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क्या आप सिनेमाघर में ‘पद्मावत’ देखने जाएंगे?

Thu, 18 Jan 2018 08:18 PM IST
अतुल सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली 
अतुल सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली  Updated Thu, 18 Jan 2018 08:18 PM IST
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Despite protests will you go to watch Padmaavat movie in the Cinema Halls
पद्मावत फिल्म का पोस्टर

इतने हो हल्ले और महीनों की जद्दोजहद के बाद क्या आप ‘पद्मावत’ देखना चाहेंगे? क्या आपमें अब भी घूमर डांस देखने के लिए किसी सिनेमाहॉल में जाने का उत्साह बाकी है? क्या आप दीपिका पाडुकोण की अदाकारी या संजय लीला भंसाली के बेहतरीन निर्देशन के सचमुच कायल हैं या फिर करणी सेना के कट्टर रवैये से डरने लगे हैं? पद्मावती (अब पद्मावत) को लेकर उठे बवाल और सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी के बावजूद इसके खिलाफ सड़कों पर उतरने वालों, पोस्टर फाड़ने वालों और सिनेमा हॉल में जनता कर्फ्यू लगाने जैसे फरमान जारी करने वालों को शायद सिनेमा की संस्कृति और इतिहास की किस्सागोई को समझने का वक्त नहीं हैं।

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पद्मावत के किस्से को आज हम उस कट्टरवादी और दकियानूसी सोच से जोड़कर देखने को मजबूर हो गए हैं जहां कला और संस्कृति अपने मायने खो देती है, जहां ऐतिहासिक तथ्यों को बदलने के नाम पर सियासत होती है और जहां किरदार भी अपनी अहमियत खो देते हैं। आम तौर पर हमारे देश में विवाद के अनंत कारण बनते रहते हैं। ऐसे- ऐसे कारण कि हमारी अदालतें और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और नामी गिरामी वकील तक इसमें महीनों तक या कई बार बरसों तक उलझे रहते हैं। 
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जातिगत झगड़ों से लेकर इतिहास के गर्भ से निकले तमाम विवाद और ऐसी पारंपरिक मान्यताएं जिन्हें लेकर हिंसा भी होती है, लोग भी मरते हैं, करोड़ों-अरबों का नुकसान भी होता है और सियासत के लिए मुद्दे भी जन्म लेते हैं। यहां तक कि पूरा देश अपनी रोजमर्रा की तकलीफें और परेशानियां भूलकर इस बात में दिलचस्पी लेने लगता है कि भला पद्मावत का क्या होगा, दीपिका पडुकोण कहां जाएंगी, संजय लीला भंसाली क्या करेंगे। कभी विवाद की वजह सलमान रुश्दी बन जाते हैं तो कभी तस्लीमा नसरीन तो कभी भंसाली।   
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बांग्लादेश की निर्वासित और विवादास्पद लेखिका तस्लीमा नसरीन को लेकर लाख सियासत होती रहे, लेकिन उनके लेखन में जिस कट्टरवाद की खिलाफत है या जिस तरह किसी भी धर्म की विकृतियों के खिलाफ बगावत है वह कहीं न कहीं हमारे देश के इसी संस्कृति पर चोट करती है। अपनी बात पर अड़ी रहने और लगातार इन विकृतियों के खिलाफ लिखने की वजह से तसलीमा के खिलाफ फ़तवे जारी होते हैं। तसलीमा जानती हैं कि सारा खेल भावनाओं से जुड़ा है और ठीक यही बात संजय लीला भंसाली भी जानते हैं। इसी भावनात्मक कट्टरवाद के शिकार वो राजस्थान में इस फिल्म की शूटिंग के दौरान भी हो चुके हैं और तब से लेकर अबतक उनकी ये जंग जारी है।


लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट और सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिलने के बाद तमाम झंझावातों के बीच सबको 25 जनवरी का इंतजार है। अब ये उन राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वो कैसे सुरक्षा की गारंटी देती हैं और कैसे ऐसे तत्वों पर काबू पाती हैं जिनके दबाव में आकर पहले ही अपने अपने राज्यों में फिल्म न रिलीज करने की बात कह चुकी हैं। सिनेमा हॉल के मालिकों के लिए तो निर्माताओं ने बीमा करवा दिया है कि वो तोड़फोड़ होने की स्थिति में नुकसान की भरपाई करवा देंगे, लेकिन क्या वो इस सोच को बदल पाएंगे जो बार बार इतने विध्वंसक रूप से सियासी जामा पहन कर सामने आती रहती है?

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