{"_id":"5ad316b74f1c1b63098b4940","slug":"covicts-of-yarwada-prison-in-pune-making-quality-footwear-for-online-sale","type":"story","status":"publish","title_hn":"यरवदा जेल के कैदी बना रहें हैं चप्पल, इनमेट ब्रांड के नाम से हो रही ऑनलाइन बिक्री ","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
यरवदा जेल के कैदी बना रहें हैं चप्पल, इनमेट ब्रांड के नाम से हो रही ऑनलाइन बिक्री
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Updated Sun, 15 Apr 2018 03:52 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
महाराष्ट्र के पुणे की यरवदा जेल के कैदी ऑनलाइन बिक्री के लिए लेदर की चप्पलें बना रहे हैं। उनके द्वारा बनाई गई चप्पलों के ब्रांड का नाम 'इनमेट' रखा गया गया जिसका अर्थ है कैदी। इस पहल की शुरुआत राज्य जेल विभाग और मुंबई स्थित कंपनी द्वारा की गई। ऐसा करने के पीछे इनका उद्देश्य कैदियों को विभिन्न कौशलों से लेस करना था ताकि सजा पूरी होने के बाद जब वह बाहरी दुनिया में काम की तलाश करें तो उन्हें बुनाई और बेकिंग के अलावा भी काम के अवसर मिलें।
विज्ञापन
पुणे की यरवदा जेल में चलने वाली इस वर्कशॉप की शुरुआत डेढ़ साल पहले 10 कैदियों से हुई थी। जिनकी छंटनी टर्ग्स वर्क्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी द्वारा की गई। यहां शुरुआत के छह महीनों तक कैदियों को चप्पल का ऊपरी भाग बनाना सिखाया जाता है। जिन्हें अन्य ब्रांड्स को बेच दिया जाता है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इन्हें पूरी चप्पल बनाने का काम किया जाता है। 'इनमेट' संस्था चलाने वाले दिवेज मेहता का कहना है कि वह प्राथमिक तौर पर उन कैदियों का चुनाव करते हैं जिन्हें पहले से इस काम का अनुभव होता है या जो कि इस काम को लंबे समय तक करने के इच्छुक हों।
विज्ञापन
मेहता ने बताया कि अब इनमेट के साथ काम करने वाले कैदियों की संख्या बढ़कर 60 हो गई है। इसमें 18-65 वर्ष के लोग काम करते हैं। नए कैदी भी इस काम से लगातार जुड़ रहे हैं। टीओआई से बातचीत में उन्होंने बताया जब एक बार कैदी चप्पल का ऊपरी भाग ठीक से बना लेते हैं तो उसके बाद उन्हें पूरी चप्पल बनाने का काम दिया जाता है। जिसकी गुणवत्ता पर पूरा ध्यान दिया जाता है ताकि उनकी ऑनलाइन बिक्री की जा सके। उन्होंने कहा कि जेल नियमों के मुताबिक कैदियों को 55 रुपये प्रतिदिन दिए जाने चहिए लेकिन कंपनी उन्हें 200 रुपये प्रतिदिन का देती है। वहीं टर्गस कंपनी कुछ नई इकाइयां लगाने की योजना बना रही है। जहां कैदी अपनी सजा पूरी करने के बाद भी इस काम को जारी रख सकेंगे।
विज्ञापन