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Congress: क्या नई पीढ़ी की सोच नहीं समझ पा रही कांग्रेस, राहुल के करीबी भी क्यों छोड़ रहे हाथ का साथ?

Thu, 04 Apr 2024 07:48 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Thu, 04 Apr 2024 07:48 PM IST
सार

सुष्मिता देव ने 30 साल कांग्रेस के साथ काम करने के बाद तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा, वे महिला कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। गौरव वल्लभ, विजेंदर सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, शहजाद पूनावाला या गुलाम नबी आजाद पर कोई आरोप नहीं थे, उन पर कोई जांच भी नहीं चल रही थी।

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Congress not able to understand thinking of new generation people close to Rahul gandhi are leaving party
नई पीढ़ी की कांग्रेस से दूरी की क्या है वजह? - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ गौरव वल्लभ और बॉक्सर विजेंदर सिंह उस लिस्ट में नए नाम हैं, जिन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है। इसके पहले ऐसे नेताओं की एक लंबी लिस्ट है, जिन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ा और भाजपा, तृणमूल कांग्रेस, सपा-बसपा जैसे किसी अन्य दल में चले गए। कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं का आरोप रहा है कि प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) या सीबीआई जैसी जांच एजेंसियों की कार्रवाई के डर से ऐसे नेता उसका साथ छोड़कर भाजपा में शामिल हो रहे हैं। हाल ही में एक समाचार पत्र में छपे एक लेख के सहारे पार्टी ने कहा कि इन नेताओं पर दबाव डालकर उन्हें भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।  
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हालांकि, यह आरोप पूरी तरह सही नहीं कहा जा सकता। पार्टी में अनेक नेता ऐसे भी रहे हैं जिनके ऊपर किसी तरह के आरोप नहीं थे। उनके ऊपर कोई जांच भी नहीं चल रही थी और वे कांग्रेस में भी अच्छे पदों पर विराजमान थे। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। सुष्मिता देव ने 30 साल कांग्रेस के साथ काम करने के बाद तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा, वे महिला कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। गौरव वल्लभ, विजेंदर सिंह, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, शहजाद पूनावाला या गुलाम नबी आजाद पर कोई आरोप नहीं थे, उन पर कोई जांच भी नहीं चल रही थी। इनमें से कई नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बेहद करीबी थे और कांग्रेस में इनका भविष्य भी सुरक्षित था। वे आर्थिक तौर पर भी बहुत सक्षम और अपने समाज में काफी प्रतिष्ठित भी थे, इसके बाद भी इन बड़े नेताओं ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। इसका कारण क्या था? 
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नई पीढ़ी की नब्ज समझे कांग्रेस
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह ने अमर उजाला से कहा कि हर नेता के लिए यह कहना सही नहीं होगा कि वह सीबीआई या ईडी की जांच के डर से कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं। सत्य यह है कि इस समय देश के साथ-साथ पूरी दुनिया की राजनीतिक धुरी बदल चुकी है। इस समय लगभग हर देश में राष्ट्रवाद और अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने का चलन तेज हुआ है। लगभग हर देश में दक्षिणपंथ की राजनीति मजबूत हुई है। इसी क्रम में भारत में भी राष्ट्रवाद और हिंदुत्व राजनीति के केंद्र में आ गया है। भाजपा को इसका लाभ मिलता दिख रहा है।  
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उन्होंने कहा कि धर्म और राष्ट्रवाद का मुद्दा युवाओं और अन्य लोगों को ज्यादा मजबूती के साथ अपनी ओर खींचता है। दुनिया के कई देशों में हम देख सकते हैं कि वहां बेहद खराब आर्थिक हालात के बाद भी लोग धार्मिक मुद्दों पर राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। लोगों का भाजपा की ओर आकर्षित होने का यह एक बड़ा कारण हो सकता है। 

धर्म के साथ विकास और अर्थव्यवस्था भी
लेकिन भाजपा पर यह आरोप भी नहीं लग पा रहा है कि वह केवल धर्म की राजनीति कर रही है। देश की लगातार आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक मंच पर उसके विकास को मिलती स्वीकृति ने भी लोगों में वर्तमान मोदी सरकार के प्रति लोगों की विश्वसनीयता बढ़ाया है। इस तरह भाजपा के खेमे में राष्ट्रवाद, धर्म, विकास और अर्थव्यवस्था का ऐसा मेल है, जिसका विकल्प विपक्ष के पास दिखाई नहीं दे रहा है। यही कारण है कि भाजपा लगातार सफल होती दिख रही है, जबकि विपक्ष के हाथ असफलता मिल रही है।

विवेक सिंह ने कहा कि कांग्रेस के सामने इस समय दुविधा की स्थिति है। यदि वह हिंदुत्व के रास्ते पर चलती है, तो इस मोर्चे पर भाजपा का दावा उससे कहीं ज्यादा विश्वसनीय और मजबूत है। यदि वह इन मुद्दों का विरोध करती है, तो वह देश के एक बड़े वर्ग के बीच अलोकप्रिय होने का खतरा उठाती है। कांग्रेस इस समय इसी दुविधा में फंसी नजर आती है। उसके नेता भी इस दुविधा को भांप रहे हैं, उन्हें निकट भविष्य में कांग्रेस का भविष्य भी मजबूत नहीं दिखाई दे रहा है, यही कारण है कि वे समय रहते अलग रास्ता अपना रहे हैं। 

'संघर्ष के प्रति अरुचि बड़ा कारण'       
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर डॉ. शालिनी सिंह ने अमर उजाला से कहा कि संघर्ष लोकतंत्र की आत्मा होते हैं। सड़कों पर संघर्ष के सहारे ही लोकतंत्र की नई इबारतें गढ़ी जाती हैं। विश्वविद्यालय इस तरह के अलग विचारों को पैदा करने की प्रयोगशाला होते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से इस समय लोगों में संघर्ष करने की प्रवृत्ति घट रही है। लोग सब कुछ जानते हुए भी लोग अपनी सुविधाा से बाहर नहीं आना चाहते। इस प्रवृत्ति का असर है कि कई बड़ी गलती के बाद भी सत्ताओं को अपने हिसाब से चलते रहने की आजादी मिल रही है। इससे सत्ता पक्ष को लाभ मिलता है, जबकि विपक्षी दलों की स्थिति कमजोर होती है। कांग्रेस के साथ आज यही हो रहा है। उसके कई नेता अब संघर्ष की बजाय सुविधा का रास्ता अपना रहे हैं, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ रहा है।   

डॉ. शालिनी सिंह ने कहा कि यह स्वीकार करना पड़ेगा कि केंद्र सरकार की कई बड़ी गलतियों का भी विपक्ष लाभ उठाने में असफल रहा है। इसका मूल कारण इसी संघर्ष की प्रवृति में कमी है। जिन मुद्दों पर सड़कों पर जितना संघर्ष होना चाहिए था, वह नहीं हुआ। इससे विपक्ष की स्थिति लगातार कमजोर हुई है। विपक्षी दलों की घटती विश्वसनीयता, कमजोर होता संघर्ष और हर कदम पर केंद्र सरकार के नेताओं की लगातार सक्रियता इस नई परिस्थिति को पैदा कर रही है।      

उन्होंने कहा कि एक दौर के बाद हर देश में सत्ता और राजनीति के समीकरण बदलते हैं। ऐसे बदलाव के दौर में इस तरह की चीजें दिखाई पड़ती हैं, जहां पिछले स्थापित मूल्यों के स्थान पर नई मान्यताएं ज्यादा लोकप्रिय हो जाती हैं। चूंकि, कांग्रेस पिछली विचारधारा की पोषक के तौर पर देखी जाती है, और भाजपा नई सोच के साथ खड़ी दिखती है, लोग कांग्रेस से दूर हो रहे हैं और भाजपा के के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। हालांकि, एक समय के साथ लोगों की सोच में बदलाव आता है। फिलहाल, आज का दौर भाजपा के साथ है और इसी दौर को देखते हुए नेता पाला बदल रहे हैं। 

'जनता-नेता से दूर हुई कांग्रेस'
राजनीतिक मामलों के विशेषज्ञ डॉ. परमवीर सिंह ने अमर उजाला से कहा कि गौरव वल्लभ ने कांग्रेस का साथ छोड़ते समय जो बातें कही हैं, उन्हें दूर जाते एक नेता की कोरी बयानबाजी (सनातन विरोध और राम मंदिर पर कांग्रेस की भूमिका के संदर्भ में) कहकर खारिज नहीं करना चाहिए। कांग्रेस नेतृत्व को समझना पड़ेगा कि उसे कहां पर भाजपा-केंद्र सरकार का विरोध करना है, और कहां पर सहमत न होते हुए भी विरोध में नहीं दिखाई देना है। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यकलापों और बड़े नेताओं के बयानों में किसी भी तरह देश के सबसे बड़े वर्ग को उपेक्षित करने की बात नहीं दिखनी चाहिए। लेकिन ऐसे कई प्रकरण हुए हैं, जहां कांग्रेस नेतृत्व इन मुद्दों पर दुविधा में दिखाई देता है। भाजपा को इसी दुविधा का लाभ मिलता है।   


डॉ. परमवीर सिंह ने कहा कि आज कांग्रेस ऐसे कई दलों और संगठनों का खुलेआम समर्थन ले रही है, जिनकी भूमिका संदिग्ध रही है। वे खुलेआम देशविरोधी बयान देते देखे जाते रहे हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस नेतृत्व ऐसे दलों और उनके नेताओं के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो समाज के एक वर्ग में वह अपनी स्वीकार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने का काम करता है। कांग्रेस को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर जेपी नड्डा तक लगातार कार्यकर्ताओं से संपर्क करते, मिलते-जुलते दिखाई देते हैं, जबकि कांग्रेस नेतृत्व की सीमित पहुंच आज के दौर की राजनीति में उसे कमजोर करती है।    
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