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सीएपीएफ आवास मामला: दिल्ली हाई कोर्ट बोला- 'वे आपके लिए काम कर रहे हैं और आप उनके परिवार को बाहर जाने के लिए कह रहे हैं'

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 16 Aug 2021 06:36 PM IST
सार

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल ने कहा, आप न केवल उन लोगों के हितों के संरक्षक हैं जो सेवा में हैं, बल्कि उनके परिवारों के भी हैं, जो अकेले रह रहे हैं। उन्होंने कहा, 'आपको आम आदमी की मुश्किलें देखनी होंगी।'

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delhi high court, if the jawans are being posted in harsh areas for 4-7 years, their families should also be allowed to live in allotted accommodation
दिल्ली हाई कोर्ट - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

दिल्ली उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों की बैंच ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 70 जवानों द्वारा दायर की गई याचिका पर कहा, 'वे आपके लिए काम कर रहे हैं और आप उनकी महिलाओं व बच्चों को बाहर जाने के लिए कह रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल ने कहा, आप न केवल उन लोगों के हितों के संरक्षक हैं जो सेवा में हैं, बल्कि उनके परिवारों के भी हैं, जो अकेले रह रहे हैं। उन्होंने कहा, 'आपको आम आदमी की मुश्किलें देखनी होंगी'। वकील या जज के तौर पर हमें कभी भी कतार में खड़ा नहीं होना पड़ता, लेकिन इन लोगों को अपने परिवार को स्थानांतरित करने के लिए छुट्टी तक नहीं मिल रही है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 'नॉन फैमिली स्टेशन' वाले इलाकों में तैनात सीएपीएफ जवानों की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें तीन वर्ष से ज्यादा समय तक अलॉट सामान्य पूल आवासीय आवास (जीपीआरए) खाली करने के लिए कहा गया था।

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अधिवक्ता अरविंद कुमार शुक्ला के माध्यम से 70 सीएपीएफ (केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल) कर्मियों की ओर से याचिका दायर की गई थी। न्यायमूर्ति ज्योति सिंह ने कहा, सीएपीएफ जवानों के परिवार दिल्ली स्थित जीपीआरए आवासों में रह रहे हैं। सामान्य पूल आवासीय आवास नियम, 2017 का नियम 43 गैर-पारिवारिक स्टेशनों पर पोस्टिंग के मामले में अंतिम पोस्टिंग वाले स्थान पर जीपीआरए के प्रतिधारण की अवधि को अधिकतम तीन वर्ष तक सीमित करता है। उसी के अनुसरण में केंद्र सरकार ने वह कार्यालय ज्ञापन जारी किया गया था। सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को तीन साल से अधिक समय तक 'गैर-पारिवारिक' क्षेत्रों में तैनात किया गया है। उदाहरण के लिए, याचिकाकर्ता नंबर-1 जो 2016 से त्रिपुरा में तैनात है। आप उन्हें तीन साल से अधिक समय से कठोर स्टेशन पर तैनात कर रहे हैं। पीठ ने प्रतिवादी के वकील नवल किशोर झा से पूछा, क्या परिवार को फुटपाथ पर रहना चाहिए। पीठ को सूचित किया गया था कि इससे पहले भी दो समान याचिकाएं अदालत के समक्ष दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं की दुर्दशा को देखते हुए, जीपीआरए प्रतिधारण अवधि 30 जून, 2021 तक बढ़ा दी गई थी।
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बैंच ने इस बाबत कहा, अगर जवानों को 4-7 साल के लिए कठोर क्षेत्रों में तैनात किया जा रहा है, तो उनके परिवारों को भी पहले से आवंटित आवास में रहने की अनुमति दी जानी चाहिए। बेंच ने सलाह दी कि यदि आवश्यक हो तो जवान आवास बदल सकता है। हालांकि, उन्हें एक अच्छी जगह पर ले जाया जाना चाहिए, जहां उनके परिवार अध्ययन कर सकें, बेहतर चिकित्सा सेवा प्राप्त कर सकें। कोर्ट ने कहा, 'देश की सेवा कर रहे लोगों की मुश्किलें तो देखिए। आप जवानों को अपनी पत्नियों और बच्चों को शहर से बाहर जाने के लिए कह रहे हैं। वे कहां जाएंगे। आप जवानों को उनके परिवारों के लिए घर खोजने के लिए छुट्टी भी नहीं दे रहे हैं। दिल्ली या किसी अन्य बड़े शहर में घर ढूंढना बहुत मुश्किल है। बेंच ने कहा, हम ओएम संख्या 22019/2020-सीओआई-द्वितीय दिनांक 4/3/2021 के संचालन, कार्यान्वयन और निष्पादन पर रोक लगाते हैं, जो सामान्य पूल आवासीय आवास की अवधि को 30 जून, 2021 से परे प्रतिबंधित करता है।

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वर्तमान याचिकाकर्ताओं के लिए जीपीआरए, विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जरुरी है कि वे कठोर स्टेशनों पर काम कर रहे हैं, जिन्हें 'गैर-पारिवारिक स्टेशन' के रूप में भी जाना जाता है, उदाहरण के लिए त्रिपुरा, जम्मू और कश्मीर, असम, आदि। इसके अलावा तथ्यों से यह भी प्रतीत होता है कि वे पिछले 4/5/7 वर्षों से अधिक समय से गैर-पारिवारिक स्टेशनों पर काम कर रहे हैं। याचिकाकर्ता नंबर-5 कुपवाड़ा, जम्मू-कश्मीर में 2007 से काम कर रहा है। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उनके परिवार, पूर्व आवास में रह रहे हैं। उन्हें कम से कम अगली तारीख तक जारी रखा जाना चाहिए, क्योंकि ये याचिकाकर्ता अपने परिवार के सदस्यों को उन स्थानों पर नहीं ले जा सकते जहां वे सेवा कर रहे हैं।

खास बात ये है कि जवानों की तैनाती की अवधि तीन वर्ष से अधिक है, लेकिन आवास केवल तीन वर्ष के लिए मिलता है। याचिकाकर्ता गैर-पारिवारिक स्टेशनों पर काम कर रहे हैं। प्रथम दृष्टया मामला याचिकाकर्ताओं के पक्ष में है। सुविधा का संतुलन भी याचिकाकर्ताओं के पक्ष में है। यदि विवादित आदेश पर अगली तिथि तक रोक नहीं लगाई जाती है तो याचिकाकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को अंतरिम राहत दे दी। यदि आप 3000 जवानों को कठोर स्टेशन पर रख रहे हैं, तो आपको उनके परिवारों को अलग-अलग शहरों में समायोजित करना होगा। उन सभी को दिल्ली में नहीं, अलग-अलग जगहों पर। आपको आम लोगों की कठिनाई को देखना होगा। वकीलों या न्यायाधीशों के रूप में, हमें कतार में खड़ा नहीं होना पड़ता है। लेकिन इन लोगों को अपने परिवार को स्थानांतरित करने के लिए छुट्टी नहीं मिल रही है।

जवानों की दलील है कि हमने खुद से जोखिम वाले इलाकों में पोस्टिंग नहीं मांगी थी। कश्मीर, नॉर्थ ईस्ट या नक्सल में परिवार को कहां पर और कैसे साथ रखें। वहां तो आवास भी नहीं मिलता। हम तो फोर्स वाले हैं, इसलिए यहां पर तीन साल की पोस्टिंग का नियम लागू नहीं होता। दूसरी पोस्टिंग में पांच छह साल लग जाते हैं। दोबारा से 'नॉन फैमिली स्टेशन' मिल जाता है। ऐसे में हम अपने परिवार की सुरक्षा को खतरे में नहीं डालेंगे। सीएपीएफ अधिकारियों और जवानों ने हाई कोर्ट से प्रार्थना की थी कि उनके परिवारों को दिल्ली के सरकारी आवास में ही रहने दिया जाए।

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