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हाथरस हो या मुंबई, ऐसी स्थिति में सीबीआई के लिए सबूत जुटाना मुश्किल, ठीक नहीं राज्यों की मनमर्जी

Mon, 05 Oct 2020 11:54 PM IST
संजीव कुमार झा जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 05 Oct 2020 11:54 PM IST
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Cbi will face problem in difficult situation in hathras case and mumbai case
सांकेतिक तस्वीर

देश में जहां कहीं भी कोई 'पुलिस केस' सरकार के गले की हड्डी बनता है और सड़कों पर विपक्ष का शोर तेज होने लगता है तो वह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाता है। घटना स्थल पर पुलिस और एसआईटी तब तक कई बार छानबीन कर चुकी होती हैं। सीबीआई को जब केस की जांच सौंपी जाती है, कई तरह के सबूत इधर उधर हो जाते हैं। मुंबई केस हो या हाथरस का मामला, इनमें लोकल पुलिस जांच पड़ताल कर चुकी थी।

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हाथरस में तो पीड़िता का दाह संस्कार भी कर दिया गया। मुंबई केस में भी जांच एजेंसी के हाथ कुछ नहीं लग सका। एम्स की टीम ने भी कहा है कि सुशांत सिंह राजपूत केस हत्या नहीं, बल्कि आत्महत्या का मामला है। पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद बताते हैं, ऐसी स्थिति में सीबीआई के लिए सबूत जुटाना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। किसी भी केस की सीबीआई जांच की सिफारिश करना, राज्यों की वह मनमर्जी, केंद्रीय जांच एजेंसी के लिए परेशानी का सबब बन जाती है।
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आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर एवं कैबिनेट सचिवालय में सेक्रेटरी (सिक्योरिटी) के पद से रिटायर हुए और बाद में केंद्रीय सूचना आयुक्त के पद पर नियुक्त किए गए यशोवर्धन आजाद कहते हैं कि कई बार राज्य अपने स्तर पर किसी केस को सीबीआई के हवाले करने से पहले उसकी गंभीरता नहीं देखते। वे राजनीतिक दबाव में आकर, केस को सीबीआई के हवाले कर देते हैं।
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कुछ ऐसे केस भी होते हैं जो कई सप्ताह बाद या उससे भी ज्यादा समय में सीबीआई के पास आते हैं। कई केस अदालतों के निर्देश से भी सीबीआई को सौंपे जाते हैं। किसी भी मामले में घटना स्थल पर लोकल पुलिस सबसे पहले पहुंचती है। तभी से ही सबूत जुटाने की प्रक्रिया शुरु होती है। फोरेंसिक टीम भी वहां आती है।

बाद में अगर केस की जांच एसआईटी को सौंपी जाती है तो उसके सदस्य घटना स्थल पर पहुंचते हैं। जब तक वह टीम किसी निष्कर्ष पर पहुंचने वाली होती है तो एकाएक सीबीआई जांच के आदेश हो जाते हैं। सीबीआई टीम, पुलिस या एसआईटी से केस के दस्तावेज लेकर अपने तरीके से जांच शुरु करती है।

मुंबई में सुशांत सिंह राजपूत के फ्लैट में महाराष्ट्र पुलिस पहले ही अपनी जांच पड़ताल पूरी कर चुकी थी। यशोवर्धन आजाद के मुताबिक, हमेशा नहीं, लेकिन कई बार एजेंसी के लिए सबूत जुटाना मुश्किल हो जाता है। वजह, लोकल पुलिस की जांच में कुछ सबूत नष्ट हो जाते हैं।

सीबीआई के पास सबूत जुटाने और उसका अध्ययन करने की विशेष तकनीक होती है। हालांकि इन सबके बावजूद सीबीआई, केस को उसके मुकाम तक ले जाती है। अगर हम हाथरस केस की बात करें तो उसे एसआईटी आसानी से सुलझा सकती थी। लोकल पुलिस ने भरपूर गलतियां की थी।उनके पास संसाधन भी नहीं होते। एंबुलेंस जैसी सुविधाएं समय पर मिलना संभव नहीं होता।


मजिस्ट्रेट के सामने पीड़िता ने बयान दिया है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। यही इस केस में सबसे ज्यादा वजन वाला तथ्य है। अगर समय रहते और गंभीर केसों की जांच सीबीआई को सौंपी जाती है तो उसमें ठोस जांच रिपोर्ट सामने आती है। जब लोकल पुलिस या किसी दूसरी एजेंसी के हाथ से केस गुजरता है तो कुछ साक्ष्य कमजोर पड़ जाते हैं। हालांकि सबूतों को पूरी तरह नष्ट करना संभव नहीं होता।सीबीआई अपने तौर तरीकों से केस की अंतिम कड़ी तक पहुंच जाती है।

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