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कोरोना की लड़ाई में देश को राह दिखा सकता है दिल्ली मॉडल, एक लाख से ज्यादा लोग ठीक होकर पहुंचे अपने घर

Thu, 23 Jul 2020 11:08 AM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 23 Jul 2020 11:08 AM IST
सार

  • होम आइसोलेशन पर था विवाद, लेकिन इसी से ठीक हुए 80 फीसदी से ज्यादा मरीज     
  • संक्रमण से बचने की चिंता और भावनात्मक सहारे के लिए होम आइसोलेशन को बेहतर समझ रहे मरीज
  • तेज टेस्टिंग, छोटे-छोटे कंटेनमेंट जोन बनाने और प्लाज्मा थेरेपी से घटी संक्रमितों की संख्या, लगी मौतों पर लगाम  

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Delhi corona model can show the path to the country in the battle against covid 19, recovery rate reached more than one lakh
Corona Delhi Model - फोटो : PTI (for Reference)

विस्तार

जिस समय देश कोरोना के मोर्चे पर कठिन संघर्ष कर रहा है और लगभग 40 हजार नए केस रोज सामने आ रहे हैं, दिल्ली ने कोरोना की लड़ाई में पूरे देश को एक राह दिखाई है। दिल्ली में कोरोना पीड़ितों की कुल संख्या सवा लाख को भी पार कर चुकी है, लेकिन अब सक्रिय मामलों की संख्या केवल 15288 ही रह गई है।

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यानी 1.06 लाख से ज्यादा लोग ठीक होकर अपने घरों को जा चुके हैं। इसमें भी बेहतर संदेश यह रहा है कि ठीक होने वालों में 80 फीसदी से ज्यादा लोग ऐसे हैं, जिन्होंने किसी अस्पताल में जाकर इलाज कराने की बजाय अपने घर पर होम आइसोलेशन में इलाज कराया है।
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बेड्स की कमी से जूझ रहे राज्यों को यह आइडिया कुछ राहत दे सकता है। इस समय भी कुल सक्रिय मामलों 15288 में 8126 लोग होम आइसोलेशन में ही स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं।  
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इस ‘दिल्ली मॉडल’ पर टिप्पणी करते हुए बीएल कपूर अस्पताल के डॉक्टर संदीप नायर ने कहा कि कोरोना हम सबके लिए नया था। हम समझ नहीं पा रहे थे कि इससे लड़ाई का सबसे बेहतर तरीका क्या होना चाहिए। लेकिन जल्दी ही अनुभव ने हमें यह सिखा दिया कि कोरोना के 70 से 80 फीसदी मामले बेहद हल्के लक्षण वाले या बिलकुल लक्षण नहीं दिखने वाले थे।

ऐसे लोगों को अस्पताल में भर्ती रखने का कोई औचित्य नहीं था, इससे गंभीर मरीजों को बेड उपलब्ध कराने में भी समस्या आ सकती थी। लेकिन होम आइसोलेशन का आइडिया बेहद कारगर साबित हुआ। इसे देश के अन्य हिस्सों में भी अपनाया जाना चाहिए।

अस्पताल क्यों नहीं?

एक मीडिया कंपनी में काम कर रहीं एक महिला इस समय घर पर रहकर होम आइसोलेशन में अपना इलाज करा रही हैं। उन्होंने अस्पताल की बजाय होम आइसोलेशन में रहकर इलाज कराना बेहतर क्यों समझा? इस सवाल पर उन्होंने बताया कि उन्हें लगता है कि घर पर इलाज कराना ज्यादा सुरक्षित है।

डॉ. लाल पैथलैब्स से टेस्ट कराने के बाद जैसे ही उन्हें पता चला कि वे कोरोना पॉजिटिव हैं, उन्होंने स्वयं को आइसोलेट कर लिया। घर पर संक्रमण का कोई खतरा नहीं है, जबकि अस्पताल में उन्हें सबसे ज्यादा डर इसी बात का है कि कहीं उनकी स्थिति इससे ज्यादा गंभीर न हो जाए। अब वे एक प्राइवेट अस्पताल की सलाह लेकर अपना इलाज करा रही हैं और बेहतर रिकवरी कर रही हैं।     
 
होम आइसोलेशन में मरीजों को सबसे ज्यादा सकून इस बात का है कि उन्हें कुछ होने पर उनके परिवार के लोग उनके साथ हैं, जबकि अस्पताल में बिलकुल अलग-थलग पड़ जाने के बाद उनकी देखभाल कैसे होगी, इसे लेकर लोग आश्वस्त नहीं हैं।

सघन जांच का मिला फायदा

जून महीने में दिल्ली में कोरोना की स्थिति बेकाबू होती हुई दिख रही थी। रोज नये मामलों की संख्या 5-6 हजार तक पहुंच गई थी, तो रोज मौत का आंकड़ा 100 को भी पार कर गया था। यह डरावना था। लेकिन इसके बाद ही दिल्ली ने तेज टेस्टिंग का आइडिया अपनाया।

पहले के लगभग चार हजार के मुकाबले टेस्टिंग क्षमता बढ़ाकर 20 हजार और इससे भी अधिक कर दी गई। इसका लाभ यह हुआ कि एक बार तो कोरोना के मामले तेजी से सामने आये, लेकिन जल्दी ही इस पर लगाम लग गई। अब नये मामलों की संख्या 1000-1400 के बीच रह गई है।

प्रति दस लाख की आबादी पर 44,805 टेस्ट

मंगलवार को दिल्ली में आरटी-पीसीआर सहित 5651 टेस्ट हुए थे। इसके आलावा 15,201 रैपिड एंटीजन टेस्ट भी हुए। इस प्रकार रोज ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग से कोरोना संक्रमित लोगों की पहचान कर सामने लाने और इन्हें स्वस्थ करने में मदद मिली। मौत के आंकड़ों में आई कमी को तेज टेस्टिंग से जोड़कर देखा जाता है।

दिल्ली देश के दूसरे राज्यों से टेस्टिंग के मामले में सबसे आगे है। यहां प्रति दस लाख की आबादी के आधार पर 44,805 टेस्ट हो रहे हैं। यहां अब तक आठ लाख 51 हजार 311 टेस्ट हो चुके हैं।

कंटेनमेंट जोन बनाने का मिला फायदा

दिल्ली ने किसी भी इलाके में तीन केस सामने आने के बाद उसे कंटेनमेंट जोन घोषित कर दिया। इससे इस एरिया को दूसरी जगहों से अलग कर संक्रमित लोगों का सुरक्षित इलाज करना संभव हो गया। इससे दूसरे लोगों तक संक्रमण पहुंचने से रोकने में भी मदद मिली। इस समय दिल्ली में 689 कंटेनमेंट जोन हैं।
 
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पूरे इलाके को एक बार में लॉक करने के खिलाफ थे। वे छोटे-छोटे कंटेनमेंट जोन बनाकर लोगों के इलाज के साथ-साथ बाकी गतिविधियां भी चलाते रहने के पक्ष में थे। लेकिन उपराज्यपाल अनिल बैजल और केंद्र उनके इस रुख से सहमत नहीं था। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को इसे लेकर कई बार एलजी के सामने अपनी बात रखनी पड़ी।

अंतत: केंद्र उनके इस रुख से सहमत हुआ और छोटे कंटेनमेंट जोन का आइडिया काम कर गया। माना जा रहा है कि दिल्ली के मालों में कमी लाने के पीछे यह तरीका बेहद कारगर साबित हुआ है।

प्लाज्मा थेरेपी ने घटाई मृत्यु दर

दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में सबसे पहले प्लाज्मा थेरेपी को आजमाने की अनुमति मिली थी। शुरुआत में इसकी सफलता को लेकर कुछ आशंकाएं जाहिर की जा रहीं थी। लेकिन प्लाज्मा थेरेपी के जरिए कोरोना संक्रमित कई लोगों का बेहतर इलाज हुआ और लोग स्वस्थ होने लगे।

दिल्ली सरकार ने आईएलबीएस अस्पताल में प्लाज्मा बैंक बनाया। शुरूआती झिझक के बाद लोग सामने आये और प्लाज्मा देकर ज्यादा गंभीर लोगों की जान बचाई गई। एक लाख 25 हजार से ज्यादा लोगों के संक्रमित होने के बाद भी यहां मौत का आंकड़ा 3690 तक ही है, जो मात्र 2.94 फीसदी ही है।

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