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लद्दाख में ड्रैगन: विपक्ष बोला- प्रधानमंत्री ने शी जिनपिंग से की 18 मुलाकातें, फिर भी एलएसी के 18 किमी अंदर तक घुसी पीएलए

Thu, 17 Jun 2021 02:07 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 17 Jun 2021 02:07 PM IST
सार

भारतीय रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला के मुताबिक, पिछले एक साल में गलवान घाटी के हालात में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। भारत का राजनीतिक नेतृत्व यह दर्शाना चाहता है कि चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा नहीं किया है। सरकार अपनी नाकामी छिपाना चाहती है, लेकिन अगर हम ये ज़ाहिर करेंगे कि हमारी ज़मीन पर किसी का कब्ज़ा नहीं है तो हम उसे वापस कैसे मांगेंगे...

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Congress questioned Narendra modi, after 18 meetings with Xi Jinping how chinese army intrusion 18 km inside LAC in eastern Ladakh
पीएम मोदी और शी जिनपिंग - फोटो : ANI (File)

विस्तार

लद्दाख की गलवान घाटी में चीन के सैनिकों के साथ हुई झड़प के एक साल बाद भी मुद्दा नहीं सुलझ सका है। भारत ने यह बात स्वीकार की है कि दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया अभी तक पूरी नहीं हुई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने यह बात कह चुके हैं कि डिसइंगेजमेंट की प्रक्रिया का पूरा होना अभी बाकी है। दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने गलवान घाटी और उसके आसपास चीन की मौजूदा स्थिति को लेकर पीएम मोदी से कई सवाल पूछे हैं। उन्होंने कहा, मोदी ने चीनी राष्ट्रपति से 18 बार मुलाकात की है। ऐसा करने वाले वे भारत के अकेले प्रधानमंत्री हैं। इस बीच चीनी सेना भी 'एलएसी' के 18 किलोमीटर अंदर डेपसांग के 'वाई जंक्शन' तक तक आ गई। श्रीनेत ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछा है कि विस्थापित होने के चार महीने बाद और कोर कमांडर-स्तरीय वार्ता के दो महीने बाद भी हॉट स्प्रिंग, गोगरा और डेपसांग में चीनी सैनिक बैठे हैं। उन्हें सामरिक महत्व वाली जगह से वहां से कब तक खदेड़ा जाएगा।

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पूर्वी लद्दाख में चीन के आगे बढ़ने का मतलब

केंद्र सरकार ने फरवरी में गाजे-बाजे के साथ डिसइंगेजमेंट का ढोल पीटा था। उसके बाद भी चीन क्यों और कैसे कई रणनैतिक जगहों पर घुसपैठ करके बैठा हुआ है, कांग्रेस नेता श्रीनेत ने मोदी सरकार से यह सवाल किया है। इससे एक बात को साबित होती है कि एलएसी पर संघर्ष वाले इलाकों में अभी भी चीन की सेना पीछे नहीं हटी है। सामरिक मामलों के विशेषज्ञ अजय शुक्ला ने कहा है, बीते एक साल के दौरान भारत चीन के बीच सीमा पर जारी गतिरोध ने दोनों देशों के आपसी संबंधों को काफी हद तक बदल दिया है। चीन ने सीमा पर 1959 में किए दावे को फिर से दोहराया है। इस तरह की चाल वह पहले भी चलता आया है। अगर भारत इसे स्वीकार करता है तो सीमा पर सामरिक महत्व का बहुत सारा इलाका चीन के हिस्से में चला जाएगा। पूर्वी लद्दाख में चीन के आगे बढ़ने का मतलब भारत की सैकड़ों वर्ग किलीमीटर की जमीन पर चीन का स्वामित्व हो जाएगा। कई दौर की बातचीत के बाद दोनों देश पैंगोंग झील के इलाके में अपनी सेना को पीछे करने पर सहमत हुए हैं, लेकिन चीन ने हॉट स्प्रिंग, गोगरा पोस्ट और डेपसांग से वापसी का संकेत नहीं दिया है।

कैलाश रेंज से सेना क्यों हटाई

श्रीनेत का कहना है कि आज देश जानना चाहता है कि फरवरी में जब सरकार ने डिसइंगेजमेंट की बात कही थी तो चीन क्यों और कैसे कई रणनीतिक जगहों पर घुसपैठ करके बैठा हुआ है। अपने पराक्रम एवं शौर्य की बदौलत जिस कैलाश रेंज पर भारतीय सेना ने कब्जा किया था और जिससे चीन को भी खतरा था, वहां से सेना को हटाने का पाप क्यों किया गया। चीन ने सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण एलएसी के 18 किलोमीटर अंदर तक डेपसांग के 'वाई जंक्शन' तक घुसपैठ कर रखी है। भारतीय सेना को अपने ही पैट्रोलिंग पाइंट्स पीपी-10, पीपी-11, पीपी-11A, पीपी-12 एवं पीपी-13 तक जाने से रोक रखा है। इससे दौलतबेग ओल्डी हवाई पट्टी को भी खतरा है। जब सेना ने पराक्रम दिखा कर कैलाश रेंज पर कब्ज़ा किया तो चीन घबरा गया था। मोदी सरकार अपनी सेना के साथ खड़ी होती, इसके विपरित सरकार ने सेना को पीछे हटने का फरमान जारी कर दिया। यही वो जगह थी, हम चीन को नाक रगड़ने के लिए मजबूर कर सकते थे। इसी कारण अब चीन को बाकी जगहों से पीछे धकेलने में दिक्कत हो रही है। मौके का फायदा उठाकर चीन ने एलएसी पर फोर्टिफिकेशंस खड़े कर दिए। एयर स्ट्रिप के जरिए तमाम एयर बेस व एयरफील्ड को अपग्रेड कर लिया है। चीन ने अरुणाचल प्रदेश में 100 घरों का गांव बसा दिया।

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क्या कहते हैं दोनों देशों के रक्षा विशेषज्ञ

लद्दाख में चीन शुरू से ही यह दावा करता रहा है कि मौजूदा तनाव के लिए भारत सरकार की आक्रामक नीति ही जिम्मेदार है। चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी से सेवानिवृत सीनियर कर्नल जोहू बो ने मीडिया को दिए बयान में कहा था, चीन के दृष्टिकोण से देखें तो भारत, लद्दाख की गलवान घाटी में रोड और दूसरे निर्माण कार्य कर रहा है। चीन का दावा है कि ये कार्य उसकी सीमा में हो रहे थे। जोहू बो के मुताबिक, चीन परंपरागत तौर पर भारत-चीन की सीमा रेखा के पक्ष में था, लेकिन भारत 1962 से पहले लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर जोर दे रहा था। लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल कहां से कहां तक मानी जाए, इसे लेकर दोनों देशों में अभी तक बुनियादी तौर पर मतभेद रहे हैं। भारतीय रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला के मुताबिक, पिछले एक साल में गलवान घाटी के हालात में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। भारत का राजनीतिक नेतृत्व यह दर्शाना चाहता है कि चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा नहीं किया है। सरकार अपनी नाकामी छिपाना चाहती है, लेकिन अगर हम ये ज़ाहिर करेंगे कि हमारी ज़मीन पर किसी का कब्ज़ा नहीं है तो हम उसे वापस कैसे मांगेंगे।

कांग्रेस पार्टी का कहना है, पैंगोंग झील के उत्तरी छोर पर फिंगर-4 से हमारी सेना की पोस्ट को फिंगर-3 पर पीछे हटा लेने की वजह से मोदी सरकार ने बफर जोन अपनी ही सरजमीं में फिंगर-8 और फिंगर-3 के बीच स्थापित किया है। गलवान घाटी में जहां हमारे सैनिकों ने भारत की सरजमीं की सुरक्षा करते हुए शहादत दी, वहां पर पेट्रोलिंग पाइंट 14 से पीछे हमारी सेना को क्यों हटाया गया। चीन ने भारत के साथ सार्वजनिक सीमा वार्ता करने का पाखंड करते हुए, हमारे 1,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर नियंत्रण हासिल किया है।

कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार से मांगा इन सवालों का जवाब

श्रीनेत के अनुसार, पीएम मोदी चीन को लाल आंखें दिखाना तो दूर, उसका नाम लेने से कतराते हैं। मौजूदा तनाव और चीन की धृष्टता के बावजूद चीन 2020 में भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बनकर उभरा है। सरकार ने चीनी एप पर प्रतिबंध लगाने की नौटंकी की है। 2021 के पहले पांच महीनों में ही भारत और चीन के बीच व्यापार में 70 % की वृद्धि हुई। चीन ने इस साल अपने रक्षा बजट में 6.8% की वृद्धि कर 209 बिलियन डॉलर खर्च करने का फैसला किया, तो वहीं मोदी सरकार ने भारत के रक्षा बजट को केवल 1.4% बढ़ाकर 4.78 लाख करोड़ रुपये किया है। मोदी, भारत के अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिनकी 18 बार चीन के प्रमुख से वार्ता हुई है।

साबरमती के तट पर झूले झूलने से लेकर महाबलीपुरम में गलबहियां करने के बाद क्या मोदी देश को बताएंगे कि चीन के साथ निपटने की उनकी रणनीति आखिर क्या है। गलवान घाटी में जहां हमारे सैनिकों ने भारत की सरजमीं की सुरक्षा करते हुए शहादत दी, वहां पर पीपी 14 से पीछे हमारी सेना को क्यों हटाया गया। सरकार ने 2018 में माउंटेन स्ट्राइक कोर को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया। क्या पीएम ने अपने बहुप्रचारित निजी संपर्क का शीर्ष चीनी नेतृत्व के साथ स्पष्टीकरण मांगने के लिए इस्तेमाल किया और अगर नहीं किया तो इस आत्मीयता का मतलब ही क्या है।

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