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महाभियोग : न्यायिक कार्यों से खुद को अलग नहीं करेंगे CJI, सभापति नायडू पर टिकीं सबकी निगाहें

Sun, 22 Apr 2018 10:12 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 22 Apr 2018 10:12 AM IST
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Dipak Misra decided not to recuse himself from administrative and judicial work in Supreme Court
दीपक मिश्रा

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने फैसला किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायिक और प्रशासनिक कार्यों से खुद को अलग नहीं करेंगे। यह निर्णय उन्होंने इसलिए लिया है क्योंकि बहुत सारे वकील और न्यायविद उनके पक्ष में खड़े हैं। जिन्होंने सीजेआई के खिलाफ लाए जाने वाले महाभियोग के खिलाफ रैली की थी। वहीं कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी पार्टियों ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को महाभियोग का नोटिस दे चुकी हैं।

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एक अंग्रेजी अखबार ने सुप्रीम कोर्ट के सूत्रों के हवाले से लिखा है कि जस्टिस मिश्रा मानते हैं कि उनको हटाने के लिए लाया जा रहा प्रस्ताव तुच्छ आरोपों पर आधारित होने के साथ ही राजनीतिक विचारों से प्रेरित और उन्हें मुख्य न्यायाधीश के रूप में कर्तव्य पूरा करने से रोकने वाला है। उन्होंने बताया कि वह वह उन लोगों को मजबूर करने के बिल्कुल मूड में नहीं हैं जिन्होंने उन्हें निकालने के लिए संदेहपूर्ण बहाने ढूंढ रहे हैं।
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सूत्रों ने बताया कि पूर्व अटॉर्नी जनरल के परासरन और उनके बेटे मोहन, पूर्व सॉलिसिटर जनरल के अलावा पूर्व वरिष्ठ वकील महालक्ष्मी पावनी, स्वर्गीय पीपी राव की बहू ने भी सीजेआई मिश्रा का समर्थन किया है। उनका मानना है कि चीफ जस्टिस ने कुछ भी गलत नहीं किया है। परासरन और पवानी के मुताबिक कांग्रेस द्वारा महाभियोग प्रस्ताव को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना बचकाना है।
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कोर्ट के सूत्रों का कहना है कि चीफ जस्टिस का मानना है कि यदि राज्यसभा के सभापति प्रस्ताव को स्वीकार करते हैं तो वह अपने निर्णय पर दोबारा विचार करेंगे नहीं तो वह पहले की तरह ही अपने प्रशासनिक और न्यायिक काम को करते रहेंगे। सूत्रों ने कहा कि कांग्रेस खेल कर रही है, क्योंकि वह पार्टी से जुड़े कुछ वकीलों की साल भर से स्थगित एक संवेदनशील केस की सुनवाई टालने की मांग चीफ जस्टिस द्वारा ठुकराए जाने से नाराज है। राज्यसभा के चेयरमैन के पास यह अधिकार है कि यदि उसे नोटिस में पेश की गई दलीलें सही नहीं लगती हैं तो वह उस प्रस्ताव को खारिज कर सकते हैं।


निगाहें सभापति नायडू पर 

महाभियोग मामले में अब सबकी निगाहें राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू पर है। संविधान में सभापति को महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को खारिज करने का अधिकार है। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप कहते हैं सभापति नोटिस के औचित्य पर सवाल उठाते हुए इसे खारिज कर सकते हैं। क्योंकि प्रथम दृष्यया ही यह मामला राजनीतिक लगता है। फिर इससे पहले आए महाभियोग मामले की तरह इस मामले में चुनिंदा विपक्ष ही सीजेआई के खिलाफ हैं। 


लोकसभा में तो नोटिस देने वाले दलों की स्थिति और दयनीय है। गौरतलब है कि सभापति की ओर से नोटिस को स्वीकार किए जाने के बाद भी पहले तीन सदस्यीस समिति सीजेआई के खिलाफ लगाए गए आरोपों की जांच करेगी। समिति द्वारा आरोप सही पाए जाने संबंधी रिपोर्ट देने के बाद ही इस पर चर्चा और मतदान की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। 
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