ARMY: क्या प्रयोगशाला बन रहे हैं सशस्त्र बल, जवानों को बनाया सरकारी योजना का प्रचारक तो कभी दी ये जिम्मेदारी
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विस्तार
केंद्र सरकार में सशस्त्र बलों को मिल रही नई जिम्मेदारियों की खूब चर्चा हो रही है। ताजा मामला सेना का बताया जा रहा है। भारतीय सेना के ऐसे जवान, जो छुट्टी पर अपने घर जाते हैं तो उनके लिए नई जिम्मेदारी देने की बात हो रही है। सरकार ने उन्हें सामाजिक कार्यों में शामिल होने का सुझाव दिया है। छुट्टी के दौरान आर्मी के जवान, अपने क्षेत्र में सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों को देंगे। उन्हें 'स्वच्छ भारत अभियान' और 'सर्व शिक्षा अभियान' जैसी योजनाओं से अवगत कराएंगे। इससे पहले केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' को भी इसी तरह की ड्यूटी दी गई थी। कुछ माह पहले ही सीएपीएफ को अपनी तैनाती वाले भौगोलिक क्षेत्र में इतिहास की विस्तृत जानकारी एकत्रित करने के लिए कहा गया है। अपनी ड्यूटी के अलावा, जवान, वहां के इतिहास का दस्तावेज भी तैयार करेंगे।
सोशल सर्विस और सरकारी स्कीम का प्रचार
केंद्र सरकार, सैन्य जवानों को सोशल सर्विस और सरकारी स्कीम का प्रचार करने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। हालांकि इस तरह की गतिविधियां उन्हें छुट्टी के दौरान करनी होंगी। सरकार का मकसद है कि जवानों को सामाजिक सेवा से जोड़ा जाए। एडजुटेंट जनरल की ब्रांच के अंतर्गत सेना के समारोह और कल्याण निदेशालय द्वारा गत मई में इस बाबत पत्राचार किया गया था। सभी कमांड मुख्यालयों के साथ हुए पत्राचार में कहा गया था कि जवान अपनी छुट्टियों का बेहतर इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं। वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ कर राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकते हैं। किस विषय पर जवान, काम करना चाहेंगे, वह क्षेत्र वे खुद ही तय कर सकते हैं। वे जो भी अभियान शुरु करें, उसका फीडवैक अवश्य दें।
2020 में सीआरपीएफ को मिली थी यह जिम्मेदारी
देश के दूरवर्ती इलाके, जहां पर नक्सलवाद की छाया है या वे आतंकवाद से प्रभावित हैं, वहां पर केंद्र सरकार की योजनाओं का रिपोर्ट कार्ड तैयार करने की जिम्मेदारी, सीआरपीएफ को सौंपी गई थी। उत्तर पूर्व के ऐसे राज्य जहां किसी उग्रवादी समूह या दूसरी बाधाओं के चलते सरकारी योजनाएं आम लोगों तक नहीं पहुंच पाती हैं, वहां पर सीआरपीएफ जवानों द्वारा घर-घर पहुंचकर लोगों से योजना की प्रगति रिपोर्ट लेने की बात कही गई थी। बल को सौंपे गए कार्यों में सरकारी योजनाओं पर फोकस किया जाना था। जैसे, केंद्र की कोई योजना, लोगों तक पहुंची है या नहीं। उन्हें किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। योजना के लिए उन्हें कौन सा फार्म भरना चाहिए और उसके बाद अगला कदम क्या होगा, यह मदद करने के लिए सीआरपीएफ के जवानों को लोगों के पास जाने के लिए कहा गया था।
जून में सीएपीएफ को मिली 'इतिहास' खोजने की ड्यूटी
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 12 जून को नई दिल्ली में आयोजित चिंतन शिविर-2 की अध्यक्षता करते हुए कई अहम सुझाव दिए थे। अब सभी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में उन सुझावों को त्वरित गति से लागू करने की तैयारी हो रही है। सीएपीएफ की सभी यूनिटों को वह सूची भेज दी गई थी, जिस पर उन्हें अमल करना है। सीएपीएफ कर्मी, अपने मुख्यालय, रेंज, ग्रुप केंद्र, बटालियन, कंपनी और प्लाटून/पोस्ट, जहां भी तैनात हों, वहां के भौगोलिक क्षेत्र के इतिहास की विस्तृत जानकारी एकत्रित करेंगे। इसके बाद इतिहास का दस्तावेज भी तैयार करना होगा। सीमा की सुरक्षा का मतलब केवल बॉर्डर की रक्षा नहीं है, बल्कि उसे स्थानीय जिले की कानून व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ मुद्दा माना है। अगर सीएपीएफ को धार्मिक अतिक्रमण की कोई जानकारी मिलती है तो वहां स्थानीय प्रशासन की इजाजत से त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। भौगोलिक क्षेत्र के इतिहास की विस्तृत जानकारी एकत्रित कर दस्तावेज तैयार करना है। इस जानकारी के आधार पर उस क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था का अध्ययन करें। इस तरह की जानकारियां, उस इलाके के इतिहास को जानने के प्रोफेशनल काम में मददगार साबित होंगी।
जवानों से ये काम, एक अच्छा विचार नहीं है
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, फौज हो चाहे सीएपीएफ, वहां पर जवान के लिए छुट्टी बहुत मायने रखती है। इन बलों को प्रयोगशाला न बनाया जाए। कठोर ड्यूटी से जब किसी जवान को फुर्सत मिलती है तो उसके सामने घरेलू कार्यों की लंबी फेहरिस्त तैयार रहती है। चूंकि महीनों के बाद वह घर जाता है तो उसकी दूसरी पारिवारिक जिम्मेदारियां भी रहती हैं। इन सब कार्यों के लिए उसके पास समय ही नहीं होगा। सेना में अब तो अग्निवीर भर्ती हो गए हैं। उन्हें तो एक साल में 30 दिन की ही छुट्टी मिलेगी। लोकल स्तर पर सरकारी कामकाज अलग होता है और फौज की ड्यूटी अलग होती है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि फौज को बेवजह एक स्थानीय टॉस्क दिया जा रहा है। वे सब कार्य स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी में शामिल हैं। कई बार योजनाओं को लेकर केंद्र और राज्यों में ठन जाती है। ऐसे में क्या इन जवानों के माध्यम से कोई जासूसी जैसा कार्य कराया जाएगा। चलिए मान लेते हैं कि सामाजिक सेवा में कुछ गलत नहीं है। बशर्ते जवान अपने तरीके से उसमें भाग ले। यहां पर तो सरकार फीडबैक भी मांग रही है। कुल मिलाकर ये ठीक विचार नहीं है।