फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Coronavirus: Trafficking and marriage of children in lockdown

कोरोना वायरस: लॉकडाउन में हो रही है बच्चों की तस्करी और शादी

Thu, 03 Sep 2020 10:16 PM IST
बीबीसी Published by: अनिल पांडेय Updated Thu, 03 Sep 2020 10:16 PM IST
विज्ञापन
Coronavirus: Trafficking and marriage of children in lockdown
भारत में बाल विवाह - फोटो : iStock

पंकज लाल का बेटा सिर्फ 13 साल का है। उसे एक दलाल के भरोसे, बिहार से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजस्थान में चूड़ी की फैक्ट्री में काम पर भेजने का फैसला उन्होंने तब लिया जब लॉकडाउन के चार महीनों में उनका अपना ठेला चलाने का काम ना के बराबर रह गया।

विज्ञापन


फोन पर मुझसे कहा कि घर में खाने को कुछ नहीं था, "भूखे पेट तीन बेटे और दो बेटियों का मुंह देखा नहीं गया, दलाल से कहा कि हमें काम दे दो पर उसने कहा बच्चे की उंगलियों के लायक ही काम है, बड़ों की कोई जरूरत नहीं।"
विज्ञापन


जब मैंने पूछा कि डर नहीं लगा छोटे बेटे को भेजते हुए और उसने मना नहीं किया जाने से? तो पंकज फफक कर रो पड़े। दलाल ने बेटे को काम सिखाने के बाद उन्हें महीने का 5,000 रुपये भेजने का वायदा किया था।
विज्ञापन
विज्ञापन


लॉकडाउन से जुड़ी आवाजाही पर लगी रोकटोक के बावजूद दलाल उनके बेटे समेत दो दर्जन लड़कों को एक लग्जरी बस में बिहार से जयपुर तक, कई राज्यों के बॉर्डर पार करवाने में कामयाब रहा।

लेकिन चूड़ी की फैक्ट्री पहुंचने से ठीक पहले बस जयपुर में पकड़ी गई। पंकज का बेटा अब वहां के बाल गृह में है। क्वारंटीन की मियाद पूरी होने के बाद बाकी बच्चों के साथ उसे घर पहुंचा दिया जाएगा।

पंकज ने कहा, "मुझसे भूल हो गई, दिमाग़ में तब बस आ गया तो भेज दिया, पर हमें ठोकर लग गई, अब कभी नहीं करेंगे, दो जून की रोटी खाएंगे पर बच्चे को बाहर नहीं भेजेंगे।" पंकज का मामला अब बाल सुधार समिति और स्थानीय ग़ैर-सरकारी संगठन, 'सेंटर डायरेक्ट' की नजर में है ताकि वो दोबारा अपने किसी भी बच्चे को बाल मजदूरी में धकेलने की कोशिश ना करें।

भारत में बाल मजदूरी एक बड़ी समस्या है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में पाँच से 14 साल की उम्र के करीब 26 करोड़ बच्चों में से एक करोड़ बाल मजदूरी करने को मजबूर थे। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद देश के सबसे ज्यादा (4,51,590) बाल मजदूर बिहार राज्य में थे।

लॉकडाउन और बाल तस्करी
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक बिहार में बाल तस्करी बहुत व्याप्त है, और साल 2018 में बिहार में लगभग रोज एक बच्चा तस्करों के चंगुल से छुड़ाया गया। गरीबी और जागरूकता की कमी के चलते, बच्चों की तस्करी के व्यापार को पनपने के लिए मानो लॉकडाउन में अनुकूल परिस्थितियां मिल गई हैं।

सेंटर डायरेक्ट के सुरेश कुमार के मुताबिक तस्करी के मामले पिछले साल की तुलना में दोगुने हो गए हैं, "पिछले महीनों में ये बड़े पैमाने पर हुआ है, गांव के गांव ख़ाली हो गए हैं, ट्रेन नहीं तो बसें सही, तस्करों ने बच्चों को भगाने के नए रास्ते निकाल लिए हैं और छोटी-पतली उंगलियों के काम की माँग है तो बेरोजगारी से परेशान मां-बाप उसकी पूर्ति के लिए बच्चे देने को तैयार हो जाते हैं"।

लॉकडाउन से पहले भी राजस्थान की चूड़ी फैक्ट्रियों में काम करने के लिए बिहार से बच्चों की तस्करी की जाती रही है। तस्करों को पकड़ना बड़ी चुनौती है और वो अक्सर जुर्माना देकर छूट जाते हैं।

पिछले सालों में सामाजिक कल्याण विभाग, श्रम विभाग, पुलिस और ग़ैर-सरकारी संगठनों के तालमेल से कुछ तस्करों की गिरफ्तारी हुई है और तस्करी के मामलों में गिरावट भी दर्ज की गई है पर ये व्यापार ताकत, पैसे और जरूरत के बल पर अब भी मजबूत है।

सुरेश बताते हैं, "साल 2016 में बिहार से जयपुर बच्चों की तस्करी करनेवाला एक शख़्स पकड़ा गया और तीन साल बाद उसे उम्र कैद की सजा हुई, लेकिन उसके बाद शिकायत करनेवाला परिवार अग़वा कर लिया गया, ये दिखाता है कि तस्कर बहुत ताकतवर होते हैं, उन्हें सुरक्षा हासिल है, और उनके जाल को तोड़ना बहुत मुश्किल।"

17 घंटे काम, खाने को खिचड़ी

तस्करी का अनुभव नवयुवक की जिंदगी पर गहरा असर छोड़ सकता है। बिहार का रहनेवाला 15 साल का मुकेश, जयपुर की चूड़ी फैक्टरी में सात महीने काम करने के बाद मई में आख़िर अपने घर लौट पाया।

मुकेश ने बताया कि पिता को टीबी होने की वजह से वो खेतिहर मजदूरी नहीं कर पा रहे थे और परिवार को महाजन का कर्ज चुकाना था, जिस वजह से जब तस्कर उनके घर आया वो काम करने को तैयार हो गया। लेकिन ये फैसला ग़लत था।

फोन पर बातचीत में उसने कहा, "फैक्ट्री में सुबह सात बजे से रात 12 बजे तक काम करना पड़ता था, खाने को सिर्फ खिचड़ी मिलती थी और बहुत सी गालियां, महीने का 2,500 रुपये देने का वायदा किया था पर 1,000 भी नहीं दिया, मैं अब ऐसे काम कभी नहीं करूंगा"।

पंकज लाल के बेटे की ही तरह मुकेश भी तस्करों के चंगुल में फंसने से पहले स्कूल जाता था। उसके भी पांच भाई-बहन हैं, पर इस वक्त सब घर पर हैं। दो छोटी बहनों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी गई है। लॉकडाउन की वजह से बंद हुए स्कूल ऐसे ग़रीब परिवारों के बच्चों की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल सकते हैं।

बाल विवाह पर युनीसेफ के एक विशेष प्रोग्राम में काम कर रहे अंतरराष्ट्रीय एनजीओ, ऐक्शन एड की स्मिता खानजाओ के मुताबिक, "इस वक्त की परिस्थितियों में ग़रीबी से जूझ रहे परिवारों में लड़कों को बाल मजदूरी में धकेला जा रहा है और लड़कियों की शादी करवा दी जा रही है, लड़कियों को तो वैसे ही पढ़ाई नहीं करने दी जाती, एक बार स्कूल छूट जाए तो लौटना और मुश्किल हो जाता है"।

13 की उम्र में हो जाती शादी
बच्चों के ख़िलाफ अपराध जैसे बाल विवाह, बाल मजदूरी, तस्करी इत्यादि पर सरकार द्वारा चिन्हित संस्था, 'चाइल्डलाइन', के आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन में ढील देने के बाद बाल विवाह के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है।

जून और जुलाई 2019 के मुकाबले जून और जुलाई 2020 में 17 फीसद ज्यादा मामले सामने आए हैं। हालांकि वो ये भी बताते हैं लॉकडाउन से पहले जनवरी और फरवरी में भी साल 2019 के मुकाबले मामलों में 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई।

ओडिशा की रानी आठवीं क्लास में पढ़ती थी जब लॉकडाउन हो गया। स्कूल बंद हो गया और घर में पिता टीबी की बीमारी से लड़ रहे थे। उन्होंने ही उस पर शादी का दबाव डाला। शादी हो भी जाती पर रानी ने 'चाइल्डलाइन' को संपर्क किया और समय रहते सब रुकवा दिया। उसने अपनी एक सहेली की शादी ऐसे ही होती देखी थी और वो इससे बचना चाहती थी।

रानी के पिता की कुछ ही दिनों में मौत हो गई। वो अब भी लड़ाई लड़ रही है कि उसे बोझ ना समझा जाए बल्कि पढ़-लिख कर रोजगार कमाने का मौका दिया जाए। फोन पर बातचीत में मुझसे कहा, "अपने लिए ख़ुद कमा पाना बहुत जरूरी होता है, पता नहीं क्यों सबको लड़की की शादी की इतनी जल्दी होती है, अब तो पिता जी भी नहीं हैं, मैं कॉलेज तक पढ़ूंगी और घर चलाने में मदद करूंगी।"

लॉकडाउन के दौरान बच्चियों की शादी के पीछे एक वजह ये भी है कि कई प्रवासी मर्द वापस गांव लौट आए हैं, लड़कियां स्कूल की जगह घर पर हैं जिससे परिवार उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।

भाग कर कर ली शादी

लेकिन सिर्फ परिवार ही शादी करवा रहे हों ऐसा भी नहीं है। कई मामलों में लड़कियां ख़ुद अपने अनिश्चित भविष्य को देखते हुए अपनी पसंद के लड़के के साथ शादी करने की कोशिश कर रही हैं।

जैसे ओडिशा की 14 साल की वनीता के साथ हुआ। 25 साल का एक आदमी जो ट्रक ड्राइवर का काम कर रहा था, अप्रैल में अपने गांव लौट आया और क्वारंटीन सेंटर में रह रहा था। उसी दौरान दोनों में दोस्ती हुई और उन्होंने भागकर शादी करने की कोशिश की।

ऐक्शन एड के प्रियाब्रत सत्पथी बताते हैं कि ओडिशा के इस तटवर्ती इलाके में लड़कियों की जल्दी शादी का प्रचलन है। वो कहते हैं, "कई लड़कियां सोचती हैं कि अगर हमें बोझ समझकर, पढ़ाई छुड़वाकर शादी किया जाना ही हमारी नियति है तो क्यों ना हम अपना मनपसंद साथी चुनें।"

गरीब मछुआरे परिवार में पली बढ़ी वनीता की इस योजना की जानकारी मिलने पर स्थानीय पुलिस ने शादी रुकवा दी। पर मां-बाप ने वनीता को घर वापस लेने से मना कर दिया। उनके मुताबिक इस सबसे उनकी बेइज्जती हो गई थी, "बच्चों की शादी मां-बाप को ही तय करनी चाहिए, यही हमारी रीत रही है।"

जब उनसे पूछा कि कम उम्र में शादी पर उनका क्या विचार है तो उन्हें उससे कोई परेशानी नहीं थी, "जब अच्छा रिश्ता आ जाए तब शादी कर देनी चाहिए, बस रिश्ता ठीक होना चाहिए।" पुलिस के दबाव में मां-बाप ने वनीता को घर में वापस ले लिया है और वनीता के मुताबिक, उसका होने वाला पति उसके 18 साल के होने का चार साल लंबा इंतजार भी करने को तैयार है।

वनीता के गांव के सरपंच कहते हैं कि मां-बाप थोड़े पढ़े-लिखे हों तो बेटी को बोझ समझनेवाली मानसिकता उन पर इतना हावी ना हो और अपनी बेटियों को पढ़ाने पर पैसा ख़र्च करें तो वो भी इन रीत-रिवाजों के दबाव में ऐसे कदम ना उठाएं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed