गृहयुद्ध के आसार: क्या अफगानिस्तान की राजनीति में सीआईए ने ले ली इंट्री?
अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अभाव और पस्त आर्थिक व्यवस्था व लोगों के बीच में बढ़ रहे विरोध के कारण तालिबान के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। क्यों आपस में भिड़ने लगे हैं तालिबानी गुट जानिए।
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क्या अफगानिस्तान गृहयुद्ध की तरफ बढ़ रहा है? क्या अफगानिस्तान की राजनीति में अमेरिका की सुरक्षा और खुफिया एजेंसी सीआईए ने इंट्री ले ली है। खुफिया और सुरक्षा मामलों के जानकार वहां चल रहे दौर को इसी नजरिए से देख रहे हैं। तालिबान के नेतृत्व वाली सरकार का शपथ ग्रहण कार्यक्रम टलने को भी इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। खुफिया और सुरक्षा एजेंसी के सूत्र कहते हैं कि इसके कुछ बड़े कारण थे। बताते हैं कि पड़ोसी देश में मौजूदा सरकार का गठन पावर शेयरिंग के आधार पर होना था, लेकिन आपसी तनातनी, गुटबाजी और वर्चस्व बनाने के फेर में कुछ भी तर्कसंगत नहीं हो सका। पाकिस्तान समर्थित हक्कानी नेटवर्क और तालिबान के भीतर कई गुटों में लगातार टकराव बढ़ रहा है।
तालिबान सरकार के सामने कम नहीं है संकट
बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग के अभाव और पस्त आर्थिक व्यवस्था व लोगों के बीच में बढ़ रहे विरोध के कारण तालिबान के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा है। रूस, चीन, तुर्की और पाकिस्तान जहां अफगानिस्तान में सधे हुए तरीके से आगे बढ़ रहे हैं, वहीं अमेरिका, आस्ट्रेलिया, भारत और जापान का संगठन भी संभलकर चल रहा है। जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन की स्थिति एक दूसरे मोड़ पर खड़ी है।
अफगानिस्तान मध्य एशिया का गेट-वे माना जाता है। इसके पड़ोसी देश ताजिकिस्तान समेत अन्य देशों की अलग-अलग परेशानियां हैं। इन देशों के बहुत से लोग अभी भी अफगानिस्तान में हैं। ऐसे में अफगानिस्तान के अंदरूनी हालात को समझने वालों का कहना है कि पावर शेयरिंग और ट्रेड रूट दोनों अलग-अलग मामले हैं। सभी झगड़ों का केंद्र यही दो हैं। इसे लेकर तालिबान के भीतर कई गुट बन गए हैं। कुछ बहुत कट्टरपंथी गुट हैं और कुछ उदारवादी भी। इसी तरह हक्कानी नेटवर्क में कई गुट हैं। हजारा की अलग समस्या है। बलोचों या पश्तों भाषा बोलने वाले लोगों के अलग मसले हैं। इन्हें अफगानिस्तान में बन रहे मौजूदा स्वरूप में अपने लिए सही स्थिति नहीं दिखाई पड़ रही है। बड़ी असमंजस की स्थिति है।
कई देशों की है निगाह
कई देशों की निगाह हर दिन बदल रही अफगानिस्तान की स्थिति पर टिकी है। एक वरिष्ठ अधिकारी की मानें तो सब कुछ केवल कतर, पाकिस्तान, दुबई और इस्लामाबाद से ही तय होने की स्थिति नहीं है। इसी तरह के समीकरणों में भारत जैसे देश भी अफगानिस्तान के साथ अपने हितों की बुनियाद बनाने में जुट गए हैं। भारत जैसे देश अफगानिस्तान की जमीन से आतंकवाद के इस्तेमाल के पक्ष में नहीं है।
पाकिस्तान की जमीन से चलने वाले आतंकवाद पर काम कर चुके सूत्र का कहना है कि वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई की आतंकवाद को लेकर 'गोल शिफ्टिंग' काफी संवेदनशील मामला है। इसे अमेरिका जैसे देश भी समझते हैं। इसलिए सभी अपनी चिंता दूर करने की कोशिश कर रहे होंगे। खुफिया और सुरक्षा के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि दुनिया के देश मानते हैं कि आतंकवाद किसी के पक्ष में नहीं है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी इसके बाबत इस बार एक सुर में आवाज सुनाई दे सकती है। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन भी नया संदेश दे सकते हैं।