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मोदी और सीबीआई के बीच 'हनुमान' बने सुब्रमण्यम स्वामी
Thu, 10 Jan 2019 09:03 PM IST
अमर शर्मा
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Thu, 10 Jan 2019 09:03 PM IST
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सुब्रमण्यम स्वामी
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'हनुमान' जी, जिनके बारे में सदियों से यही कहा जा रहा है कि वे सदैव दूसरों के दुख-दर्द में काम आते हैं, कभी सीधा मोर्चा संभालते हैं तो कभी मध्यस्थ की भूमिका में सामने आते हैं। कुछ ऐसी ही भूमिका में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी नजर आए। गुरुवार को जब सीबीआई में उथल-पुथल चल रही थी तो स्वामी अचानक सीबीआई मुख्यालय पहुंच गए। अब इसके अलग-अलग मतलब निकाले जाने लगे।किसी ने कहा, वे पीएम मोदी और सीबीआई के बीच चल रही तनातनी को दूर करने के लिए प्रधानमंत्री के 'हनुमान' बनकर आलोक वर्मा से मिलने पहुंचे हैं। वर्मा से मुलाकात के बाद स्वामी ने कहा, सरकार सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा का पक्ष जाने बगैर महज सीवीसी की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें नहीं हटा सकती।
ये वही सुब्रमण्यम स्वामी हैं, जिन्होंने ईडी के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेश्वर सिंह और सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा का सार्वजनिक तौर पर बचाव किया था। उन्होंने राजेश्वर सिंह के मामले में तो सीधे केंद्र सरकार को चेतावनी दे दी थी कि अगर उन्हें पी. चिदंबरम केस से हटाया गया या उनका तबादला किया तो वे अदालत में अपने सारे केस वापस ले लेंगे। इसके बाद उन्होंने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने के मामले में भी सरकार की आलोचना की थी।
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वजह, स्वामी को लेकर सीधे तौर से किसी के मन में यह छवि नहीं बनती कि वे वर्मा पर मोदी का कोई आदेश थोपने आए हैं। अगर उनकी जगह कोई मंत्री या दूसरा नेता आलोक वर्मा के पास आता तो वह मीडिया की बड़ी सुर्खियां बन जाता। चूंकि स्वामी ने पहले भी वर्मा का पक्ष लिया है, इसलिए वे अगर मोदी के दूत बनकर सीबीआई मुख्यालय आए हैं तो कोई भी उन पर दूसरी तरह का कोई शक नहीं करेगा।
मुझे नहीं लगता है कि केवल सीवीसी की उस रिपोर्ट के आधार पर वर्मा को हटाया जाएगा तो समस्या सुलझने की बजाए और ज़्यादा खराब हो जाएगी।मैं चाहूंगा कि प्रधानमंत्री ऐसे कदम उठाएं जो इतिहास बने।स्वामी ने यह भी कहा कि वे इस मुद्दे के संबंध में सीबीआई मुख्यालय नहीं आए थे।
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वर्मा को छुट्टी पर भेजेने की आलोचना की थी
बता दें कि सुब्रमण्यम स्वामी को भाजपा में 'फायर ब्रांड' नेता माना जाता है। सरकार से लेकर पार्टी में सर्वोच्च स्तर तक सभी नेता उनसे दो कदम दूरी बनाकर चलते हैं।यह भनक किसी को नहीं लगती कि स्वामी कब और कहां पर क्या बात कह कर कोई विवाद खड़ा कर दें। कई बार उनकी बयानबाजी सरकार और पार्टी को मुसीबत में डाल चुकी है।
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ये वही सुब्रमण्यम स्वामी हैं, जिन्होंने ईडी के ज्वाइंट डायरेक्टर राजेश्वर सिंह और सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा का सार्वजनिक तौर पर बचाव किया था। उन्होंने राजेश्वर सिंह के मामले में तो सीधे केंद्र सरकार को चेतावनी दे दी थी कि अगर उन्हें पी. चिदंबरम केस से हटाया गया या उनका तबादला किया तो वे अदालत में अपने सारे केस वापस ले लेंगे। इसके बाद उन्होंने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने के मामले में भी सरकार की आलोचना की थी।
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सुब्रमण्यम स्वामी को इसलिए 'हनुमान' कहा गया है
चूंकि स्वामी भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं।वे कई मसलों पर पार्टी की मदद भी करते हैं। जैसे राम मंदिर के मुद्दे पर उन्होंने सरकार का साथ देते हुए कहा है कि इसे जितना जल्दी बनाया जाए, उतना ही ठीक है। जानकारों का कहना है कि अगर सरकार आलोक वर्मा के साथ किसी भी तरह की कोई मध्यस्थता करना चाहती है तो उसके लिए सुब्रमण्यम स्वामी से बेहतर कोई नहीं हो सकता।वजह, स्वामी को लेकर सीधे तौर से किसी के मन में यह छवि नहीं बनती कि वे वर्मा पर मोदी का कोई आदेश थोपने आए हैं। अगर उनकी जगह कोई मंत्री या दूसरा नेता आलोक वर्मा के पास आता तो वह मीडिया की बड़ी सुर्खियां बन जाता। चूंकि स्वामी ने पहले भी वर्मा का पक्ष लिया है, इसलिए वे अगर मोदी के दूत बनकर सीबीआई मुख्यालय आए हैं तो कोई भी उन पर दूसरी तरह का कोई शक नहीं करेगा।
प्रधानमंत्री को भी सलाह दे डाली सुब्रमण्यम स्वामी ने
वर्मा से मुलाकात करने के बाद स्वामी ने कहा, प्रधानमंत्री अपनी सरकार के फर्जी कानूनी जानकारों की बात नहीं सुनें। उनके ऐसे सलाहकारों ने ही उन्हें गलत सलाह देकर आज सरकार को इस स्थिति में पहुंचा दिया है। सीवीसी (केंद्रीय सतर्कता आयोग) की रिपोर्ट एक अन्य अधिकारी के दृष्टिकोण पर आधारित है। उक्त अधिकारी ने 'गलत रिपोर्ट' दी है। इसकी पूरे मामले की जांच होनी चाहिए।मुझे नहीं लगता है कि केवल सीवीसी की उस रिपोर्ट के आधार पर वर्मा को हटाया जाएगा तो समस्या सुलझने की बजाए और ज़्यादा खराब हो जाएगी।मैं चाहूंगा कि प्रधानमंत्री ऐसे कदम उठाएं जो इतिहास बने।स्वामी ने यह भी कहा कि वे इस मुद्दे के संबंध में सीबीआई मुख्यालय नहीं आए थे।