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इंतजार: जिस गांव ने कभी 'नेताजी' के लिए बहाया था खून-पसीना, उस इलाके को है पीएम मोदी से यह बड़ी शिकायत!

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Sat, 30 Jul 2022 07:44 PM IST
सार

सुभाष संस्था के पदाधिकारी तमल सान्याल बताते हैं, 1944 में सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना नौ दिन तक इस गांव में रही थी। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने अस्थायी तौर पर इस गांव को अपना मुख्यालय बना लिया था...

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Digital India: rujajo village, who gave shelter to Netaji Subhash Chandra Bose, waiting of mobile network
बपोसूयुवी स्वारो, रुजाजो गांव, नागालैंड - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

नागालैंड का रुजाजो गांव, जिसने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को ब्रिटिश शासनकाल में शरण दी थी, सालों गुजरने के बाद भी आज तक इस गांव में मोबाइल टावर नहीं लग सका है। 1944 में 'नेताजी' यहां पर आए थे। गांव के लोगों ने नेताजी और आजाद हिंद फौज की हर संभव मदद की थी। जाते वक्त सुभाष चंद्र बोस ने इस गांव की तकदीर बदलने की बात कही थी। सीआरपीएफ के पूर्व एसआई एवं बनारस की सुभाष संस्था के पदाधिकारी तमल सान्याल ने यहां पर मोबाइल टावर लगाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय के समक्ष यह मुद्दा उठाया था। बीएसएनएल ने टावर लगाने के लिए फंड नहीं होने की बात कही। हालांकि उन्होंने यह भी लिखा है कि जब नागालैंड में 4जी तकनीक के उपकरण लगेंगे, तो इस गांव पर विचार किया जाएगा। अब नरेंद्र मोदी सरकार ने बीएसएनएल में नई जान फूंकने 1.64 लाख करोड़ रुपये मंजूर किए हैं। ऐसे में 'रुजाजो' के लोगों को यहां एक टावर लगने की उम्मीद है।

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पत्थरों के बीच ऊंचाई वाली जगह पर बैठते थे नेताजी

नेताजी अपनी फौज के साथ रुजाजो के निकटवर्ती गांव जेसामी में पहुंचे थे। बाद में वे रुजाजो आ गए। उस वक्त लड़ाई चल रही थी। ब्रिटिश आर्मी के सैनिक लगातार बमबारी कर रहे थे। तमल सान्याल, जिन्होंने इस गांव में मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने के लिए नागालैंड प्रशासन के साथ कई बार पत्राचार किया है, साथ ही उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री कार्यालय तक को चिट्ठी लिखी। वे बताते हैं कि 1944 में सुभाष चंद्र बोस और उनकी सेना नौ दिन तक इस गांव में रही थी। सौ वर्ष से ज्यादा आयु के बपोसूयुवी स्वोरो ने सान्याल के साथ 'नेताजी' से जुड़ी कुछ यादें साझा की थीं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने अस्थायी तौर पर इस गांव को अपना मुख्यालय बना लिया था। वे गांव में पत्थरों के बीच ऊंचाई वाली जगह पर आजाद हिंद फौज के अफसरों के साथ बैठक करते थे।

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रुजाजो गांव, नागालैंड - फोटो : Amar Ujala

पेट भरने के लिए केवल चावल ही था

ब्रिटिश आर्मी लगातार नेताजी पर नजर रख रही थी। दुश्मन का विमान उनकी टोह लेने के लिए गांव के ऊपर मंडराता रहता था। आसपास के इलाके में बमबारी होती रहती थी। नेताजी के साथ हजारों सैनिक भी इसी गांव में रह रहे थे। गांव के लोगों के पास पेट भरने के लिए केवल चावल था। लोगों ने अपने हिस्से का चावल नेताजी को दे दिया। आजाद हिंद फौज के जवानों की संख्या ज्यादा थी तो लोगों ने दिन-रात काम करके चावल निकाला। जब नेताजी यहां से जाने लगे तो उन्होंने इस गांव को गोद लेने की बात कही थी। 'रुजाजो' गांव आज भी उनका इंतजार कर रहा है। सान्याल ने बताया, आजादी के इतने दशक बाद भी करीब साढ़े आठ सौ घरों वाला यह गांव न तो हैरिटेज स्थलों की सूची में जगह पा सका और न ही नेता जी के भरोसे की किसी ने सुध ली।

बीएसएनएल ने फंड न होने की बात कही थी

ग्रामीण वेजोनई ने कहा, तब हमने भी सोचा था कि आजादी के बाद यहां की तस्वीर बदल जाएगी। बच्चों के लिए अच्छा स्कूल होगा। लोगों को स्वच्छ पेयजल मिलेगा। चावल निकालने के लिए मिल या कारखाना लग जाएगा। नेताजी ने जाते वक्त कहा था कि आप चिंता न करें, मुझे यह गांव सदैव याद रहेगा। लोगों को मोबाइल फोन पर बातचीत करने के लिए दूसरे गांव में जाना पड़ता है। मोबाइल टावर लगाने के लिए नागालैंड प्रशासन से बात की गई। बीएसएनएल को मांग पत्र सौंपा गया। दो साल पहले दीमापुर में बीएसएनएल अधिकारियों ने बताया था कि यहां टावर लगाने के लिए सर्वे हुआ है। जमीन मिल गई है और टेंडर भी जारी हो गया। दो टावर लगाने की बात हुई थी, मगर अभी तो एक भी नहीं लगा है।

तमल सान्याल कहते हैं, बीएसएनएल ने फंड न होने की बात कही थी। 4जी नेटवर्क का हवाला दिया था। अब तो मोदी सरकार ने बीएसएनएल की रिस्ट्रक्चरिंग के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपये का पैकेज दिया है। बीएसएनएल और भारत ब्रॉडबैंड नेटवर्क लिमिटेड का विलय हो रहा है। गांव वालों को भरोसा है कि देश के दूसरे हिस्सों में 5जी तकनीक आने की बात हो रही है, तो कम से कम इस गांव में 4जी वाला ही मोबाइल टावर लग जाए। इसके लिए दोबारा से बीएसएनएल के साथ पत्राचार किया जाएगा।

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