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चिंताजनक: टीबी के इलाज में देरी, भारी कीमत चुका रहे मरीज; चार राज्यों के 1482 रोगियों पर सर्वेक्षण में खुलासा
Sat, 15 Jun 2024 05:31 AM IST
विशांत श्रीवास्तव
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: विशांत श्रीवास्तव
Updated Sat, 15 Jun 2024 05:31 AM IST
सार
जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ इंडिया के शोधकर्ताओं ने अध्ययन नागपुर के इंदिरा गांधी सरकारी मेडिकल कॉलेज और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किया है।
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टीबी
- फोटो : ani
विस्तार
भारत में तपेदिक (टीबी) के लक्षण शुरू होने से लेकर जांच और उपचार की शुरुआत तक में काफी देरी हो रही है। इस वजह से मरीजों को इलाज पर भारी खर्च करना पड़ता है। यह खुलासा एक नवीन अध्ययन में हुआ है, जिसके नतीजे पीएलओएस ग्लोबल पब्लिक हेल्थ पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।
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जॉर्ज इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ इंडिया के शोधकर्ताओं ने अध्ययन नागपुर के इंदिरा गांधी सरकारी मेडिकल कॉलेज और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की टीबी उन्मूलन रणनीति के तहत किए गए अध्ययन में पीड़ित परिवारों के लिए बिना खर्च के इलाज हासिल करने के लिए देशों के लिए एक खाका तैयार किया गया है। अध्ययन के दौरान भारत में इस बीमारी के कारण होने वाले आर्थिक नुकसान के चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं। 2022 में पूरी दुनिया में टीबी के 24.2 लाख मामले पाए गए। भारत के चार राज्यों असम, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 1,482 टीबी रोगियों के समूह पर सर्वेक्षण किया गया।
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...ताकि ज्यादा समय तक न देनी पड़े दवा
तपेदिक संक्रामक रोग है, जिसके संक्रमण की दर बहुत अधिक है। हर व्यक्ति की बीमारी की स्थिति, उम्र और रहन-सहन की आदत के आधार पर डॉक्टर दवा की मात्रा निर्धारित करता है। इसलिए लक्षणों का पता चलते ही शीघ्र उपचार शुरू करने पर खर्च भी कम आता है और बीमारी का निदान भी जल्दी होता है। साथ ही ज्यादा समय तक दवा देनी की जरूरत नहीं पड़ती। अध्ययन रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि जांच से पहले की देरी को कम करना नीतिगत प्राथमिकता होनी चाहिए। अध्ययन के नतीजे मरीजों और देश पर इस बोझ को कम करने के लिए नीति और सार्वजनिक हस्तक्षेप दोनों की तुरंत जरूरत की बात को उजागर करते हैं।
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देरी की वजह से दूसरों को भी दी बीमारी
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि लक्षण शुरू होने से लेकर इलाज शुरू होने तक औसतन सात से नौ सप्ताह की देरी हुई। यह आमतौर पर स्वीकृत देरी की अवधि से दोगुनी है। देरी की वजह से मरीजों में से 30 से 61 फीसदी को बार-बार परामर्श, जांच और यात्रा पर अनावश्यक भारी खर्च का बोझ उठाना पड़ा। साथ ही इस अवधि के दौरान मरीजों ने बीमारी को दूसरों तक भी फैलाया।