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Zakia Jafri Case: जकिया जाफरी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के असंतुष्ट कांग्रेस, जयराम रमेश ने खड़े किए सवाल

Mon, 27 Jun 2022 07:15 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Mon, 27 Jun 2022 07:15 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने सोमवार को प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अपने बयान में कहा कि जकिया जाफरी की याचिका पर उच्चतम न्यायालय का फैसला बहुत निराशाजनक है। 

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Congress general secretary Jairam Ramesh says SC ruling in Zakia Jafri case deeply disappointing
जयराम रमेश - फोटो : PTI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी की याचिका को खारिज कर दिया था। जिसके बाद कांग्रेस ने अदालत के इस फैसले को निराशाजनक बताया है। उच्चतम न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस ने सवाल किया कि क्या 2002 के सांप्रदायिक दंगों के समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं थे। गौरतलब है कि जकिया जाफरी की याचिका में 2002 के गुजरात दंगे के संबंध में विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी और अन्य को दी गई क्लीन चिट को चुनौती दी गई थी। 
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महासचिव जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर दी प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने सोमवार को प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अपने बयान में कहा कि जकिया जाफरी की याचिका पर उच्चतम न्यायालय का फैसला बहुत निराशाजनक है। उन्होंने इस मामले को लेकर ट्विटर पर अपने आधिकारिक एकाउंट से एक लेटर पोस्ट किया। इसमें उन्होंने एक के बाद एक कई सवाल खड़े किए। उन्होंने सवाल किया, 'क्या व्यापक सांप्रदायिक दंगों के मामलों में मुख्यमंत्री और राज्य सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी होती है? ऐसे मामलों में क्या सिर्फ कलेक्टर और पुलिस उपाधीक्षक की जिम्मेदारी होती है, राजनीतिक पदों पर आसीन लोगों की नहीं? अगर राज्य हिंसा और दंगों की चपेट में जाता है तो क्या मुख्यमंत्री, कैबिनेट और राज्य सरकार कभी जवाबदेही नहीं होगी?'
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कांग्रेस महासचिव ने खड़े किए सवाल
अपने बयान में कांग्रेस महासचिव ने गुजरात में 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों को राज्य सरकार की बुनियादी खामी का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि वे और उनकी पार्टी एहसान जाफरी के परिवार के साथ है। अपने बयान में उन्होंने सवाल खड़ा करते हुए कहा कि जब गुजरात में दंगे हुए तो क्या नरेंद्र मोजी वहां के सीएम नहीं थे? उन्होंने आगे कहा कि ऐसा क्या हुआ था कि तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को उन्हें 'राजधर्म' का पालन करने की याद दिलायी?
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शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी की याचिका को खारिज कर दिया था। इसमें 2002 के गुजरात दंगा मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और 63 अन्य लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा क्लीन चिट दिए जाने को चुनौती दी गई थी। ये याचिका गुजरात दंगों में मारे गए कांग्रेस नेता एहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी ने दायर की थी।

जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'हम एसआईटी रिपोर्ट को स्वीकार करने और विरोध याचिका को खारिज करने के मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखते हैं। इस अपील में मेरिट के अभाव है, इसलिए याचिका खारिज की जाती है।' सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जकिया और संजीव भट्ट सहित गुजरात के कुछ असंतुष्ट अधिकारियों को 2002 के गुजरात दंगों के बारे में झूठे दावे करने के लिए कटघरे में खड़ा करने की जरूरत है। 
क्या था मामला
 एहसान जाफरी गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसाइटी नरसंहार में मारे गए थे। शीर्ष अदालत के समक्ष याचिका में 2017 के गुजरात हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने मामले में एसआईटी द्वारा दायर क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार करने के मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखा था।  गुजरात दंगों के बाद जकिया जाफरी ने 2006 में गुजरात के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक के समक्ष एक शिकायत दर्ज की थी जिसमें हत्या(धारा-302) सहित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की गई थी। शिकायत मोदी सहित विभिन्न नौकरशाहों और राजनेताओं के खिलाफ की गई थी। उस समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। 


जाफरी ने एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के साथ दी थी चुनौती
वर्ष 2008 में शीर्ष अदालत ने एसआईटी का गठन कर दंगों के संबंध में कई ट्रायल पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कहा था। बाद में एसआईटी को जाफरी द्वारा दायर शिकायत की जांच करने का भी आदेश दिया था। एसआईटी की रिपोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट दे दी। वर्ष 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने अपनी क्लोजर रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया और याचिकाकर्ता को उक्त रिपोर्ट पर अपनी आपत्तियां दर्ज करने की स्वतंत्रता दी गई। वर्ष 2013 में याचिकाकर्ता ने क्लोजर रिपोर्ट का विरोध करते हुए एक याचिका दायर की। मजिस्ट्रेट ने एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट को बरकरार रखा और जाफरी की याचिका खारिज कर दी। जिसके बाद जाकिया ने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 में मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखा और जाफरी द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। जाफरी ने एक्टिविस्ट तीस्ता सीतलवाड़ के साथ एसआईटी की क्लीन चिट को स्वीकार करने के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
 
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