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अदालत का आदेश दिल्ली पुलिस के लिए बना जी का जंजाल, 200 लोग कैसे दर्ज करेंगे 20 हजार FIR

Thu, 05 Sep 2019 06:23 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 05 Sep 2019 06:23 PM IST
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delhi high court gave order to delhi police economic offence wing to convert 20 thousand FIR
kathua gangrape, Delhi High court

दिल्ली उच्च न्यायालय का एक आदेश दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) के लिए जी का जंजाल बन गया है। आदेश भी ऐसा है कि जिससे ईओडब्ल्यू के अधिकारियों और कर्मियों का पसीना थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सात जुलाई को अपने एक आदेश में कहा था कि बिल्डर्स के खिलाफ ठगी की जितनी भी शिकायतें हैं, उन सबकी अलग-अलग एफआईआर दर्ज की जाए। ईओडब्ल्यू के पास ऐसी शिकायतों की संख्या 20 हजार से ज्यादा है। 

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लगेगा 10 साल से ज्यादा का वक्त

अगर ईओडब्ल्यू का यही स्टाफ सारे मामलों की जांच करता है, तो उसमें दस साल से ज्यादा का समय लग जाएगा। अमूमन ऐसे केसों में ईओडब्ल्यू एक ही प्रोजेक्ट की सभी शिकायतों की संयुक्त एफआईआर दर्ज कर लेती है। शिकायतकर्ता का बयान लेकर मामला संयुक्त एफआईआर में शामिल कर दिया जाता है। अब ईओडब्ल्यू हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए तमाम औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं। ईओडब्ल्यू का प्रयास है कि किसी भी तरह से सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट का आदेश निरस्त कराया जाए।

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हाईकोर्ट ने प्रक्रिया पर उठाए थे सवाल

दिल्ली हाईकोर्ट ने सात जुलाई को बिल्डर्स के खिलाफ एक मामले की सुनवाई के दौरान यह आदेश दिया था। अदालत का कहना था कि बिल्डर्स से संबंधित या किसी अन्य मामले में कोई व्यक्ति ठगी का शिकार होता है, तो उसके केस की गहराई से जांच पड़ताल होनी चाहिए। अभी ईओडब्ल्यू ऐसी सभी शिकायतों को एक संयुक्त केस में तब्दील कर उनकी जांच करती है। अदालत का मानना था कि यह सही प्रक्रिया नहीं है और सभी लोगों को न्याय नहीं मिल पाता है। ऐसे मामलों की अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर जांच होनी चाहिए।

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एक ही झटके में बीस हजार से अधिक नए केस

ईओडब्ल्यू के सूत्र बताते हैं, मौजूदा वक्त में आर्थिक अपराध से जुड़े करीब दो हजार मामलों की जांच चल रही है। पिछले साल करीब 714 मामलों की जांच पेंडिंग थी। साल दर साल ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है। ईओडब्ल्यू ने 185 लोगों को आर्थिक अपराध के मामले में वांटेड घोषित कर रखा है। इसी तरह के 24 दूसरे केस भी हैं, जिनकी फाइनल रिपोर्ट सौंपना अभी बाकी है। अगर हाईकोर्ट के आदेश का पालन होता है, तो ईओडब्लू के पास एक ही झटके में 20 हजार से ज्यादा नए केस दर्ज हो जाएंगे।


ईओडब्ल्यू ऐसी शिकायतों की छंटनी करती है। जिसमें यह देखा जाता है कि ऐसे कितने केस हैं जो एक ही बिल्डर के खिलाफ हैं। ऐसे केसों की संख्या हजारों में होती है। ईओडब्ल्यू इस तरह के सभी मामलों में शिकायतकर्ताओं का बयान लेकर उसे एक ही एफआईआर का हिस्सा बना देती है।

केवल 200 का स्टाफ

ईओडब्ल्यू में एक स्पेशल सीपी है, जिसकी मंजूरी के बिना नई एफआईआर दर्ज नहीं होती है। इनके बाद एक एडीशनल सीपी, दो डीसीपी और चार एसीपी होते हैं। इंस्पेक्टर या सब-इंस्पेक्टर स्तर के जांच अधिकारी यानी आईओ को मिलाकर यह संख्या पचास के आसपास चली जाती है। बाकी एएसआई, हलवदार और सिपाही सभी को मिलाकर भी ईओडब्ल्यू का स्टाफ दो सौ से ज्यादा नहीं है।

चार्जशीट तैयार करने में कई माह

ईओडब्ल्यू को एक एफआईआर को दर्ज करने और उसकी फाइनल चार्जशीट तैयार करने में कई माह लग जाते हैं। कई केसों में वांटेड और भगोड़े भी होते हैं। कई कंपनियों का जाल इतने बड़े क्षेत्र में फैला होता है कि उसकी जांच के लिए स्टाफ को दूसरे शहरों की खाक छाननी पड़ती है। ऐसी स्थिति में बीस हजार से ज्यादा नई एफआईआर दर्ज करना और केस को उसके परिणाम तक पहुंचाना मुश्किल होगा।

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