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कारगिल की लड़ाई में 'एयरफोर्स' के इस्तेमाल पर अड़े थे पूर्व आर्मी चीफ, तभी निकली 'सीडीएस' की राह   

Sun, 26 Jul 2020 05:54 PM IST
मुकेश कुमार झा डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: मुकेश कुमार झा Updated Sun, 26 Jul 2020 05:54 PM IST
सार

तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ चंद्रशेखर ने कारगिल में वायुसेना की मदद की बात कही, लेकिन वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस इसके समर्थन में नहीं थे। उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना खतरनाक है। उस दौरान 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ' नियुक्त करने की जरुरत महसूस हुई। ऐसा कोई नहीं था जो तीनों सेनाओं का मत सीसीएस के सामने रख सके।

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chief of defence staff CDS path came out in Kargil battle
सीडीएस बीपीन रावत - फोटो : पीटीआई

विस्तार

कारगिल की लड़ाई में किसी को यह नहीं मालूम था कि पाकिस्तान अब आगे क्या करने जा रहा है। कई दिनों तक पाकिस्तान यही कहता रहा कि जेहादियों ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ की है। जब मालूम हुआ कि पाकिस्तानी सेना कई भारतीय चौकियों पर आ बैठी है तो तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल वीपी मलिक ने कारगिल में एयरफोर्स को उतारने की पैरवी की। हालांकि उनकी इस बात को ज्यादा तव्वजो नहीं दी गई।

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कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की बैठक 18 मई 1999 को हुई। इसमें जब एयरफोर्स के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा गया तो उसे मंजूरी नहीं दी गई। मलिक ने अपनी किताब 'फ्रॉम सरप्राइज टू विक्टरी' में लिखा है कि तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ चंद्रशेखर ने कारगिल में वायुसेना की मदद की बात कही, लेकिन वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस इसके समर्थन में नहीं थे। उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना खतरनाक है। उस दौरान 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ' नियुक्त करने की जरुरत महसूस हुई। ऐसा कोई नहीं था जो तीनों सेनाओं का मत सीसीएस के सामने रख सके।
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पूर्व जनरल मलिक के अनुसार, पाकिस्तान ने कारगिल की लड़ाई छद्म आधार पर लड़ी थी। भारतीय सेना, पाकिस्तान द्वारा कब्जाई गई चोटियों को खाली करा रही थी। यह राह हमारे जवानों के लिए आसान नहीं थी, लेकिन वे अपनी बहादुरी के बल पर आगे बढ़ते रहे। चोटियों को फतह भी कर रहे थे।भारत के पास शक्तिशाली वायुसेना थी, मगर शुरुआत में उसके इस्तेमाल को लेकर सहमति नहीं बन सकी। 'सीसीएस' की बैठक में तर्क रखे गए, लेकिन उन्हें नकार दिया गया। तत्कालीन वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ चंद्रशेखर ने वायु सेना के इस्तेमाल पर सबसे पहले जनरल मलिक का समर्थन किया। उनका कहना था कि कारगिल जैसी अपमानजनक स्थिति में वायुसेना की मारक क्षमता का उपयोग किया जाना चाहिए।
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सीसीएस ने उनके प्रपोजल को नकार दिया। इस बाबत यह तर्क दिया गया कि इससे दोनों देशों के हालात और अधिक बिगड़ सकते हैं। ट्रैक-2 डायलाग की संभावना को खत्म नहीं किया जा सकता। बतौर मलिक, हमारा प्रयास था कि कारगिल में जल्द से जल्द वायुसेना अपनी मारक क्षमता दिखाए। इसके लिए उप वायु सेना प्रमुख चंद्रशेखर ने मुझे यह भरोसा दिलाया था कि वे उनके साथ हैं। सीसीएस को बताया गया कि वायुसेना और नेवी के मामले में भारत, पाकिस्तान पर भारी पड़ता है।

23 मई 1999 को फिर बैठक हुई।इसमें नौसेना प्रमुख सुशील कुमार भी शामिल हुए। उन्होंने वायुसेना के इस्तेमाल का समर्थन किया। हालांकि वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस ने उस वक्त तक खुद भी इस पहल को खास तवज्जो नहीं दी। उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना खतरे से ख़ाली नही है। 

कारगिल की लड़ाई में वायुसेना के भीतर दो स्वर सुनाई दिए...

सीसीएस की बैठक में नौसेना प्रमुख सुशील कुमार भी शामिल हुए।जब उनसे वायुसेना के इस्तेमाल को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने इसका समर्थन किया। वहां मौजूद वायुसेना अध्यक्ष अनिल यशवंत टिपनिस वायुसेना को कारगिल में उतारने के पक्ष में नहीं थे। उनका तर्क था कि ज्यादा ऊंचाई पर हेलीकॉप्टर ले जाना जोखिम भरा कदम साबित हो सकता है। 

चूंकि वे जानते थे कि जनरल मलिक मौजूदा परिस्थितियों में उनकी यह बात नहीं मानेंगे, इसलिए उन्होंने मलिक को एक पत्र भेजा। इसके टिपनिस ने बताया था कि हवाई मारक क्षमता केवल वायुसेना के हाथ में नहीं है। इस बाबत राजनीतिक एवं सामरिक बाध्यता के बारे में भी सोचना पड़ता है।अपने पत्र के अंत में टिपनिस ने लिख, एक बार दोबारा सोचें। 

जनरल मलिक ने जवाब देने में देर नहीं लगाई। उन्होंने कहा, कारगिल व लद्दाख में लड़ रही सेना को वायुसेना का सहयोग जरूरी है।अगर आप सीसीएस के सामने भी इस प्रस्ताव को लेकर अपनी असहमति जताते हैं तो मैं आपका विरोध करूंगा।खास बात है कि इससे पहले वाइस चीफ ऑफ एयर स्टाफ चंद्रशेखर, कारगिल की लड़ाई में वायुसेना की मदद की बात कह चुके थे।इसके बाद वायुसेना को कारगिल भेजने पर जब सहमति बनने लगी तो विदेश मंत्री जसवंत सिंह आगे आ गए।उन्हें समझाने में भी सेना को खासी मशक्कत करनी पड़ी।

पीएम मोदी ने गत वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर की थी 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ' की घोषणा ...
पीएम मोदी ने पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले की प्राचीर से 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ' के पद की व्यवस्था करने की घोषणा की थी।इससे तीनों सेनाएं युद्ध के समय बेहतर तालमेल के साथ काम कर सकेंगी। सीडीएस की कमी कारगिल की लड़ाई में महसूस हुई थी। उस वक्त वायुसेना और थलसेना के बीच आपस में कई मसलों पर मतभेद सामने आया था। इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालसिस के सीनियर फैलो पी. स्टोबडन के अनुसार, खासतौर पर एशिया के देशों में सामारिक दृष्टि से परिस्थितियां बदल रही हैं। 

ऐसे माहौल में जरूरी है कि सेना के तीनों अंगों में बेहतर तालमेल हो।लड़ाई जीतने के लिए तीनों सेनाओं की अलग-अलग रणनीति पर नहीं, बल्कि इस योजना पर काम किया जाए कि इन तीनों सेनाओं की संयुक्त ताकत से लड़ाई कैसे जीती जाए। ऐसे में चीफ ऑफ डिफेंस स्टॉफ का पद बहुत कारगर साबित होता है।1999 में कारगिल लड़ाई के बाद तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अध्यक्षता में गठित ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (जीओएम) ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाने की सिफारिश की थी। वाजपेयी सरकार में मंत्रियों के समूह की इस अहम सिफारिश पर सेना के तीनों अंगों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी।

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