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साझेदारी: यूरोप को रक्षा सामान निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बना भारत, कितने करोड़ तक पहुंचा निर्यात?

Fri, 23 Oct 2026 10:50 PM IST
हिमांशु सिंह चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Fri, 23 Oct 2026 10:50 PM IST
सार

भारत का रक्षा निर्यात रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है और रक्षा सचिव के मुताबिक, देश यूरोप को हथियार निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बन गया है। ‘रीआर्म यूरोप’ पहल से भारतीय कंपनियों को अवसर मिले हैं। भारत 80 से अधिक देशों को रक्षा सामान बेच रहा है। क्या इससे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी? रूस पर निर्भरता कितनी कम हुई और यूरोप के साथ साझेदारी आगे कैसे बढ़ेगी? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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India Becomes Europe’s 3rd-Largest Arms Exporter: Defence Exports Reach ₹38,424 Crore
रक्षा मंत्रालय - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भारत के रक्षा उद्योग ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह के मुताबिक, भारत यूरोप को हथियारों का निर्यात करने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश बनकर उभरा है। देश का रक्षा निर्यात बढ़कर रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो करीब 3.6 अरब यूरो के बराबर है। यूरोप की ‘रीआर्म यूरोप’ पहल के तहत रक्षा सामग्री की बढ़ती मांग और भारत में रक्षा उत्पादन के विस्तार से निर्यात को बढ़ावा मिला है। भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री बेच रहा है।

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रक्षा सचिव ने शुक्रवार को बताया कि यूरोप में रक्षा जरूरतें बढ़ने से भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं। इस मांग के तहत मानक गोला-बारूद, तोप के गोले और छोटे-बड़े कैलिबर के गोला-बारूद का निर्यात बढ़ा है। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में भारत के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में बड़ा विस्तार हुआ है। देश में 16 बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियां, करीब 840 बड़ी और मध्यम निजी कंपनियां तथा स्टार्टअप सहित लगभग 17,000 छोटे उद्यम इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इस औद्योगिक विस्तार का असर घरेलू बिक्री पर भी पड़ा है, जो अब करीब 17 अरब यूरो तक पहुंच गई है।
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यूरोप में भारतीय रक्षा सामान की मांग क्यों बढ़ रही है?
रक्षा सचिव के अनुसार, यूरोप की रीआर्म यूरोप पहल के कारण रक्षा सामग्री की मांग बढ़ी है। इससे भारत को गोला-बारूद और अन्य सैन्य सामान की आपूर्ति बढ़ाने का अवसर मिला है। भारत का निर्यात केवल भारी हथियारों या तोप के गोलों तक सीमित नहीं है। इसमें हेलमेट, बुलेटप्रूफ जैकेट, छोटे हथियार और अन्य सामरिक उपकरण भी शामिल हैं। राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत यूरोप के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी और बढ़ाना चाहता है। इसके लिए यूरोपीय देशों में संयुक्त उद्यम स्थापित करने की योजना है। इससे भारतीय कंपनियों को यूरोपीय बाजार तक पहुंच बनाने और रक्षा उत्पादन में सहयोग बढ़ाने का अवसर मिल सकता है।
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भारत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनने के लिए क्या कर रहा है?
सरकार की कोशिश है कि हर साल रक्षा क्षेत्र में होने वाले लगभग 20 से 25 अरब डॉलर के पूंजीगत खर्च का 75 प्रतिशत हिस्सा देश के भीतर ही खर्च किया जाए। इसके लिए भारतीय डिजाइन, विकास और विनिर्माण वाले उत्पादों यानी आईडीडीएम को प्राथमिकता दी जा रही है। इसका उद्देश्य देश में ही रक्षा उपकरणों का डिजाइन तैयार करना, उनका विकास करना और उनका उत्पादन करना है। रक्षा सचिव के मुताबिक, इससे भारत की तकनीकी क्षमता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। घरेलू कंपनियों और छोटे उद्यमों की बढ़ती भागीदारी भी इस लक्ष्य को पूरा करने में मदद कर सकती है। भारत अब 80 से अधिक देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है।

रूस पर निर्भरता कितनी घटी, दूसरे देशों से क्या संबंध हैं?
रक्षा सचिव ने बताया कि पहले भारत रक्षा उपकरणों के लिए मुख्य रूप से रूस पर निर्भर था, लेकिन अब आयात के स्रोतों में विविधता आई है। भारत के पास आज भी रूस में बने कई रक्षा उपकरण हैं, लेकिन फ्रांस समेत यूरोपीय देशों के साथ रक्षा संबंध मजबूत हुए हैं। उनके अनुसार, भारत के रक्षा आयात में रूस के बाद फ्रांस की हिस्सेदारी करीब 15 प्रतिशत है। इस्राइल की हिस्सेदारी भी लगभग इतनी ही है। राजेश कुमार सिंह ने हाल में ग्रीस और साइप्रस का दौरा किया था। उन्होंने इन दोनों देशों को भारत के लिए नए साझेदार बताते हुए कहा कि रणनीतिक हितों में समानता के साथ ये यूरोप तक पहुंच बनाने में भी महत्वपूर्ण हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया सहित अन्य क्षेत्रों में भी रक्षा उपकरणों, छोटे हथियारों और तोप प्रणालियों की आपूर्ति को लेकर बातचीत और अनुबंध की प्रक्रिया चल रही है।


भारत और यूरोप के बीच रक्षा साझेदारी आगे कैसे बढ़ेगी?
भारत यूरोपीय देशों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने के अलावा यूरोपीय कंपनियों को भी भारतीय रक्षा बाजार में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहता है। यूरोपीय साझेदार भारत के रक्षा खरीद कार्यक्रमों में हिस्सा ले सकते हैं, लेकिन उन्हें सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ संबंधी शर्तों का पालन करना होगा। रक्षा सचिव ने उम्मीद जताई कि भारत और यूरोप के बीच प्रस्तावित साझेदारी समझौता दोनों क्षेत्रों के रक्षा निर्माताओं की आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक एकीकृत करने में मदद करेगा। इससे रक्षा उपकरणों के उत्पादन और आपूर्ति में सहयोग बढ़ सकता है। भारत का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय मांग के अनुरूप उत्पादन क्षमता बढ़ाना और अपने रक्षा उद्योग को वैश्विक बाजार में और मजबूत बनाना है।

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