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आजादी के रंग : 15 अगस्त 1947 की वो सुबह, कहीं संगीत सभा में तो कहीं कुदरत खुद मना रही थी जश्न
Sun, 14 Aug 2022 06:37 AM IST
योगेश साहू
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: योगेश साहू
Updated Sun, 14 Aug 2022 06:37 AM IST
सार
हलवाई कह रहे थे, “आज जितनी मिठाई खानी है, फ्री में खाओ।” लोग खुश थे कि अंग्रेज अब उन्हें तंग नहीं करेंगे। अड्डे पर खड़े मजदूर हमसे पूछ रहे थे ‘बाबूजी आज क्या खास बात है?’ हम लोग युवा थे। हम सभी को समझा रहे थे कि “देखो भई अब तक हम गुलाम थे, गुलामी की जंजीरें हमारे पैरों में थी। हमें बोलने का अधिकार नहीं था।
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गुंजी में 100 फुट ऊंचा तिरंगा
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
एक आम आदमी की नजर में कैसा था आजादी का दिन? क्या चल रहा था मन में? क्या सोच रहे थे लोग? खुशी से जश्न मना रहे थे या बंटवारे की वजह से आंखें नम थीं? ऐसे बहुत से सवाल मन में आते हैं, लेकिन इनका जवाब सिर्फ उनके पास है, जिन्होंने इस दिन को हकीकत में जीया है।
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संगीत सभा में स्वतंत्रता का उत्सव : लक्ष्मण कृष्णराव पंडित, वरिष्ठ शास्त्रीय गायक
उस समय मैं ग्वालियर में था। उम्र 13 साल की थी। मुझे अच्छी तरह याद है कि तब हमारे घर केसरी समाचार पत्र आया करता था। यह लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का समाचार पत्र था। स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है का उद्घोष करने वाले तिलक के इस समाचार पत्र से हमें स्वतंत्रता संग्राम की सारी जानकारियां मिला करती थीं। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष की गाथाएं पढ़कर हम बालक, देश प्रेम की भावना से भर उठते थे। मुझे याद है कि 15 अगस्त 1947 को हमारे शंकर गंधर्व महाविद्यालय में बहुत बड़ी संगीत सभा आयोजित की गई थी। इस महाविद्यालय की स्थापना मेरे पिता पंडित कृष्णराव शंकर पंडित ने की थी।
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यह संगीत का प्रतिष्ठित और प्राचीन संस्थान है। उस दिन बड़ी भव्य संगीत सभा हुई थी। पिता जी ने उस दिन अपनी प्रस्तुति दी थी। हमारे विद्यालय के विद्यार्थियों और मैंने भी प्रस्तुति दी थी। मुझे यह तो याद नहीं आ रहा है कि पिता जी ने क्या गाया था या हम सबने क्या गाया था, लेकिन वह बहुत भव्य संगीत सभा थी। यहां यह भी उल्लेख करना चाहूंगा कि पिता जी पंडित कृष्णराव शंकर का एक रिकार्ड है, जिसमें बंदिश के बोल हैं, “वंदन भारतीय सरदार, आओ करे राष्ट्र उद्धार।” शायद उन्होंने उस दिन ये भी गाया था।
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कुदरत भी मना रही थी जश्न : जेसी पालीवाल, वरिष्ठ रंगकर्मी
मैं उस वक्त चौदह वर्ष का था। अपने ताऊ जी सीताराम पालीवाल के साथ बरेली में रहता था। 14 अगस्त की रात को आजादी मिलने की खबर आई। उस वक्त बरेली में कोई सामाचार पत्र नहीं निकलता था। न दैनिक, न साप्ताहिक। ऑल इंडिया रेडियो से सूचना मिली कि सुबह जवाहर लाल नेहरू लाल किले पर झंडा फहराएंगे। रात को अचानक से यह सूचना आई तो अलग ही खुशी हुई। यहां के एक बड़े स्वतंत्रता सेनानी, धर्मदत्त वैद्य जी ने मुझसे कहा कि हम सुबह तिलक इंटर कॉलेज से रैली निकालेंगे, तुम भी उसमें सम्मिलित होना। तो हम भी खुशी-खुशी उसमें शामिल हुए। हालांकि, आजादी के बाद बंटवारे की खबर ने माहौल में थोड़ा तनाव ला दिया था। लेकिन, इसके बाद भी लोग बेहद खुश थे। लोग एक-दूसरे से कह रहे थे, लड्डू खा लो, चाय पी लो, नाश्ता कर लो। यहां तक कि नाई की दुकानों पर नाई उस दिन कटिंग फ्री में कर रहे थे।
हलवाई कह रहे थे, “आज जितनी मिठाई खानी है, फ्री में खाओ।” लोग खुश थे कि अंग्रेज अब उन्हें तंग नहीं करेंगे। अड्डे पर खड़े मजदूर हमसे पूछ रहे थे ‘बाबूजी आज क्या खास बात है?’ हम लोग युवा थे। हम सभी को समझा रहे थे कि “देखो भई अब तक हम गुलाम थे, गुलामी की जंजीरें हमारे पैरों में थी। हमें बोलने का अधिकार नहीं था। अगर हम अंग्रेजों के खिलाफ बोले तो हम पर अत्याचार होते थे। अब हम आजाद हैं अग्रेजों से।” तो वो बोले ‘अच्छा साब तो अब कछु बोलें?’ हमने भी बताया कि कछु भी बोलें, अपने अधिकार की बात। उस दिन रैली के बाद बरेली के मोती पार्क में सभा हुई और झंडारोहण किया गया। सुबह रैली के वक्त इतनी घनघोर बारिश थी कि छतरी सेे भी पानी नहीं रुक रहा था। लेकिन, किसी को लग ही नहीं रहा था कि बारिश सेे कोई कठिनाई पैदा हो रही है। लग रहा था कि प्रकृति भी आजादी के जश्न में शामिल हुई है।
चरखे पर साड़ी और सुब्रह्मण्यम भारती के गीत : सरोजा वैद्यनाथन, विख्यात नृत्यांगना
मैं तब नौ साल की थी। मुझे आजादी का दिन अच्छे से याद है। वास्तव में वह न भूलने वाला दिन है। तब हमारे घर में चरखा हुआ करता था। चरखे पर कपड़े बनाना भी एक प्रकार से स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी जैसा था। हमारे अभिभावकों ने हमें कहा था कि विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करना है। मैं चरखे पर साड़ी बनाती थी। तब ऐसी साड़ियां बहुत सस्ती मिलती थीं, एक-दो रुपए में। मुझसे काफी छोटी लड़कियां भी चरखे पर साड़ियां बना लेती थीं और स्वतंत्रता के संघर्ष में अपना इस प्रकार योगदान देकर प्रसन्न होती थीं। चरखा उस समय हर घर में जरूरी था। पहले स्वतंत्रता दिवस पर चेन्नई के हमारे विद्यालय में बहुत भव्य समारोह मनाया गया था। हमने भारत माता की जय, महात्मा गांधी की जय के खूब नारे लगाए। वंदे मातरम गाया। उस दिन खूब उत्साह था। जगह-जगह कार्यक्रम हो रहे थे।
विद्यालय में राष्ट्रभक्ति के गीत गाए गए, भाषण हुए। चरखे की तरह उन दिनों की एक और बात मुझे अच्छी तरह याद है कि सुब्रह्मण्यम भारती के गीत भी उस समय खूब लोकप्रिय थे। वे बहुत बड़े कवि थे, स्वतंत्रता सेनानी भी थे। हर बच्चे को उनके गीत याद थे। इन गीतों को गाकर हममें खूब जोश आ जाता था। हम इन्हें खूब गाया करते थे। प्रथम स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त, 1947 हमारे देश का, हम सब भारतवासियों के जीवन का एक महान दिवस है। मैं उन भाग्यशाली लोगों में हूं, जिन्होंने इस दिवस को देखा और इसका जश्न मनाया। यह वह दिन था, जिस दिन से हमारे देश ने, हम सबने आजाद भारत में रहना शुरू किया। इस सुनहरे दिवस को याद कर मैं आज भी रोमांच से भर उठती हूं। (आलोक पराड़कर और ज्योति राघव से बातचीत पर आधारित)