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मजदूरों का छलका दर्द : खाना मिलता तो तंबू में रह लेते, यूं चोरों की तरह न भागते

Sun, 29 Mar 2020 06:13 AM IST
अमित कुमार अमित शर्मा, नई दिल्ली  
अमित शर्मा, नई दिल्ली   Published by: अमित कुमार Updated Sun, 29 Mar 2020 06:13 AM IST
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coronavirus Lockdown:  migrant workers say if they get food then why they left delhi
corona virus lockdown - फोटो : अमर उजाला

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का दावा है कि सरकार 550 रैन बसेरों/सेंटरों में 4.50 लाख गरीबों को दोनों समय का खाना उपलब्ध करा रही है। कई सामाजिक-धार्मिक संगठन भी गरीब मजदूरों को खाना उपलब्ध करा रहे हैं। मगर दिल्ली से भागते गरीबों की सुनें तो समझ में आता है कि सरकार की यह मदद अभी भी सभी जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है।

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मकान मालिक ने सामान फेंक दिया
लखनऊ के मलीहाबाद की रहने वाली गुड़िया ने रुंधे गले से सवाल किया कि अगर उन्हें खाना मिल ही जाता तो रात में चोरों की तरह क्यों भागते? मकान मालिक ने उनका सामान निकालकर बाहर फेंक दिया था। लेकिन अगर खाना मिल गया होता तो कहीं टेंट में ही रहकर जिंदगी गुजार लेते। जब खाना नहीं मिला तो वे अपनी किस्मत के भरोसे तीनों बच्चों के साथ निकल पड़ीं। वे आनंद विहार रेलवे स्टेशन की रेल पटरियों के सहारे लखनऊ के लिए निकल चुकी हैं। सड़क से जाते समय उन्हें पकड़े जाने का डर है। उन्हें अपनी मंजिल कब मिलेगी, अपने घर तक कैसे पहुंचेंगी, इसका कोई अंदाजा नहीं है। रास्ते में बच्चों की भूख कैसे मिटेगी, इस सवाल पर उनकी आंखें केवल आसमान की ओर उठ जाती हैं। उनके गले से कोई आवाज नहीं निकलती।
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शिकायत किससे करते
यूपी के सुल्तानपुर के रहने वाले महेश बताते हैं कि लगभग 15 दिन हो गए, उनके पास कोई काम नहीं है। खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं है। दिल्ली सरकार के रैन बसेरों या स्कूलों में भी उन्हें खाने की कोई व्यवस्था होती नहीं दिखी तो पैदल ही घर जाने का निर्णय कर लिया। अब वे अपने चार अन्य साथियों के साथ सुल्तानपुर के लिए निकल चुके हैं। लगभग 650 किलोमीटर का दिल्ली से सुल्तानपुर का उनका सफर कैसे गुजरेगा, इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं है।
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क्या आपने किसी सरकारी अधिकारी या पुलिस से इस बात की शिकायत की कि आपको भोजन नहीं मिल रहा है? इस सवाल पर महेश का कहना है कि शिकायत किससे करते। उनकी कोई नहीं सुन रहा है। सबके साथ एक ही समस्या है। ऐसे में किसी से शिकायत करने की बजाय अपने घर की राह पकड़ ली। उनके साथ जा रहे बस्ती के नान्ह्क बताते हैं कि किसी को कोई सुविधा नहीं मिल रही है।     

बस मिलने की खबरों से हुई भगदड़
शनिवार शाम तक ऐसी खबर आई कि यूपी सरकार ने लोगों को उनके घरों तक जाने के लिए बसें उपलब्ध करवा दी हैं। इस एक खबर ने यूपी-बिहार के गरीब मजदूरों में भगदड़ जैसी स्थिति पैदा कर दी। सभी लोगों को लगा कि अब उनके लिए बसें मिल जाएंगी। यही कारण है कि शनिवार शाम को भारी संख्या में लोग आनंद विहार बस अड्डे पहुंचने के लिए निकल पड़े। लेकिन बस अड्डे पर ऐसे यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा है और बसें नाम मात्र की हैं, लिहाजा लोग किसी भी हालत में यहां से निकल जाना चाहते हैं।
  

इसलिए रेल पटरियों से सहारे चले
भारी संख्या में ये प्रवासी मजदूर पैदल ही सड़क के सहारे अपने घरों के लिए निकल चुके हैं। मगर शनिवार शाम को आनंद विहार बस अड्डे पर इन्हें यह खबर लगी कि बीच रास्तों में पुलिस प्रशासन उन्हें पकड़ रहा है। पकड़े जाने के डर से लोग रेल की पटरियों के सहारे जाने के लिए निकल चुके हैं। इनके मजदूरों के दलों में न खाने की कोई व्यवस्था है और न ही कोरोना के संक्रमण का कोई डर दिख रहा है। बस किसी भी हालत में ये लोग अपने घरों को पहुंचना चाहते हैं और उसके लिए अपने घरों की ओर निकल चले हैं।

सुरक्षा बड़ा खतरा
सड़क या रेल पटरियों के सहारे अपनी मंजिल की ओर निकल चुके इन लोगों की सुरक्षा आने वाले समय में बड़ा विषय बन सकता है। इन छोटे-छोटे दलों में महिलाएं और बच्चे हैं। कुछ कपड़े और कुछ बेहद जरुरी सामान लेकर लोग निकल पड़े हैं। लेकिन रास्ते में इनकी सुरक्षा कैसे होगी, इसकी कोई जानकारी किसी के पास नहीं है। इन्हें भी मालूम है कि इनकी सुरक्षा खतरे में है। सुरक्षा का सवाल पूछने पर आज़मगढ़ के नवीन कुमार ने कहा, हमारी जिन्दगी तो पहले ही खतरे में है। बच गये तो घर पहुंचेगे, लेकिन यहां रुकेंगे तो भूख से ही मरना निश्चित है।    

एक-दो दिन में सब होगा सही
कोरोना संक्रमण फैलने के डर से लॉकडाउन हुई दिल्ली से यूपी-बिहार भागने वालों में गुड़िया जैसे हजारों लोग हैं। इन सबकी कहानी लगभग एक जैसी है। सबके दर्द एक जैसे हैं और सबके सवाल भी एक जैसे हैं, लेकिन इन सवालों का फिलहाल जवाब किसी के पास नहीं है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली से किसी को भागने की कोई जरूरत नहीं है। सरकार सबकी मदद के लिए पहुंच रही है। किसी जगह कोई कमी रह गई है तो एक-दो दिनों में सब ठीक कर लिया जायेगा। लेकिन मुख्यमंत्री की तरह इन गरीबों के पास एक-दो दिन का टाइम नहीं है। अपनी किस्मत के भरोसे वे निकल पड़े हैं।
 
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