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Delhi Ordinance: जिस AAP ने राजीव गांधी से भारत रत्न वापस लेने का प्रस्ताव पास किया, उसी के साथ खड़ी कांग्रेस

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 07 Aug 2023 05:25 PM IST
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सार
Delhi Ordinance: साल 2018 के दौरान दिल्ली विधानसभा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर आप विधायक, जरनैल सिंह ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया था। उस प्रस्ताव में पूर्व पीएम राजीव गांधी को मिले 'भारत रत्न' सम्मान को वापस लेने की मांग की। इस मुद्दे पर बड़ा विवाद छिड़ गया था...
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Delhi Ordinance: Congress stands with AAP which passed proposal to withdraw Bharat Ratna from Rajiv Gandhi
Delhi Ordinance: Sudhanshu Trivedi, BJP - फोटो : Amar Ujala/Rahul Bisht

विस्तार

राज्यसभा में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली क्षेत्र सरकार संशोधन विधेयक-2023 पर चर्चा के दौरान कांग्रेस पार्टी, उसी आम आदमी पार्टी के समर्थन में बोलती नजर आई, जिसने विधानसभा में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से 'भारत रत्न' वापस लेने का प्रस्ताव पेश किया था। जानकारों ने इसे राजनीतिक मजबूरी बताया है। कांग्रेस पार्टी, विपक्षी दलों के गठबंधन को कमजोर करने का दाग अपने दामन पर नहीं लगवाना चाहती थी। इस विधेयक पर कांग्रेस पार्टी के भीतर सहमति नहीं बन रही थी। अजय माकन सहित कांग्रेस के कई बड़े नेता इस प्रस्ताव पर आम आदमी पार्टी का समर्थन करने के खिलाफ थे। इसके बावजूद कांग्रेस ने ‘आप’ का समर्थन किया।

राज्यसभा में हुई चर्चा में बहस में हिस्सा लेते हुए भाजपा के सांसद डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने आप और कांग्रेस के गठजोड़ पर तंज कसा। उन्होंने कहा, आम आदमी पार्टी ने गुजरात में कांग्रेस को हॉफ कर दिया, पंजाब में स्विच ऑफ कर दिया और पंजाब में साफ कर दिया। इस मुद्दे पर अध्यादेश इसलिए लाया गया है, क्योंकि मई के मध्य में 16 और 17 तारीख की रात को विजिलेंस की 76 फाइलों से छेड़छाड़ करने का प्रयास किया गया।

माकन ने 'आप' को भाजपा की बी टीम बताया था

साल 2018 के दौरान दिल्ली विधानसभा ने 1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर आप विधायक, जरनैल सिंह ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया था। उस प्रस्ताव में पूर्व पीएम राजीव गांधी को मिले 'भारत रत्न' सम्मान को वापस लेने की मांग की। इस मुद्दे पर बड़ा विवाद छिड़ गया था। आम आदमी पार्टी ने अपने विधायक सोमनाथ भारती की प्रवक्ता पद से छुट्टी कर दी थी। 'आप' नेता अलका लांबा को पार्टी से ही इस्तीफा देना पड़ा। पहले कहा गया कि संशोधन पास हो गया है। जब विवाद हुआ, तो आप की तरफ से कहा गया, संशोधन प्रस्ताव पारित ही नहीं हुआ। पार्टी की तरफ से कहा गया कि उस प्रस्ताव में कुछ तकनीकी खामी थी। इस वजह से पूर्व पीएम राजीव गांधी पर लाया गया संशोधन पारित नहीं हुआ है। दूसरी ओर भाजपा ने कहा था, प्रस्ताव पास हो चुका है। उस वक्त कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने उस प्रस्ताव पर गहरी नाराजगी जताई थी। उन्होंने 'आप' को भाजपा की बी टीम बताया था।

ऐसी पार्टी के साथ कांग्रेस कैसे हाथ मिला सकती है

कांग्रेस नेता अजय माकन ने अध्यादेश को लेकर एक मीडिया हाउस के साथ बातचीत में कहा था, कांग्रेस पार्टी को अध्यादेश के मामले आम आदमी पार्टी का समर्थन नहीं करना चाहिए। बतौर माकन, ध्यान रखना चाहिए कि ये वही पार्टी है, जिसने राजीव गांधी को मिले भारत रत्न सम्मान को वापस लेने का प्रस्ताव पेश किया था। 'आप' ने भाजपा की रणनीति के तहत वह काम किया था। ऐसी पार्टी के साथ कांग्रेस कैसे हाथ मिला सकती है। अजय माकन ने अध्यादेश लाए जाने के बाद वही बातें कही थीं, जो सोमवार को भाजपा सांसद सुधांधु त्रिवेदी ने कही हैं। माकन ने कहा था, आप ने गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़कर किसे फायदा पहुंचाया। जो लोग दिल्ली में सीएम शीला दीक्षित को बदनाम कर रहे थे, आप ने उन लोगों का साथ दिया था। गोवा और पंजाब में यह पार्टी किसका साथ दे रही थी। केजरीवाल की पार्टी ने जहां भी चुनाव लड़ा है, भाजपा को ही फायदा पहुंचाया है। ऐसा एक भी राज्य नहीं है, जहां पर केजरीवाल ने भाजपा को नुकसान पहुंचाया हो। कांग्रेस की दिल्ली इकाई ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों के नेताओं ने भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को केजरीवाल से दूरी बनाकर चलने की सलाह दी थी।

तो 'आप' का उनके साथ चलना संदिग्ध रहेगा

बेंगलुरु की बैठक से पहले अध्यादेश को लेकर कांग्रेस पार्टी ने केजरीवाल को समर्थन देने की बात नहीं कही थी। दिल्ली सरकार की शक्तियों पर अंकुश लगाने के मकसद से केंद्र के अध्यादेश को लेकर आप संयोजक अरविंद केजरीवाल ने विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की थी। केजरीवाल का इशारा साफ था कि अगर विपक्षी दल, अध्यादेश के मामले में अपना रुख स्पष्ट नहीं करते हैं, तो 'आप' का उनके साथ चलना संदिग्ध रहेगा। 23 जून को पटना में हुई विपक्षी दलों के नेताओं की प्रथम बैठक के दौरान और उससे पहले केजरीवाल की पार्टी की ओर से कहा गया था कि बैठक में अध्यादेश के मुद्दे पर भी चर्चा होनी चाहिए। बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा नहीं हुई। दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान, दोनों ने बैठक में शिरकत की। जब विपक्षी दलों के नेताओं ने प्रेसवार्ता की तो उसमें 'आप' नेता शामिल नहीं हुए। उस वक्त कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा था, अध्यादेश का विरोध तो सदन में होता है। अभी से इसका प्रचार क्यों हो रहा है।

48 घंटे पहले कांग्रेस पार्टी ने केजरीवाल की बात मान ली

इसके बाद जब बेंगलुरु की बैठक की तिथि घोषित हुई, तो दोबारा से केजरीवाल, विपक्ष की मीटिंग में शामिल होने को लेकर आनाकानी करने लगे। उस वक्त नीतीश कुमार और ममता बनर्जी ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इस बाबत सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे से बात की गई। बैठक से 48 घंटे पहले कांग्रेस पार्टी ने केजरीवाल की बात मानकर उन्हें अध्यादेश को लेकर ‘आप’ को समर्थन दे दिया। इससे पहले केजरीवाल ने अध्यादेश के मामले को लेकर बिहार के सीएम नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर राव, तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन, पश्चिम बंगाल की सीएम एवं टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के प्रमुख शरद पवार से मुलाकात की थी। बेंगलुरु की बैठक में 26 विपक्षी पार्टियों ने मिलकर अपने गठबंधन का नाम 'इंडिया' रखा। कांग्रेस और केजरीवाल के बीच दूरियां कुछ कम होने लगी। हालांकि दिल्ली सरकार के अध्यादेश के मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी को अपने ही नेताओं की नाराजगी झेलनी पड़ी।

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