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कोरोना: सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी मुफ्त जांच से क्यों कतरा रही हैं निजी लैब

Fri, 10 Apr 2020 03:27 AM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: योगेश साहू Updated Fri, 10 Apr 2020 03:27 AM IST
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coronavirus or Covid-19: In wake of Supreme Court order, private labs urge govt to reimburse testing costs
कोरोना वायरस - फोटो : PTI

देशभर में कोरोना वायरस के बढ़ते संकट को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि मान्यता प्राप्त सरकारी और प्राइवेट लैब में कोरोना का टेस्ट मुफ्त होना चाहिए। लेकिन इसके बावजूद निजी लैब इससे कतरा रही हैं। निजी लैब का कहना है कि वह फिलहाल तो टेस्ट मुफ्त में कर देंगी, लेकिन सरकार बाद में इन सभी टेस्ट की लागत राशि की प्रतिपूर्ति करे।

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बता दें कि कोरोना का टेस्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन या आईसीएमआर से मंजूरी वाली लैब में या फिर एनएबीएल से मान्यता प्राप्त लैब में ही होगा। सुप्रीम कोर्ट इस मामले में दो हफ्ते बाद फिर सुनवाई करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने वकील शशांक देव सुधी की याचिका पर सुनवाई के बाद यह निर्देश दिया था।
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कितने रुपये ले रहीं निजी लैब
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले निजी लैब एक नमूने की जांच के लिए 4,500 रुपये तक वसूल रही हैं। कोर्ट ने इसे मनमानी बताया। हालांकि कोर्ट ने थोड़ा नरम रुख अपनाते हुए केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल जनरल तुषार मेहता को सुझाव देते हुए यह भी कहा कि कोई ऐसा तंत्र विकसित किया जाना चाहिए जिसके तहत निजी लैब के टेस्ट राशि को सरकार वापस कर सके।

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क्या है वजह

नैदानिक उद्योग (डायग्नोस्टिक इंडस्ट्री) सुप्रीम कोर्ट के मुफ्त में जांच करने के आदेश के बाद राहत के लिए सरकार की तरफ देख रही है। यदि सरकार से कोई राहत नहीं मिलती है तो एक बार फिर कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को लेकर विचार किया जा रहा है। बहरहाल, निजी लैबों के मुफ्त जांच से कतराने के पीछे की वजह है पीपीई, टेस्टिंग किट, मानव संसाधन, ट्रांस्पोर्टेशन आदि पर आने वाली लागत।

दिल्ली में महाजन इमेंजिग डायग्नोस्टिक सेंटर के संस्थापक डॉक्टर हर्ष महाजन बताते हैं कि हाल—फिलहाल हम फ्री में सभी टेस्ट कर देंगे। लेकिन टेस्ट करने के लिए भी पीपीई की जरूरत होती है, जिसकी कीमत तकरीबन 1500 से 2000 रुपये तक है। इसके अलावा नमूने लाने-जाने के लिए ट्रांस्पोर्टेशन, टेस्ट किट और लैब में टेस्ट करने की प्रक्रिया से जुड़े अन्य खर्चे भी करने होते हैं। 

उन्होंने कहा कि इस सबके लिए रुपये लगते हैं। निजी लैबों से अपेक्षा की जा रही है कि वह परोपकारी गतिविधि के तहत सभी टेस्ट मुफ्त में करें, परंतु सरकार को भी इसमें आई लागत की प्रतिपूर्ति करनी चाहिए। भले ही वह बाद में ही क्यों ना ऐसा करे।

उन्होंने कहा कि कोरोना के कारण स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने वाले अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर और पैथोलॉजी लैब पहले से ही संकट में हैं, क्योंकि लॉकडाउन के कारण सामान्य दिनों के मुकाबले में उनके काम में 10 से 20 फीसदी तक कमी आई है। 

उन्होंने कहा कि कई लैब अपने कर्मचारियों का वेतन देने और जांच के खर्च की पूर्ति के लिए कर्ज तक ले रही हैं। ऐसे में मुफ्त जांच करना संभव नहीं है, क्योंकि सबकुछ पैसे से ही चलता है। इस सबके अंत में कई लैब संचालकों को अपना काम बंद ही करना पड़ सकता है।

इन्होंने शुरू की मुफ्त जांच

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद डॉक्टर लाल पैथ लैब और मैक्स लैब ने मुफ्त में कोरोना की जांच करना शुरू कर दिया है। मैक्स लैब ने आधिकारिक बयान में कहा है कि वह सरकार की ओर से दिशा—निर्देशों के आने का इंतजार कर रही है। वहीं डॉक्टर लाल पैथ लैब के चेयरमैन डॉक्टर अरविंद लाल ने भी यही बात कही है।

वहीं पारस हेल्थकेयर के डॉ. शंकर नारंग ने कहा कि कहा कि यदि मुफ्त में जांच की जाती हैं तो इससे गरीबों को फायदा होगा। परंतु बिना सरकारी मदद के यह पूरी तरह से संभव नहीं है। हमें कार्य करने लायक लागत तो निकालनी ही होगी। इसमें सरकार का सहयोग मिलने से बात बन सकती है। कई अस्पताल भी कोरोना का टेस्ट कर रहे हैं।

नारंग ने कहा कि सरकार को चाहिए कि वह निजी संस्थानों को टेस्ट किट मुहैया कराए या फिर सरकार जांच की लागत की बाद में प्रतिपूर्ति कर दे। इस संकट के समय में कई लोग मदद के लिए हाथ आगे बढ़ा रहे हैं, ऐसे में इस माध्यम से इकट्ठा हुई राशि का इस्तेमाल मुफ्त जांच के लिए किया जा सकता है।

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