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सुप्रीम कोर्ट: केंद्र ने कहा- अल्पसंख्यकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं वाजिब, हिंदुओं के अधिकारों का उल्लंघन नहीं

Wed, 14 Jul 2021 03:44 AM IST
Jeet Kumar राजीव सिन्हा, नई दिल्ली।
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली। Published by: Jeet Kumar Updated Wed, 14 Jul 2021 03:44 AM IST
सार

याचिका में कहा गया है कि इन योजनाओं के लिए सरकारी खजाने से 4700 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है जबकि संविधान में इसका कोई प्रावधान नहीं है।

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Central government said welfare schemes for minorities are justified
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

केंद्र सरकार ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अल्पसंख्यको के लिए कल्याणकारी योजनाओं को वाजिब करार दिया है। केंद्र का कहना है कि ये योजनाएं हिंदुओं के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करती हैं और न ही समानता के सिद्धांत के खिलाफ हैं।

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केंद्र सरकार ने हिंदू समुदाय के छह सदस्यों द्वारा संयुक्त रूप से दायर एक याचिका के जवाब में दायर हल्फमामे में कहा है कि उसके द्वारा बनाई गई योजनाएं कानूनी रूप से वैध हैं। ये योजनाएं  विभिन्न स्तरों पर अल्पसंख्यक समुदायों के समावेशी विकास का लक्ष्य को ध्यान में रखकर बनाई गई है।
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केंद्र ने कहा है कि ये योजनाएं अल्पसंख्यक समुदायों के बीच असमानताओं को कम करने और शिक्षा, रोजगार, कौशल के स्तर में सुधार करने और नागरिक सुविधाओं में कमियों को कम करने के लिए है।
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अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के द्वारा दायर इस हलफनामे में 13 योजनाओं के बारे में कहा है कि ये संविधान में निहित समानता के सिद्धांतों के विपरीत नहीं हैं और अन्य समुदायों के सदस्यों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करती हैं।

नीरज शंकर सक्सेना समेत छह लोगों की तरफ से 2019 में दाखिल इस याचिका में केंद्र की तरफ से अल्पसंख्यकों के लिए विशेष योजनाएं चलाने को गलत बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि इन योजनाओं के लिए सरकारी खजाने से 4700 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है जबकि संविधान में इसका कोई प्रावधान नहीं है।


वकील विष्णु शंकर जैन के माध्यम से दायर इस याचिका में यह भी कहा गया है कि संविधान का अनुच्छेद-27 करदाताओं से लिए गए पैसे को सरकार द्वारा किसी धर्म विशेष को बढ़ावा देने के लिए खर्च करने से रोकता है। लेकिन सरकार वक्फ संपत्ति के निर्माण से लेकर अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों व महिलाओं के उत्थान के नाम पर हजारों करो? रुपए खर्च कर रही है। यह बहुसंख्यक समुदाय  के छात्रों व महिलाओं के समानता के मौलिक अधिकार का हनन है।

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