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CRPF: UPSC से एक साथ पासआउट, मगर प्रमोशन में पिछड़े, कुछ बलों में CO-2IC बने, तो कई सीआरपीएफ में एसी ही रहे

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 07 Nov 2023 04:22 PM IST
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सार
पदोन्नति में हो रही देरी को लेकर सहायक कमांडेंट प्रजीत सिंह, दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे थे। इसके बाद सीआरपीएफ डीजी द्वारा एक स्पीकिंग ऑर्डर निकाला गया। उस आदेश में पदोन्नति में देरी का कोई हल नहीं निकल सका। ऐसे तर्क दिए गए कि दूसरे बलों जितनी तेज पदोन्नति, सीआरपीएफ में संभव नहीं है...
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CRPF: why This batch of UPSC lagged behind in promotion
Paramilitary forces: CRPF - फोटो : Amar Ujala/Rahul Bisht

विस्तार

देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में सीधी भर्ती के माध्यम से भर्ती हुए सहायक कमांडेंट (डीएजीओ), पदोन्नति के मोर्चे पर पिछड़ गए हैं। खास बात है कि यूपीएससी द्वारा भर्ती ये अधिकारी, एक ही बैच के हैं, मगर पदोन्नति के मामले उनके बीच काफी दूरी हो चुकी है। कुछ बलों में ऐसे अधिकारी अब कमांडेंट या टूआईसी बन चुके हैं, डिप्टी कमांडेंट का भी रैंक भी मिला है। जिन्हें सीआरपीएफ कैडर अलॉट हुआ, वे अधिकांश अफसर 'सहायक कमांडेंट' से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इस बाबत हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट का एक मामला भी सामने आया। पदोन्नति में हो रही देरी को लेकर सहायक कमांडेंट प्रजीत सिंह, दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचे थे। इसके बाद सीआरपीएफ डीजी द्वारा एक स्पीकिंग ऑर्डर निकाला गया। उस आदेश में पदोन्नति में देरी का कोई हल नहीं निकल सका। ऐसे तर्क दिए गए कि दूसरे बलों जितनी तेज पदोन्नति, सीआरपीएफ में संभव नहीं है।

सीआरपीएफ और बीएसएफ में एक जैसी स्थिति

सीआरपीएफ ही नहीं, बल्कि बीएसएफ में भी सीधी भर्ती के जरिए सहायक कमांडेंट बनने वाले अधिकारियों को पदोन्नति में देरी का सामना करना पड़ रहा है। 138वीं बटालियन के सहायक कमांडेंट प्रजीत सिंह के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के जज सुरेश कुमार कैत और नीना बंसल कृष्णा ने 28 मार्च को सरकारी पक्ष से इस बाबत निर्णय लेने की बात कही थी। सीआरपीएफ डीजी ने इस मामले में अक्तूबर के आखिरी सप्ताह में जो आदेश निकाला, उससे बल के याचिकाकर्ता सहायक कमांडेंट निराश हो गए। प्रजीत सिंह व अन्य याचिकाकर्ता, यूपीएससी की 2009 की परीक्षा में शामिल हुए थे। अगले वर्ष उन्हें सीआरपीएफ के 43वें बैच 'डीएजीओ' के तहत सहायक कमांडेंट का पद मिला था। इसी बैच के वे अधिकारी, जिन्हें सीआईएसएफ, एसएसबी या आईटीबीपी कैडर अलॉट हुआ था, अब डिप्टी कमांडेंट, टूआईसी व कमांडेंट बन गए हैं। जिन्हें सीआरपीएफ कैडर अलॉट हुआ था, वे पदोन्नति में पिछड़ गए। उन्हें अभी तक एक भी पदोन्नति नहीं मिल सकी। याचिकाकर्ता का कहना था कि ऐसे में सीआरपीएफ के 'ग्रुप ए एग्जीक्यूटिव कैडर' को पदोन्नति देने के लिए पर्याप्त संख्या में पद सृजित किए जाएं।

कॉमन रिक्रूटमेंट रूल्स बनाए जाएं

प्रमुख याचिकाकर्ता प्रजीत सिंह का कहना था कि यूपीएससी के माध्यम से सीएपीएफ में 'ग्रुप ए एग्जीक्यूटिव कैडर' पद पर चयनित होने वाले सभी अधिकारियों के लिए कॉमन रिक्रूटमेंट रूल्स बनाए जाएं। कम से कम कमांडेंट के पद तक टाइम बाउंड पदोन्नति मिले। मेडिकल कैडर को सामान्य ड्यूटी वाले अधिकारियों के मुकाबले बहुत तेज पदोन्नति मिल रही है। एक न्यूनतम सेवा अवधि पूरी होने के बाद 'पे अपग्रेडेशन' हो। इस संबंध में डीजी डॉ. एसएल थाउसेन ने जो आदेश निकाला है, उसमें कहा गया है कि सभी बलों का अपना एक अलग रोल है। उन्हें कई तरह की भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं। हालांकि सभी बलों का समान महत्व और जिम्मेदारी रहती है। सभी अर्धसैनिक बल सजातीय नहीं हैं। उनका कैडर ढांचा भी यूनिक है। इन बलों को उनकी आपरेशनल क्षमता एवं कार्यात्मक क्षमता के मुताबिक ढाला गया है। ऐसे में विभिन्न बलों में पदोन्नति के नियम/अवसर भी अलग हैं। इसी हिसाब से इनके रिक्रूटमेंट रूल्स तैयार होते हैं। देश की सुरक्षा में सभी बलों का एक अलग रोल है। इन बलों में पदोन्नति या करियर को आगे जाने वाले अवसर भी अलग हैं।

मेडिकल अफसर को लेकर कही ये बात

डीजी थाउसेन ने अपने आदेश में लिखा, दूसरे बलों में या मेडिकल अफसर को जल्द पदोन्नति, याचिकाकर्ता का यह तर्क टिकाऊ नहीं है। मेडिकल अफसरों की पदोन्नति, इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय और गृह मंत्रालय के अलग आदेश हैं। इनकी पदोन्नति की तुलना, रिक्तियां आधारित सामान्य ड्यूटी वाले अधिकारियों की पदोन्नति के साथ नहीं की जा सकती। सभी बलों के अधिकारी यूपीएससी की एक ही परीक्षा पास करते हैं, ऐसे में उनके भर्ती नियम कॉमन हों, ये तर्क भी एक गलतफहमी है। याचिकाकर्ता ने न्यूनतम क्वालिफाइंग सर्विस की अवधि पूरी होने के बाद डीओपीटी के 20 सितंबर 2022 के आदेश के मुताबिक वित्त अपग्रेडेशन देने की बात कही थी। इस मामले में याचिकाकर्ता को चार वर्ष की सेवा अवधि पूरी करने के पश्चात सीनियर टाइम स्केल दिया जा चुका है। इस संबंध में गृह मंत्रालय के 2001 और 2002 के कार्यालय ज्ञापन को आधार बनाया गया है। वित्त अपग्रेडेशन, पदोन्नति और पे स्केल आदि में डीओपीटी के 2009 में जारी आदेश का पालन होता है। ऐसे में यह केस विचार करने के योग्य नहीं है और इस पर विचार करने का कोई मेरिट आधार भी नहीं बनता।

सीआईएसएफ में कमांडेंट को मिला 'एनएफएसजी'

सीआईएसएफ में 2003-2004 में बतौर सहायक कमांडेंट, सेवा में आए अधिकारी अब कमांडेंट बन चुके हैं। गत वर्ष जारी आदेश में उन्हें गैर कार्यात्मक प्रवर कोटि 'एनएफएसजी' प्रदान किया गया था। इन अधिकारियों के लिए वेतन लेवल 13 (123100-215900 रुपये) को स्वीकृति प्रदान की गई। जिन्हें यह वेतनमान मिला है, उनमें कमांडेंट सुनील कुमार सिंह, अमरेंदू माना, रविश कुमार सिंह, रवि कुमार शर्मा, बिधान, राजीव, विकास कुमार, सेन्थिल राजन, शक्तिपाल शेखावत, विवेक आर्य, विशाल शर्मा, दीपक मणी तिवारी, कुमार अभिषेक, अमित कुमार, कुंदन कुमार, अक्षत पटेल, अंसारी मजनुद्दीन, राकेश चौधरी, हरीश कुमार, राज प्रताप, चंचल सरकार और अन्य को गैर कार्यात्मक प्रवर कोटि 'एनएफएसजी' प्रदान किया गया है।

इन बलों में पदोन्नति के लिए इंतजार

सीआरपीएफ में 2003-2005 के बीच सीधी भर्ती के जरिए बतौर 'सहायक कमांडेंट' सेवा में आने वाले अधिकारी अभी तक टूआईसी यानी 'सेकंड इन कमांड' तक पहुंचे हैं। कुछ अफसर डिप्टी कमांडेंट के पद तक ही पहुंच सके हैं। 2008 तक के अधिकारी (38वें बैच से लेकर 42वें बैच तक) अभी तक डिप्टी कमांडेंट हैं। इसके बाद के सभी अधिकारी सहायक कमांडेंट के पद पर काम कर रहे हैं। सीमा सुरक्षा बल 'बीएसएफ' में भी कुछ यही हाल है। पदोन्नति को लेकर इस बल में भी कैडर अधिकारियों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। एसएसबी में 2003 बैच के सहायक कमांडेंट, अब कमांडेंट बन चुके हैं। 2004-2006 के दौरान एसएसबी में आए अधिकारी टूआईसी बने हैं। 2007 से लेकर 2010 के बीच सेवा में आए सहायक कमांडेंट, अब डिप्टी कमांडेंट के पद पर काम कर रहे हैं।

सीआईएसएफ में 40/41 बैच को मिला 'एनएफएसजी'

आईटीबीपी में 2003-2004 के दौरान सेवा में आए अधिकारी अभी टूआईसी तक पहुंचे हैं। 2005-2010 के बीच वाले सहायक कमांडेंट, अब डिप्टी कमांडेंट बन चुके हैं। इसके बाद सेवा में आए अधिकारी, सहायक कमांडेंट ही हैं। यहां पर सीआईएसएफ की बात करें तो 2003-2004 में बतौर सहायक कमांडेंट, सेवा में आए अधिकारी अब कमांडेंट बन चुके हैं। 2006-2007 व 2008 वाले अधिकारी टूआईसी बन गए हैं। 2009 और 2010 के दौरान सेवा में आए अधिकारी अब डिप्टी कमांडेंट बन चुके हैं। सीआईएसएफ में 2008 बैच वाले अधिकारी अब 'पे-बैंड 4' सीनियर कमांडेंट का वेतन पा गए हैं। दूसरी ओर सीआरपीएफ और बीएसएफ में 2008 बैच वाले अभी तक डिप्टी कमांडेंट हैं। सीआईएसएफ में 40/41 बैच के अधिकारियों को गैर कार्यात्मक प्रवर कोटि 'एनएफएसजी' मिल गया है। 'पे-बैंड 4' में कमांडेंट की सेलरी मिल रही है। साथ ही एक रैंक या दो रैंक का फायदा हो जाता है। सेलरी में लगभग 50 हजार रुपये प्रति माह का इजाफा होता है।

लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बावजूद राहत नहीं …

इन बलों में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अधिकारियों को उसका लाभ नहीं मिल सका। 2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरू की, तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की। हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। इसके बाद कैडर अफसरों ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 3 सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। अब कैडर अफसरों में भी यह उम्मीद जगी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे।

रेल मंत्रालय ने दिया, मगर गृह मंत्रालय ने नहीं

रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' भी सीएपीएफ के साथ न्यायालय में सह-याचिकाकर्ता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद रेल मंत्रालय ने न्यायालय के आदेश को अक्षरश: लागू कर दिया। आरपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिल गया। उन्हें एनएफएफयू के सभी लाभ मिल गए और साथ ही उनकी सेवा का नाम बदलकर 'आईआरपीएफएस' कर दिया। कैडर अफसरों के मुताबिक, सीएपीएफ में पुराने सेवा नियमों की आड़ में खंडित एनएफएफयू को न्यायालय के आदेश की व्याख्या कर लागू किया गया है। नतीजा, इससे सीएपीएफ कैडर अफसरों की एक बहुत छोटी संख्या को ही उसका लाभ मिल सका। अधिकांश अफसरों की पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी रही। एक ही न्यायालय के आदेश की विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग व्याख्या कर दी गई। अधिकारियों के मुताबिक, जब तक ओजीएएस 'संगठित सेवा' पैटर्न के अनुसार, भर्ती नियमों/सेवा नियमों में संशोधन नहीं किया जाता है, तब तक ओजीएएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। सीएपीएफ के अधिकारियों की मांग है कि ओजीएएस पैटर्न के अनुसार, संशोधित भर्ती नियम/सेवा नियमों के साथ कैबिनेट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए। अनेकों बार मांग करने के बाद भी उनके सेवा नियम/भर्ती नियम संशोधित नहीं किए गए।

न पदोन्नति मिली और न ही आर्थिक फायदा

कैडर अफसरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी वे दोहरी मार झेल रहे हैं। सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को मनमर्जी से लागू कर दिया है। एनएफएफयू का फायदा देने के लिए पदोन्नति का नियम लागू किया गया। जब पदोन्नति का लाभ नहीं मिल रहा था तो ही सरकार, एनएफएफयू लेकर आई थी। अब जिसकी पदोन्नति हो रही है, उसे ही एनएफएफयू दिया जा रहा है। कैडर अधिकारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना का नोटिस, सर्वोच्च अदालत में फाइल किया गया है। कैडर रिव्यू को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का जो आदेश आया था, वह भी सुप्रीम कोर्ट में है। सर्वोच्च अदालत ने इन दोनों केसों को एक साथ क्लब कर दिया है। मौजूदा स्थिति में अधिकांश कैडर अफसरों को न तो एनएफएफयू का फायदा मिल सका और न ही समय पर उनका कैडर रिव्यू हो सका है। कैडर रिव्यू नहीं होने के कारण सीएपीएफ के ग्राउंड कमांडर व अन्य रैंक वाले अधिकारी पदोन्नति के मोर्च पर बुरी तरह पिछड़ गए हैं। सीधी भर्ती के माध्यम से विशेषकर सीआरपीएफ और बीएसएफ में आने वाले सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति लगभग 15 वर्ष में मिल रही है। डिप्टी कमांडेंट तक पहुंचने में 22 साल तो कमांडेंट के लिए 27 साल लग रहे हैं। डीआईजी, आईजी व एडीजी के पद तक कैसे और कब पहुंचेंगे, इस बाबत अंदाजा लगाया जा सकता है। डीओपीटी नियमों के तहत सीएपीएफ में हर पांच साल बाद कैडर रिव्यू होना जरुरी है। डीओपीटी ने कई बार कहा है कि रिव्यू प्रक्रिया जल्द पूरी करें।

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