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अरविंद केजरीवाल को नहीं बड़े चेहरों का साथ पसंद 

Wed, 03 Jan 2018 09:30 PM IST
संजय मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
संजय मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 03 Jan 2018 09:30 PM IST
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Delhi CM Arvind kejriwal is not happy with popular faces of AAP
कुमार व‌िश्वास और केजरीवाल

आम आदमी पार्टी में एक-एक कर हो रही बड़े चेहरों की अनदेखी से यह बात स्पष्ट उभरकर आई है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को बड़े चेहरों का साथ पसंद नहीं है। 

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भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन से लेकर आप के अब तक के सियासी सफर में पार्टी बेशक दिल्ली में अपनी सरकार बचाने में कामयाब रही है। लेकिन उसके बड़े चेहरे उससे दूर जाते रहे हैं। कुछ ने या तो खुद से केजरीवाल का साथ छोड़ दिया। तो कुछ चेहरों को किनारे लगा दिया गया। 
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बुधवार को राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन के बाद केजरीवाल ने पार्टी के लोकप्रिय चेहरा माने-जाने वाले कुमार विश्वास को सियासी रूप से किनारे लगा दिया है। तो पत्रकारिता छोड़ आप की राजनीति में जुड़े आशुतोष कुमार को भी ठेंगा नसीब हुआ है। 
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केजरीवाल ने पुराने नेताओं में महज संजय सिंह पर भरोसा जताया है। शेष दो सीटों के लिए उन्होंने दिल्ली के सियासी समीकरण को ध्यान में रखते हुए सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। 

राज्यसभा उम्मीदवार के चयन में विश्वास की अनदेखी से आप के अंदर केजरीवाल की राजनीति शैली को लेकर नेताओं और कार्यकर्ताओं में रोष लगातार बढ़ता जा रहा है। यह रोष आने वाले दिनों में केजरीवाल को भारी भी पड़ सकता है।

केजरीवाल की जीत में आप की हार 

Delhi CM Arvind kejriwal is not happy with popular faces of AAP

कुमार विश्वास को राज्यसभा भेजने से रोक पाने में अरविंद केजरीवाल बेशक सफल हो गए हैं। मगर उनकी इस जीत में आप की हार नजर आ रही है। आप के कई नेता बेशक अभी खुलकर कुछ नहीं बोल रहे हैं। मगर पार्टी नेताओं के बीच इस बात की चर्चा जोरों पर है कि अपना नेतृत्व सुरक्षित रखने के खेल में केजरीवाल बड़े चेहरों को आगे आने का मौका नहीं दे रहे हैं। उन्हें अपने नेतृत्व को चुनौती का भय सता रहा है। 

पार्टी के नेता और तमाम कार्यकर्ता यह मान रहे हैं कि केजरीवाल के इस खेल से लंबे समय के लिए आप का नुकसान है। विस्तार के बजाय आप सिमटती जा रही है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार पंजाब में आप की सरकार बनती यदि केजरीवाल ने अपने अंदर के भय को दूर कर नवजोत सिंह सिद्धू को अपना लिया होता। मगर वहां भी केजरीवाल को सिद्धू से अपना कद छोटा होता दिखा। 

परिणाम सामने है सूबे में कांग्रेस ने सिद्धू और सत्ता दोनों के मामले में बाजी मार ली। अब कुमार विश्वास सरीखे नेता को दरकिनार करने का खेल आप को और महंगा पड़ेगा। आने वाले दिनों में आप में रार और बढ़ने की संभावना है। कई नेता आप छोड़ भाजपा और कांग्रेस का दामन थामेंगे। 

एक-एक कर दर्जनों चेहरे छोड़ चुके आप का साथ 
केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के राजनीतिक भटकाव से त्रस्त आकर कई नामचीन चेहरे एक-एक कर आप का साथ छोड़ चुके हैं। सबसे पहले केजरीवाल ने राजनीति में उतरने के ऐलान के साथ भ्रष्टाचार आंदोलन के नायक अन्ना हजारे का साथ छोड़ा। तो किरण बेदी भी उनसे दूर चली गईं। 

आंदोलन के वक्त भी केजरीवाल ने योग गुरु राम देव को अन्ना के ज्यादा करीब नहीं आने दिया। तो स्वामी अग्रिवेश को भी बाहर का रास्ता दिखलवाया। उसके बाद आप के सियासी सफर में भी नेताओं के आने-जाने का खेल जारी रहा। 

देश में सूथरी और पारदर्शी राजनीति के नाम पर बनी आप में सियासी षड़यंत्रों का खेल इस कदर हावी हुआ कि देश के जाने-माने वकील शांति भूषण और उनके पुत्र प्रशांत भूषण के साथ योगेंद्र यादव को आप से बाहर होना पड़ा। इसके बाद पार्टी के बड़ा चेहरा रहे संतोष हेगड़े ने भी आप से किनारा कर लिया। तो विनोद बिन्नी को बगावती तेवरों के वजह से बाहर का रास्ता दिखाया गया। 

आंदोलन के वक्त से आप में केजरीवाल के साथ रहीं शाजिया इल्मी भी आप से बाहर निकाली गईं अभी वे भाजपा में राजनीति कर रही हैं। बीते वर्ष कपिल मिश्रा ने केजरीवाल पर सनसनीखेज आरोप लगाते हुए आप का साथ छोड़ा। 

पुराने लोगों में बची केजरी, सिसौदिया और संजय सिंह की तिकड़ी

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आम आदमी पार्टी के इतिहास और उसके नेताओं पर नजर डाले तो प्रमुख नेताओं में आंदोलन के वक्त के बड़े नेता या तो पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं अथवा किनारे लगा दिए गए हैं। पुराने चेहरों के रूप में देखें तो केवल अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और संजय सिंह की तिकड़ी ही प्रभावी भूमिका में बची है।

हालांकि इस तिकड़ी के लंबे समय तक बने रहने के आसार हैं। तीनों ही नेताओं के बीच रिश्तों में अब तक कड़वाहट नजर नहीं आई है। सिसौदिया जहां शुरू से केजरीवाल के साथ हैं तो संजय सिंह ने भी केजरीवाल के सभी फैसलों पर साथ दिया है। पार्टी के अन्य राज्यों में विस्तार का बोझ उनके उपर है। 

गुप्ता बंधूओं के जरिए दिल्ली के कोर वोटरों को साधे रखने की कवायद 
गोवा और पंजाब की असफलताओं के बाद से यह देखने में आया है कि केजरीवाल ने अपने आप को केवल दिल्ली की राजनीतिक तक सीमित कर लिया है। अभी वे दिल्ली में ही आप के किले को मजबूत बनाने में जुटे हुए हैं। शायद यही वजह है कि गुजरात सरीखे महत्वपूर्ण राज्य में भी उन्होंने नाम मात्र के गिने चुने उम्मीदवार ही मैदान में उतारे। उनकी नजर अब लोकसभा चुनाव 2019 के हालातों पर बताई जा रही है। 

बताया जा रहा है कि राज्यसभा में अन्य वरिष्ठ नेताओं के बदले गुप्ता बंधूओं को तरजीह देकर केजरीवाल ने दिल्ली के अपने कोर वोटरों को साधे रखने की कोशिश की है। 2014 के विधानसभा चुनाव में बनिया मतदाताओं ने केजरीवाल का जमकर साथ दिया था।

यही वजह है कि केजरीवाल ने सुशील गुप्ता और एनडी गुप्ता को राज्यसभा में भेजने का निर्णय कर दिल्ली की बनिया बिरादरी को संदेश दिया है। पहले यह बिरादरी परंपरागत रूप से भाजपा की समर्थक रही है। मगर 2014 के चुनाव में इस बिरादरी ने भाजपा का साथ छोड़ केजरीवाल को गले लगाया था। जिसका असर रहा कि 70 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा केवल 3 सीटों पर सिमट कर रह गई थी।

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