MSME के दायरे में आएंगे गौ उत्पाद से जुड़े कारोबार, राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ला रहा है विशेष योजना
- गोवंश संवर्धन, गो उत्पादों को विकसित करने के लिए किए जा रहे रोजगार को एमएसएमई में लाने की तैयारी, मिलेंगी औद्योगिक दर्जे की सुविधाएं
- बेसहारा गोवंश को पालने को भी लाभदायक उद्योग में तब्दील करने की तैयारी
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इस कारोबार से जुड़े लोगों को कर्ज सहित वह सभी सुविधाएं दी जाएंगी, जो मध्यम और लघु स्तर के उद्योगों को विकसित करने के लिए दी जाती हैं। इसका उद्देश्य गौ संवर्धन को एक उद्योग की तर्ज पर विकसित करना है। आयोग को उम्मीद है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों को मजबूत किया जा सकेगा।
डॉक्टर वल्लभ भाई कथीरिया ने अमर उजाला से कहा कि 2017 में हुई गणना के अनुसार देश में लगभग 19 करोड़ गौवंश हैं। बदलते परिवेश में कृषि में गौवंश की महत्ता कम होने और दुग्ध उत्पादन से हीन होने पर गोवंश की उपयोगिता कम हो जाती है। ऐसी स्थिति में इन्हें भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है।
जबकि गोवंश से बनने वाले उत्पाद (गौमूत्र से बनने वाली दवाएं, गोबर से बनने वाले उत्पाद) को बेचकर भी गोवंश से लाभ कमाया जा सकता है। आयोग की कोशिश है कि ऐसे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाए, जिनमें इस तरह की तकनीक का विकास किया जा सके, जिससे दुग्ध क्षमता से विहीन गायों और अन्य गोवंश को पालना बोझ न रह जाए और इसे एक लाभदायक काम बनाया जा सके।
कोरोना काल में बेहद कठिनाई से गुजरे बेजुबानों के हालात
कोरोना काल में केवल इंसानों को ही नहीं, बल्कि बेजुबानों को भी भारी दुर्दशा का सामना करना पड़ा। इस दौरान उनके खाने-पीने के साधन घट गए। लोगों के कामकाज की स्थिति खराब होने से गोशालाओं को दान भी बहुत कम मिला। लिहाजा इस दौरान गोवंश सहित सभी बेजुबानों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
बेजुबानों की इस स्थिति में विश्व हिन्दू परिषद के गौरक्षा विभाग ने बेजुबानों को चारा उपलब्ध कराने का अभियान चलाया। गौरक्षा विभाग के दिल्ली प्रांत प्रमुख वैद्य श्रीभगवान शर्मा ने कहा कि इस दौरान उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से 50 से अधिक गोशालाओं में चारे-पानी का इंतजाम करवाया।
इसके आलावा उन जगहों पर भी चारे-पानी का इंतजाम करवाया गया जहां घुमंतू पशु आ सकें और भोजन कर सकें। लॉकडाउन के समाप्त हो जाने के बाद भी यह काम अभी भी जारी है।
आरएसएस के गौ सेवा गतिविधि विभाग के दिल्ली प्रांत प्रमुख कमल किशोर ने कहा कि वे इस समय भी राजधानी के 700 विभिन्न स्थानों पर चारे-पानी का इंतजाम करवा रहे हैं। लॉकडाउन के समय जानवरों को चारा उपलब्ध कराने में सबसे ज्यादा कठिनाई आई थी, लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद लोग स्वयं आगे आकर भी गो ग्रास उपलब्ध करवा रहे हैं।
उनका प्रयास है कि हर परिवार से कम से कम एक रोटी या गो ग्रास बेजुबान पशुओं को उपलब्ध कराया जा सके। इसके लिए विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है।
दिल्ली में गौशाला
विश्व हिन्दू परिषद और आरएसएस कार्यकर्ताओं के सहयोग से चलने वाली गोपाल गौसदन गौशाला दिल्ली के हरेवली गांव में है। लगभग 15 एकड़ की भूमि पर बनी इस गोशाला में 3200 गोवंश रखने की क्षमता है, लेकिन इस समय इसमें 5500 से अधिक गोवंश का पालन किया जा रहा है।
आचार्य सुशील मुनि गौशाला, घुम्मनहेड़ा में चार हजार तक गोवंश रखने की क्षमता है। श्री कृष्ण गौशाला में 7000 से ज्यादा गोवंश रखने की क्षमता है। इसी प्रकार सुरहेरा की हरे कृष्ण गौशाला में ढाई हजार से अधिक और रेवला खानपुर गौशाला में 3500 गोवंश रखने की व्यवस्था है।
इन गोशालाओं में क्षमता से दोगुने तक गोवंश की सेवा की जा रही है। इससे इन्हें पालन करने वालों के सामने भारी वित्तीय संकट पैदा हो गया है। सरकार या एमसीडी की तरह से कभी-कभी कुछ मदद मिलती है, लेकिन आरोप है कि वह भी ज्यादातर मामलों में नहीं दी जाती।
गोवंश सेवा से जुड़े लोगों का कहना है कि एक गोवंश को चारा-पानी उपलब्ध कराने पर एक दिन में न्यूनतम 80 रुपये की लागत आती है। सरकार को इसे उपलब्ध कराने पर विचार करना चाहिए।