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Kiren Rijiju: 'जजों को जनता की जांच का सामना नहीं करना पड़ता', कॉलेजियम विवाद के बीच रिजिजू का बड़ा बयान

Mon, 23 Jan 2023 09:08 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Mon, 23 Jan 2023 09:08 PM IST
सार

कानून मंत्री ने कहा, जज बनने के बाद उन्हें चुनाव या जनता की जांच का सामना नहीं करना पड़ता है। जजों के फैसलों और जिस तरह से वे न्याय देते हैं और अपना आकलन करते हैं, उसे जनता देख रही है। 

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collegium controversy Kiren Rijiju said Judges do not have to face public scrutiny
Kiren Rijiju - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बीच जारी टकराव थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस बीच केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि भारत में लोकतंत्र सिर्फ जीवित ही नहीं, बल्कि मजबूती से आगे चले, उसके लिए एक मजबूत और आजाद न्यायपालिका का होना जरूरी है। न्यायपालिका की आजादी को कमजार या उसके अधिकार, सम्मान और गरिमा को कम करेंगे, तो लोकतंत्र सफल नहीं होगा।

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केंद्रीय कानून मंत्री तीस हजारी अदालत परिसर में गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जनता जजों को नहीं चुनती, इसलिए उन्हें बदल भी नहीं सकती है, लेकिन जनता जजों को, उनके फैसलों को, उनके काम करने के तरीकों और न्याय देने के उनके ढंग को भी देख रही है और उनका आकलन कर रही है और उस पर अपने विचार भी बना रही है। सोशल मीडिया के इस युग में कुछ भी नहीं छुपाया जा सकता है।
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रिजिजू ने कहा कि जजों को हमारी तरह चुनाव या आलोचना का सामना नहीं करना पड़ता। जनता हमें दोबारा चुनेगी तो हम सत्ता में आएंगे, नहीं तो विपक्ष में बैठेंगे और सरकार से सवाल करेंगे। दूसरी ओर अगर कोई व्यक्ति न्यायाधीश बनता है तो उसे चुनाव का सामना नहीं करना पड़ता, उसकी कोई सार्वजनिक पड़ताल भी नहीं होती और उससे कोई सवाल भी नहीं पूछा जाता।
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एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि मैंने CJI को एक पत्र लिखा, जिसके बारे में किसी को नहीं पता था। पता नहीं किसे कहां से पता चला और खबर बना दी कि कानून मंत्री ने CJI को पत्र लिखा कि कॉलेजियम में सरकार का प्रतिनिधि होना चाहिए। इस बात का कोई सर पैर नहीं। मैं कहां से उस प्रणाली में एक और व्यक्ति डाल दूंगा।
 

कॉलेजियम में बदलाव को लेकर तेज हुई बहस के बीच उन्होंने कहा कि यह सोचना गलत है कि स्थापित व्यवस्था में बदलाव नहीं हो सकता या उस पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं। 1947 के बाद से न जाने कितने बदलाव हुए हैं। परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्था में बदलाव होता है और इसलिए संविधान में भी 100 से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं। चुनौतियां आती हैं तो बदलाव भी लाती हैं। सुप्रीम कोर्ट भी जब कोई फैसला देता है, तो बड़ी पीठ उसकी विस्तृत व्याख्या कर उसे नया रूप दे देती है।
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