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चीन सीमा विवाद पर संसद में बोले राजनाथ, हम सभी परिस्थितियों से निपटने को तैयार
Tue, 15 Sep 2020 04:21 PM IST
अनवर अंसारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अनवर अंसारी
Updated Tue, 15 Sep 2020 04:21 PM IST
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रक्षामंत्री राजनाथ सिंह
- फोटो : PTI
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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर भारत और चीन के बीच जारी गतिरोध को लेकर लोकसभा में बयान दिया। विपक्ष द्वारा लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेरा जा रहा था। ऐसे में रक्षा मंत्री ने एक-एक करके इस मुद्दे पर सरकार की स्थिति स्पष्ट की।
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रक्षा मंत्री ने कहा कि हाल ही में चीन ने लद्दाख में घुसपैठ का प्रयास किया, जिसे भारतीय जांबाजों ने विफल कर दिया। हालांकि, दोनों दी देश चाहते हैं कि सीमा पर तनाव कम किया जाए और शांति बहाल की जाए। लद्दाख में हम एक चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं और हमें प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि पूरा सदन जवानों के साथ खड़ा है।
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राजनाथ ने कहा कि मैंने हाल ही में लद्दाख जाकर जवानों का हौसला बढ़ाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लद्दाख पहुंचकर जवानों से मिले। उन्होंने यह संदेश भी दिया था हम हमारे वीर जवानों के साथ खड़े हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि सीमा पर मैंने वीर जवानों के अदम्य साहस को महसूस किया है। आप जानते हैं कर्नल संतोष बाबू ने मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था।
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रक्षा मंत्री ने कहा, दोनों देश सीमा पर शांति बहाली चाहते हैं। भारत और चीन दोनों सहमत हैं कि भारत-चीन सीमा क्षेत्रों में शांति बनाई रखी जाए क्योंकि यह द्विपक्षीय संबंधों के आगे के विकास के लिए आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि चीन मानता है कि ट्रैडिशनल लाइन के बारे में दोनों देशों की अलग-अलग व्याख्या है। दोनों देश 1960 के दशक में इस पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला है। चीन ने लद्दाख में 48 हजार किलोमीटर क्षेत्र पर अवैध कब्जा किया हुआ था। इसके अलावा पाकिस्तान ने चीन को पीओके की भी कुछ भूमि सौंपी।
राजनाथ ने कहा कि सीमा विवाद एक बड़ा मुद्दा है और इसका हल शांतिपूर्ण और बातचीत के तरीके से निकाला जाना चाहिए। दोनों देशों ने शांति बहाल रखने के लिए समझौते किए हैं। हालांकि, चीन द्वारा इनका पालन नहीं किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि चीन ने 1993 और 1996 के समझौतों का पालन नहीं किया। मई में चीन की वजह से तनाव की स्थिति पैदा हुई है। इसके बाद चीन ने 29-30 अगस्त की रात उकसाने की कार्रवाई की। लेकिन हमारे जवानों ने चीन को सबक सिखाया।
रक्षा मंत्री ने कहा कि भारतीय सैनिकों ने चीन को भारी क्षति पहुंचाई है। इसके लिए हमारे जावनों की भूरि-भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हम भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।
राजनाथ ने कहा कि 1990 से 2003 तक दोनों देशों में मिलीजुली सहमति बनाने की कोशिश की गई, लेकिन इसके बाद चीन इस दिशा में आगे नहीं बढ़ा। अप्रैल माह से लद्दाख की सीमा पर चीन के सैनिकों और हथियारों में वृद्धि देखी गई।
उन्होंने कहा कि चीन ने हमारे जवानों की पेट्रोलिंग के दौरान दखलअंदाजी की, जिस कारण सीमा पर तनाव की स्थिति बनी। लेकिन हमारे जवानों ने शौर्य दिखाया और चीन के मंसूबों पर पानी फेर दिया। हमारे जवानों ने जहां शौर्य की जरूरत थी शौर्य दिखाया और जहां शांति की जरूरत थी शांति रखी।
रक्षा मंत्री ने कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी चीनी विदेश मंत्री से कहा कि अगर समझौतों को पालन किया जाए तो शांति बहाल की जा सकती है। मैं सदन में यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हम किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के भाषणों और बयानों से सेना के जवानों के बीच इस बात का संदेश गया है कि देश उनके साथ खड़ा है। लद्दाख में हम एक चुनौती के दौर से गुजर रहे हैं और हमें प्रस्ताव पारित करना चाहिए कि पूरा सदन जवानों के साथ खड़ा है।
रक्षामंत्री के बयान के दौरान संसद में पीएम की गैरमौजूदगी पर कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस ने भारत-चीन सीमा विवाद पर रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के बयान के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सदन में गैरमौजूदगी पर सवाल उठाया है। कांग्रेस ने सरकार को 1962 की याद दिलाई जब अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर संसद में दो दिन चर्चा हुई थी।
लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, संसद में इतने महत्वपूर्ण विषय पर बयान होना था और प्रधानमंत्री नदारद रहे। उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री ने कहा था न कोई घुसा था, न कोई घुसा हुआ है। चौधरी ने आरोप लगाया कि गलवां घाटी में हमारे 20 जवानों की शहादत पर उनके पास जवाब नहीं है इसलिए वह सदन में चर्चा कराने में डरते हैं। अगर हमारा दिल साफ है, हमारे अंदर हिम्मत है, तो चर्चा से क्यों डरेंगे?
वहीं, लोकसभा में उपनेता गौरव गोगोई ने कहा, कांग्रेस उसूलों को मानती है। हमारे लिए देश सर्वोच्च है। चौधरी ने कहा, 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ तब विपक्ष के नेता वाजपेयी ने चर्चा कराने की मांग की थी। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ने सहमति जताई और लगातार दो दिन सदन में चर्चा हुई। चौधरी ने कहा, हम यही परंपरा सदन में देखना चाहते थे, लेकिन सरकार के सामने हमारी गुहार, अर्जी, हमारी गुजारिश का मूल्य नहीं है। हमें सदन में नहीं बोलने दिया गया। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पूछा, प्रधानमंत्री नेतृत्व की नाकामी का जवाब देश की संसद को देने से क्यों भाग खड़े हुए?