महिलाओं को नौकरी नहीं दे रही हैं कंपनियां, ऊंचे पदों पर महज एक फीसदी
महिलाओं की भागीदारी को लेकर बातें जरूर कई वर्षों से उठती आ रही हैं लेकिन आज भी हमारे देश में महज एक फीसदी महिलाएं ही शीर्ष पदों पर पहुंच रही हैं। या यूं कहें कि महज एक फीसदी कंपनियां ही टॉप पोस्ट पर किसी महिला को मौका देती हैं या देना चाहती हैं।
जबकि 40 फीसदी कंपनियों की टॉप पोस्ट पर सिर्फ और सिर्फ पुरुषों का ही अधिकार है। महिलाओं के साथ इस तरह के भेदभाव वाली ये शोध वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक हालिया रिपोर्ट से सामने आई है।
डब्ल्यूईएफ ने कामकाज के दौरान जेंडर गैप का पता लगाने के लिए भारत की 770 कंपनियों पर अध्ययन किया था। फ्यूचर ऑफ वर्क इन इंडिया नाम की रिपोर्ट के मुताबिक देश के कुल वर्कफोर्स में महिलाओं का योगदान महज 27 फीसदी ही है। ये आंकड़ा दुनिया में आदर्श माने गए कामकाजी लोगों से 23 फीसदी कम है। चौंकाने वाली बात यह है कि एक तिहाई कंपनियां तो ऐसी हैं, जहां स्टाफ में कोई महिला है ही नहीं।
जबकि देश में 71 फीसदी कंपनियां ऐसी हैं, जहां महिला कर्मचारी रखी तो गई हैं लेकिन उनकी संख्या 10 फीसदी से भी कम है। देश में महज 2.4 फीसदी कंपनियां ही ऐसी हैं जहां महिलाओं और पुरुषों को बराबर का अधिकार दिया गया है और इन कंपनियों में कर्मचारियों के बीच 50-50 का अनुपात बरकरार रखा गया है।
शोध के दौरान जब कंपनियों से यह पूछा गया कि वो शीर्ष स्थानों पर महिला और पुरुष में से किसे लेना पसंद करेंगे तो चौंकाने वाले साक्ष्य निकल कर सामने आए। शोध में पता चला कि हर 10 में से सिर्फ एक कंपनी ने ही अपने यहां शीर्ष पर महिला अधिकारी को रखे जाने की बात कही, जबकि 36 फीसदी कंपनियों ने साफ-साफ कहा कि वह अपने यहां बड़े पद पर या फिर जिम्मेदारी वाली जगह किसी पुरुष को ही देना पसंद करेंगे।
भारत आगे बढ़ रहा है लेकिन रोजगार के अवसर भी तेजी से कम हो रहे हैं जिससे फ्रीलांसिंग का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। यहां भी महिलाओं के साथ हो रहा भेदभाव साफ-साफ दिखाई दे रहा है। यहां भी जेंडर गैप बरकरार है।
अगर फ्रीलांसर्स की बात करें तो यहां भी पुरुषों ने बाजी मार ली है। फ्रीलांसर्स की 70 फीसदी से ज्यादा वर्कफोर्स पुरुषों की ही है। उसके बाद महिलाओं का नंबर आता है। इस सेक्टर में भी महिलाओं का योगदान तेजी से घट रहा है। पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां महिलाओं का अधिकार 25 फीसदी से ज्यादा घटा है।
टेक्सटाइल और बैंकिंग-फाइनेंस ही ऐसे सेक्टर हैं, जिन्होंने जेंडर गैप के क्षेत्र में अच्छी स्थिति बरकरार रखी है। यहां महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 61 फीसदी है, जबकि टेक्सटाइल के क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति सबसे बेहतर बनी हुई है। यहां 64 फीसदी महिलाओं का अधिकार है।
महिलाओं की सबसे खराब स्थिति रिटेल सेक्टर में है। जबकि शोध के दौरान पाया गया कि 71 फीसदी में 30 फीसदी कंपनियों में महिलाएं रखी ही नहीं गई हैं।
इसी तरह वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम ने ही ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (एआईएसएचई) नाम की रिपोर्ट जारी की है। इससे पता चला है कि हर साल कॉलेजों में दाखिला लेने वाली महिलाओं की संख्या में तेजी से सुधार हो रहा है। कुछ साल पहले तक उच्च शिक्षा से महिलाएं वंचित रह जाती थीं, लेकिन अब अंडरग्रेजुएट साइंस प्रोग्राम में दाखिला लेने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों के लगभग बराबर हो गई है।
वेतनमान के मामले में भी महिलाओं से होता है भेदभाव
सिर्फ काम-काज के मामले में ही महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा रहा है बल्कि वेतनमान दिए जाने में भी उन्हें कमतर रखा जाता है। देश में महिलाकर्मियों की आय पुरुषों के मुकाबले औसतन 16.1 फीसदी कम है, जो कि वैश्विक स्तर पर कमाई में अंतर के बराबर है।
वेतन कम होने की सबसे बड़ी वजह यह है कि ऊंचे वेतन वाले पदों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है। महिलाओं के काम-काज से लेकर वेतनमान को लेकर अकसर ही आवाजें बुलंद होती रही हैं। पिछले दिनों एक और संस्था कॉर्न फेरी सूचकांक ने शोध में बताया कि दुनिया भर में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का औसत वेतन 16.1 फीसदी कम है।
यह हाल तब है जब महिलाएं समान स्तर, समान कंपनी और समान कार्य कर रही हैं। वहीं कुछ अंतरराष्ट्रीय कंपनियां इस गैप को कम करने की कोशिश में लगी है। शोध में सामने आया है कि वैश्विक स्तर पर महिला और पुरुष के समान पद और समान कंपनी में होने पर वेतन का अंतर घटकर 1.5 फीसदी रह गया है। कंपनी और कार्य दोनों समान हो तो यह अंतर घटकर भले ही 0.5 फीसदी रह जाता है लेकिन यह गैप भी एक बड़े गैप की तरह दिखाई देता है।
लेकिन अगर वेतन में अंतर की बात भारत में करें तो समान स्तर की नौकरी में महिला पुरुष के बीच यह औसत अंतर 4 फीसदी है। जब एक ही स्तर की नौकरी और एक ही कंपनी की बात हो तो यह अंतर गिरकर 0.4 फीसदी हो जाता है। जब महिला और पुरुष कर्मचारी एक ही स्तर, एक ही कंपनी और एक ही तरह के काम में हों तो यह अंतर गिरकर 0.2 फीसदी रह जाता है।
कॉर्न फेरी सूचकांक ने दुनिया भर के 53 देशों में 14,284 कंपनियों में 1.23 करोड़ से अधिक स्त्री-पुरुष कर्मचारियों के वेतन और काम पर शोध किया था और उसके बाद यह विश्लेषण जारी किया था।
बोर्ड मेंबर में भी नहीं है महिलाओं की धमक
महिलाओं के कंपनियों में कामकाज से लेकर उनके अधिकार, वेतनमान के बाद बात होती है बोर्ड मेंबर में उनकी धमक की। धीरे-धीरे महिलाओं की स्थिति में सुधार हो रहा है। क्रेडिट स्विस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बोर्ड मेंबर में महिलाओं की संख्या नगण्य है। 2015 में भारतीय कंपनियों में 11.2 फीसदी महिलाओं को बोर्ड का सदस्य बनाया गया जो 2010 के मुकाबले दोगुना था। बता दें कि 2013 में सरकार ने एक नियम बनाया था जिसके बाद सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड में कम से कम एक महिला सदस्य अनिवार्य कर दी गई थीं।
महिलाओं को निदेशक बनाए जाने के विषय में एसबीआई की पूर्व अध्यक्ष अरुंधति भट्टाचार्य ने एक साक्षात्कार में कहा था कि जिस कंपनी की निदेशक पद पर महिलाएं हैं वो ज्यादा बेहतर फैसले ले सकती हैं, क्योंकि महिलाओं का दृष्टिकोण काफी व्यापक होता है।
कई कंपनियों में स्वतंत्र निदेशक के तौर पर काम कर रहीं भारत में एचएसबीसी की पूर्व प्रमुख नैना लाल किदवई के अनुसार धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है और इसमें भी पुरुषों की जिम्मेदारी अहम है। लेकिन भारत में महिलाओं की बोर्ड मेंबर के तौर पर भागीदारी नहीं होने की बड़ी वजह पारिवारिक स्वामित्व वाली कंपनियों का बहुतायत में होना है। शायद यही वजह है कि नैना ने कहा था कि भारत एक पुरुष प्रधान सोच वाला समाज है जहां खानदानी व्यवसाय में महिलाओं को महत्व नहीं दिया जाता है। क्योंकि हमारे समाज में आज भी बेटा ही परिवार के बिजनेस का उत्तराधिकारी होता है। लेकिन धारणाएं बदल रही हैं।
ऊंचे पदों पर आसीन महिलाओं की बात करें तो 2014 में यह आंकड़ा 7.8 फीसदी था जो कि 2016 में घटकर 7.2 रह गया था। अगर दुनियाभर में ऊंचे पदों पर महिलाओं की स्थिति की बात करें तो महज 13.8 फीसदी महिलाएं ही ऐसे पदों पर आसीन हैं।
भारत में हर साल करीब एक करोड़ लोग नौकरी के लिए बाजार में उतर रहे हैं उसमें करीब आधी महिलाएं हैं। शादी के बाद घर की जिम्मेदारियों के बीच अगर महिलाएं काम करना जारी रखेंगी तभी महिलाओं के आंकड़ों में बदलाव हो सकेगा।
कई कंपनियां करती हैं महिलाओं को कम भुगतान
जहां तक महिलाओं को कम वेतन दिए जाने की बात है तो कॉर्न फेरी के रिवॉर्ड्स और बेनिफिट सॉल्यूशंस के प्रमुख बॉब वेसेल कैंपर ने कहा, "अभी भी कई कंपनियां हैं जो महिलाओं को समान भूमिका ( जॉब प्रोफाइल ) के लिए कम भुगतान करती हैं। हालांकि औसत की बात करें तो जब हमने एक ही नौकरी में महिलाओं और पुरुषों की तुलना की, तो अंतर काफी कम हो गया है। "
भारत में स्त्री- पुरुष के वेतन में चीन से अधिक अंतर
भारत में स्त्री-पुरुष के वेतन में अंतर चीन से अधिक है, जो कि 12.1 फीसदी पर है। ब्राजील में वेतन का अंतर 26.2 फीसदी, फ्रांस में 14.1 फीसदी, जर्मनी में 16.8 फीसदी, ब्रिटेन में 23.8 फीसदी और अमेरिका में 17.6 फीसदी है।