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SC: शौचालयों की बदतर स्थिति पर भड़का सुप्रीम कोर्ट, कहा- ये अदालत में आने वालों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

Tue, 21 Oct 2025 03:52 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पवन पांडेय Updated Tue, 21 Oct 2025 03:52 PM IST
सार

देशभर के अलग-अलग उच्च न्यायालयों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट पेश की गई है। जिसमें ये बताया गया कि मेट्रो शहरों के उच्च न्यायालयों में भी शौचालयों की खराब स्थिति कोई अलग मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और वित्तीय असफलता का संकेत है।

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Continued unhygienic state of washrooms violation of fundamental rights of court users, SC told
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

देशभर के अदालत परिसरों में शौचालयों की लगातार गंदगी और अस्वच्छता अदालत उपयोगकर्ताओं के मौलिक अधिकारों और गरिमा का उल्लंघन करती है। यह जानकारी अलग-अलग उच्च न्यायालयों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत की गई स्थिति रिपोर्ट में दी गई। रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि मेट्रो शहरों के उच्च न्यायालयों में भी शौचालयों की खराब स्थिति कोई अलग मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और वित्तीय असफलता का संकेत है। इसमें पैसे का सही उपयोग नहीं होना, रखरखाव के अनुबंधों को लागू न करना और जवाबदेही की कमी शामिल है।
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सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता में असफलता
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा शौचालय और बुनियादी ढांचा आधुनिक और समावेशी सार्वजनिक सुविधा के मानक पूरे नहीं करते। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता में असफलता का संकेत है। 
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  • विकलांग लोगों के लिए सुविधाओं की कमी- कई उच्च और जिला न्यायालयों में रैंप, सहारा देने वाली बार और व्हीलचेयर के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। यह विकलांग अधिकार अधिनियम के तहत समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार का उल्लंघन है।
  • तीसरे लिंग (ट्रांसजेंडर) के लिए अलग या जेंडर न्यूट्रल शौचालयों की कमी मौलिक अधिकार और गरिमा की अनदेखी है।
  • महिला वकीलों और कर्मचारियों के लिए क्रेच या बच्चों की देखभाल की सुविधाओं की कमी उनके पेशेवर अधिकारों में बाधा डालती है और न्यायिक पेशे में लिंग समानता को प्रभावित करती है।
  • उपसंचालन न्यायपालिका में स्थिति सबसे गंभीर है। इसके लिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर विकास किया जाए, जिसमें स्थानीय जरूरतों का आकलन, बजट आवंटन और समुदाय स्तर पर निगरानी शामिल हो।
सुविधाओं की खराब स्थिति गरिमा को पहुंचाती नुकसान
सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि इन सुविधाओं की खराब स्थिति ग्रामीण इलाकों में न्यायाधीशों और कर्मचारियों के काम करने की परिस्थितियों, स्वास्थ्य और दक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है, और न्यायालय की गरिमा को भी नुकसान पहुंचाती है। यह रिपोर्ट वकील राजीब कलिता की तरफ से दायर पीआईएल (जनहित याचिका) के तहत प्रस्तुत की गई थी।

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सरकारों को सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही दिए थे आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने 15 जनवरी को आदेश दिया था कि सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध कराना राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है। सभी उच्च न्यायालयों, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को पुरुष, महिला, विकलांग और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग-अलग शौचालय उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अदालत परिसरों में सभी प्रकार के उपयोगकर्ताओं के लिए साफ-सुथरे और समावेशी शौचालय सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
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