छह वीरता पदक पाने वाले कमांडर बोले, घर वालों से गोलियों को बताते हैं शादी में पटाखों की आवाज
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सीआरपीएफ के जांबाज कमांडर नरेश कुमार को अभी सर्विस ज्वाइन किए सात साल हुए हैं। उन्होंने छह साल तक कश्मीर में नौकरी की है। यानी ट्रेनिंग खत्म होते ही कश्मीर भेज दिया गया। उनके सीने पर लटक रहे छह वीरता पदक उनकी बहादुरी का दास्तां सुनाते हैं। तीन वीरता पदक अभी पाइप लाइन में हैं। सहायक कमांडेंट नरेश कुमार बताते हैं कि हमारी आतंकियों से मुठभेड़ चल रही होती है और घर से फोन आ जाता है। परिवार वाले पूछते हैं, कैसे हो। जब तक मैं कुछ बोलता, झट से उनका दूसरा सवाल आ जाता है। अरे कहां हो, ये आवाजें कैसी आ रही हैं।
उस वक्त मैं उन्हें कहता हूं, कुछ नहीं, एक शादी समारोह में आया हूं, पटाखे छूट रहे हैं। यह बात कोई एक दो बार नहीं, कई बार दोहराई जा चुकी है। खास बात है कि पिछले साल भी सीआरपीएफ की 79 वीं वर्षगांठ परेड के अवसर पर तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नरेश कुमार को उनके पराक्रम और बहादुरी के लिए वीरता पदक से सम्मानित किया था। अभी तक नरेश कुमार के नेतृत्व में हुए डेढ़ दर्जन ऑपरेशनों में पचास से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया है।
बता दें कि सहायक कमाडेंट नरेश कुमार साल 2013 में सीआरपीएफ का हिस्सा बने थे। ट्रेनिंग के बाद उन्हें कश्मीर में पहली पोस्टिंग मिली। मंगलवार को डीजी डॉ. एके महेश्वरी ने उनका सम्मान किया। इस गणतंत्र दिवस पर उन्हें पुलिस का वीरता पदक मिला है। एक खास बातचीत में नरेश कुमार ने बताया, उन्होंने कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ कई बड़े ऑपरेशन को लीड किया है। वे घाटी में सीआरपीएफ के विशेष दस्ते में तैनात रहे हैं। हमारी टीम के सदस्यों को एनएसजी की तरह ट्रेनिंग दी जाती है।
करन नगर मुठभेड़ में जो दो आतंकवादी मारे गए थे, उसकी क्विक रिएक्शन टीम को नरेश कुमार ने ही लीड किया था। 15 अगस्त 2016 को जम्मू-कश्मीर के नौहट्टा इलाके में सुरक्षाबलों और आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में भी सीआरपीएफ की क्यूआरटी का नेतृत्व नरेश कुमार ने ही किया था। यहां भी हमारे जवानों ने दो आतंकियों को ढेर कर दिया था। ऐसा नहीं है कि घरवालों को चिंता नहीं होती।
जब वे टीवी पर देखते कि कश्मीर में कोई मुठभेड़ चल रही है और उसमें सीआरपीएफ शामिल है तो उनकी चिंता बढ़ जाती है। अगर उन्हें टीवी पर मुठभेड़ की कोई फुटेज दिख जाती तो वे ज्यादा ही परेशान हो जाते थे। ऐसे में परिवार का फोन आ ही जाता है। उन्हें फोन पर गोलियों की आवाज सुनाई पड़ती है। मैं कहता हूं कि घबराओ नहीं, ये तो पटाखों की आवाज है। यहां शादी में पटाखे छूटना आम बात है।
नरेश कुमार ने बताया कि मेरी पत्नी शीतल रावत भी सहायक कमांडेंट है। खास बात है कि वह मेरी बैचमेट है। पिता सेना से रिटायर हैं। मेरा चचेरा भाई भी आर्मी में है। उसे भी सेना मेडल मिल चुका है। मेरे भाई सॉफ़्टवेयर कंपनी में हैं। चूंकि अब मैं सीआरपीएफ मुख्यालय आ गया हूं, इसलिए परिवार की कुछ चिंता कम हुई है। हमारी टीम ने ही लश्कर ए तैयबा के आतंकी शौकत अहमद, जिसका नाम टॉप 10 आतंकियों की सूची में था, को मार गिराया था। 2018 में मुझे दो वीरता पदक मिले थे। इसके अलावा 11 डीजी कॉमेंडेशन डिस्क मिल चुकी हैं।