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किराये की कोख के लिए महिला का करीबी होना जरूरी नहीं, बदली जाए बांझपन की परिभाषा : संसदीय पैनल

Wed, 05 Feb 2020 10:39 PM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: आसिम खान Updated Wed, 05 Feb 2020 10:39 PM IST
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Close relative not necessary for a woman to rent womb says Parliamentary panel
प्रतीकात्मक तस्वीर

एक संसदीय पैनल ने सरोगेसी यानी किराये की कोख को लेकर सरकार से एक अहम सिफारिश की है। पैनल ने कहा है कि संतान पैदा करने में अक्षम दंपतियों के लिए करीबी रिश्तेदार के ही सरोगेट मदर (किराये की कोख देने वाली महिला) बनने की बाध्यता को हटाया जाए और किसी भी ‘इच्छुक’ महिला को सरोगेट की भूमिका निभाने की अनुमति दी जाए। साथ ही पैनल ने 35 से 45 साल की उम्र वाली विधवा या तलाकशुदा ‘अकेली भारतीय महिला’ को भी सरोगेसी की सुविधा का इस्तेमाल करने की छूट देने का आग्रह किया है।

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पिछले साल लोकसभा में पारित हो चुके सरोगेसी (नियमन) बिल-2019 में राज्यसभा की 23 सदस्यीय सलेक्ट कमेटी ने कम से कम 15 अहम बदलाव किए जाने की सिफारिश केंद्र सरकार से की है। यह बिल अभी तक राज्यसभा में पारित होना बाकी है। राज्यसभा की तरफ से 21 नवंबर, 2019 को यह बिल मिलने के बाद से कमेटी ने 10 बैठक कर इसकी समीक्षा की। कमेटी के चेयरमैन भूपेंद्र यादव ने बुधवार को अपनी रिपोर्ट पेश की। 
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कमेटी का कहना है कि सरोगेट मदर की भूमिका निभाने के लिए ‘करीबी रिश्तेदार’ को ही चुनने की बाध्यता किसी भी दंपती के लिए विकल्पों को बेहद सीमित कर देती है, जिससे वास्तव में इस सुविधा का लाभ उठाने के इच्छुक दंपतियों को परेशानी उठानी पड़ती है। इसी कारण कमेटी ने इस अनिवार्यता को हटाने की सिफारिश की है। कमेटी ने सरोगेट मदर के लिए प्रस्तावित 16 महीने के बीमा कवर को भी बढ़ाकर 36 महीने करने की सिफारिश की है।
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बदली जाए बांझपन की परिभाषा
कमेटी की तरफ से प्रस्तावित बदलावों में ‘बांझपन’ की परिभाषा को हटाना भी शामिल है, जिसमें कहा गया है कि पांच साल तक बिना किसी निरोधक के संभोग करने के बावजूद बच्चा नहीं पैदा करने पर बांझपन की पुष्टि मानी गई है। कमेटी का कहना है कि एक बच्चे की प्रतीक्षा करने के लिए पांच साल का समय किसी भी वैवाहिक जोड़े के लिए एक बहुत लंबी अवधि है। साथ ही जन्म से गर्भाश्य का नहीं होना, गर्भाश्य का सक्रिय नहीं होना, कैंसर के चलते गर्भाश्य को निकलवाना, फाइबरॉयड्स आदि या गंभीर चिकित्सकीय स्थिति के कारण मरीज के सामान्य गर्भधारण करने पर रोक होने सरीखी बहुत सारी चिकित्सकीय परिस्थितियों के चलते सरोगेसी ही एकमात्र विकल्प होता है।

बच्चे के हित का भी रहे ध्यान
कमेटी ने सरोगेसी के जरिये पैदा होने वाले बच्चे के हित का भी ध्यान रखे जाने की सिफारिश की है। कमेटी ने कहा है कि बच्चे के पितृत्व और कस्टडी से जुड़ा आदेश एक मजिस्ट्रेट के जरिये जारी किया जाए और इसे सरोगेट बच्चे का जन्म शपथपत्र माना जाए।


भारतीय मूल के लोगों को लेनी होगी सरोगेसी बोर्ड से इजाजत
कमेटी ने यह भी प्रस्ताव रखा है कि भारतीय मूल के लोगों (पीआईओ) को सरोगेसी बोर्ड से सर्टिफिकेट ऑफ रिकमंडेशन हासिल करने के बाद देश में सरोगेसी का लाभ उठाने का प्रावधान भी बिल में जोड़ा जाए।

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