारखानों के निगमीकरण के पक्ष में जवाबदेही, स्वायत्तता और दक्षता को लेकर यह तर्क दिया था कि इनका कारोबार बढ़कर 30,000 करोड़ रुपये हो जाएगा। अभी तक यह वास्तविकता से दूर है। श्रीकुमार बताते हैं कि 2017-18 में वह कारोबार 18 हजार करोड़ रुपये तक पहुंचा था। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने 35 हजार करोड़ तक पहुंचा दिया। उसके बाद वह ग्राफ 12 हजार करोड़ रुपये पर आ गया।
पहले सभी कर्मियों को 41 दिन का बोनस मिलता था। अब कंपनी में तब्दील होने के बाद आयुद्ध कारखानों के सभी कर्मियों को अलग-अलग बोनस मिलेगा। अब डीआरडीओ को प्राइवेट कंपनी की तरफ ले जाने की कोशिश हो रही है। वर्क फोर्स को खत्म करने की रणनीति बन रही है। विदेश से माल ला रहे हैं। उसकी मदद से जो उपकरण तैयार करना है, उसकी तकनीक विकसित करने के लिए कहा गया है। डेवलपमेंट प्रोटोटाइप बनाना है, उसे आर्मी को टेस्ट के लिए देना है। ये सब काम तो दस साल पहले तक हमारे तकनीकी वर्कर करते रहे हैं। अब ये सब काम, धीरे-धीरे प्राइवेट क्षेत्र के पास जा रहा है। श्रीकुमार ने बताया कि तकनीकी एक्सपर्ट कम हो रहे हैं। बिना किसी निवेश के डीआरडीओ की लैब सुविधा को निजी क्षेत्र के लिए खोला जा रहा है। पहले इस संगठन के ढांचे में बदलाव होगा, उसके बाद उसे निगम बनाया जा सकता है। उसके बाद पूरी तरह से वह संगठन निजी हाथों में चला जाएगा।