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टाइगर रिजर्व की तर्ज पर गंगा में होगा डॉल्फिन का संरक्षण: वन्यजीव बोर्ड

Wed, 08 Jul 2020 06:15 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। 
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।  Published by: योगेश साहू Updated Wed, 08 Jul 2020 06:15 AM IST
सार

  • राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड  का एलान- गंगा डाल्फिन का भी होगा संरक्षण
  • टाइगर, हाथी, घड़ियाल और कछुआ रिजर्व सेंचुरी की तर्ज पर होगा संरक्षण

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Dolphin conservation in Ganga on the lines of Tiger Reserve says National Board for Wildlife
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

विस्तार

राष्ट्रीय वनजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) की 58वीं बैठक में गंगा में पाई जाने वाली डॉल्फिन का संरक्षण भी टाइगर, घड़ियाल और हाथियों की तरह किया जाएगा। अब तक संरक्षित श्रेणी में आने वाली डॉल्फिन की संख्या को बढ़ाने और गंगा में फिर से इनकी अठखेलियां बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार एक मुश्त योजना बनाकर काम करेगी।

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वैसे गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन एक ऐसी प्रजाति है, जिसे अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संगठन और भारतीय वनजीव अधिनियम द्वारा संरक्षित जीवों की श्रेणी में सूची बद्ध किया गया है। 1801 में खोजा गया यह स्तनधारी जीव 1970 के दशक तक गंगा, ब्रह्मपुत्र-मेघना से लेकर बिहार, नेपाल तक साफ पानी में राज करती थी।
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यह अंधी डॉल्फिन अभी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। आंखों के लिए छोटे स्लिट्स के साथ यह अपने शिकार तथा आसपास की अन्य छोटी मछलियों को ट्रैक करने के लिए अल्ट्रासोनिक ध्वनियों का उपयोग करके  उन्हें धर दबोचती है। शुक्रवार को हुई नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड की स्थायी समिति की बैठक में इनके बड़े पैमाने पर संरक्षण का फैसला लिया गया है।
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वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए हुई बैठक में विशेषज्ञों, मुख्य वन्यजीव वार्डन और नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्थायी समिति के सदस्यों की उपस्थिति में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।

नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्ड लाइफ की स्थायी समिति ने गंगा डॉल्फिन, राष्ट्रीय जलीय पशु के संरक्षण के लिए समर्पित परियोजना शुरू करने की सिफारिश की और मंत्रालय के प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट हाथी की तर्ज पर गंगा डॉल्फिन जो कि संरक्षण अनुसूची में एक नंबर पर  खतरे वाली प्रजाति की श्रेणी जीव है को भी बाकायदा एक  परियोजना चलाकर बचाने की सिफारिश की गई है।

इसमें इस प्रजाति के घर कहलाने वाले असम, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल राज्यों में गहरी नदी के साथ-साथ गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन के संरक्षण के लिए कृत संकल्पित होगी।

इसके तहत डॉल्फिन की आबादी के हिसाब से मुफीद नदी के हिस्सों में संरक्षण की कवायद करके इनके संरक्षण और आबादी को बढ़ाने के लिए उपयुक्त वातावरण का निर्माण किया जाएगा। संरक्षित क्षेत्र में इनकी आमद को बनाए रखने के लिए साफ पानी की अविरल धारा भी सुनिश्चित की जाएगी। इसके अलावा संरक्षित जीवों की तरह ही अब इनके रहने और संवर्धन के लिए एक मुश्त प्रयास शुरू किए जाएंगे।

डॉल्फिन की संख्या तीन हजार
2018 में हुए सर्वे के दौरान नेपाल, बंगलादेश से लेकर भारत के बिहार असम तक इन डॉल्फिन की संख्या केवल तीन हजार है। इसमें ज्यादातर डॉल्फिन भारत में गंगा के क्षेत्र में हैं। आमतौर पर एकांत प्रिय और एकल रहने वाला यह जीव कभी कभी छोटे छोटे समूहों में भी विचरण करता है। ज्यादातर मां डॉल्फिन बच्चे के साथ ही रहती है।

उत्तर प्रदेश में इनकी स्थिति को जानने के लिए वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर इंडिया ने उत्तर प्रदेश वन विभाग के साथ 2018 के अक्तूबर में गंगा नदी में डॉल्फिन की आबादी पर सर्वेक्षण किया। इसमें पाया गया कि डॉल्फिन की आबादी 2015 में इस इलाके में 22 थी जो कि 10 से 15 अक्तूबर तक हुए सर्वेक्षण के दौरान बढ़कर 33 हो गई। यानी धीमी गति से ही सही पर डॉल्फिन परिवार बढ़ रहा है।

यह सर्वेक्षण बिजनौर बैराज से अनूपशहर के नरौरा बैराज तक 205 किलोमीटर में फैला था। इस 33 बड़ी मछली परिवार में तीन छोटे बच्चे शामिल थे। जो इंगित कर रहा था कि सरकार की गंगा नदी के पानी को साफ रखने की मुहिम असर है। इसकी एक बड़ी वजह नदी में साकारात्मक तौर पर बढ़ती जैव विविधता भी है।


क्योंकि डॉल्फिन दो या तीन साल में एक बार उपयुक्त परिस्थितियों में ही प्रजनन करती हैं। इसलिए गंगा में इलाहाबाद, वाराणसी और बलिया में इनकी उपस्थिति देखने को मिलती है, जबकि पश्चिम यूपी में बिजनौर से नरौरा के मध्य गंगा का साफ पानी होने के कारण यहां इनकी आमद आसानी से देखी जा सकती है। क्योंकि इन्हें साफ पानी और टिकाऊ वातावरण में ही रहना भाता है।

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