CAPF: अदालत से हक की लड़ाई जीतने वाले 11 लाख अफसर-जवान मायूस, OPS-HRA जैसे मामलों में सरकार ने अटकाया रोड़ा
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विस्तार
केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीएपीएफ' के 11 लाख अफसर/जवान, जिन्होंने अदालत से अपने हक की लड़ाई जीती, मगर केंद्र सरकार ने उन्हें मायूस कर दिया। किसी मामले में तो केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में चली गई, तो दूसरे केस को जानबूझकर लटका दिया गया। 'पुरानी पेंशन', 'एचआरए' और 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को लेकर दिए गए फैसले किसी न किसी वजह से अटक कर रह गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' के मामले में दिए गए आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। इसके बाद कुछ नहीं हो सका। नतीजा, दोबारा से अदालती लड़ाई शुरू हो गई। दिल्ली हाई कोर्ट ने गत जनवरी में 'सीएपीएफ' में 'पुरानी पेंशन' बहाली का आदेश दिया था। इसके खिलाफ भी केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट में चली गई। 'सीआरपीएफ' व 'बीएसएफ' के अफसरों ने दिल्ली हाई कोर्ट में 'एचआरए' देने की लंबी लड़ाई लड़ी थी, मगर अभी तक उन्हें वह फायदा नहीं मिल सका।लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बावजूद राहत नहीं
सीएपीएफ में 'समूह ए' अधिकारियों की सेवाएं 1986 से संगठित हैं, मगर अधिकारियों को उसका लाभ नहीं मिल सका। 2006 के दौरान जब छठे केंद्रीय वेतन आयोग ने आईएएस, आईपीएस व आईआरएस सहित अन्य सभी संगठित समूह ए सेवाओं 'ओजीएएस' के लिए गैर कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन 'एनएफएफयू' योजना शुरू की, तो कैडर अधिकारियों ने भी इसका लाभ देने की मांग की। हालांकि तब 'सीएपीएफ' को संगठित समूह 'ए' सेवा के रूप में मान्यता देने से इनकार कर दिया गया। लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 3 सितंबर 2015 के दिन अदालत ने अपने फैसले में सीएपीएफ को 1986 से 'संगठित समूह ए सेवा' घोषित कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। सर्वोच्च न्यायालय ने 5 फरवरी 2019 को दिए अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 3 जुलाई 2019 को अपनी एक घोषणा के जरिए 'सीएपीएफ संगठित सेवा ए' को मंजूरी प्रदान कर दी। इससे कैडर अफसरों में यह उम्मीद जगी कि उन्हें एनएफएफयू के परिणामी लाभ मिल जाएंगे।
रेल मंत्रालय ने दिया, मगर गृह मंत्रालय ने नहीं
रेलवे सुरक्षा बल 'आरपीएफ' भी सीएपीएफ के साथ न्यायालय में सह-याचिकाकर्ता था। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद रेल मंत्रालय ने न्यायालय के आदेश को अक्षरश: लागू कर दिया। आरपीएफ को संगठित सेवा का दर्जा मिल गया। उन्हें एनएफएफयू के सभी लाभ मिल गए और साथ ही उनकी सेवा का नाम बदलकर 'आईआरपीएफएस' कर दिया। कैडर अफसरों के मुताबिक, सीएपीएफ में पुराने सेवा नियमों की आड़ में खंडित एनएफएफयू को न्यायालय के आदेश की व्याख्या कर लागू किया गया है। नतीजा, इससे सीएपीएफ कैडर अफसरों की एक बहुत छोटी संख्या को ही उसका लाभ मिल सका। अधिकांश अफसरों की पदोन्नति से जुड़ी समस्याएं जस की तस बनी रही। एक ही न्यायालय के आदेश की विभिन्न मंत्रालयों द्वारा अलग-अलग व्याख्या कर दी गई। अधिकारियों के मुताबिक, जब तक ओजीएएस 'संगठित सेवा' पैटर्न के अनुसार, भर्ती नियमों/सेवा नियमों में संशोधन नहीं किया जाता है, तब तक ओजीएएस का लाभ नहीं दिया जा सकता। सीएपीएफ के अधिकारियों की मांग है कि ओजीएएस पैटर्न के अनुसार, संशोधित भर्ती नियम/सेवा नियमों के साथ कैबिनेट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पूर्ण कार्यान्वयन किया जाए। कई बार मांग करने के बाद भी उनके सेवा नियम/भर्ती नियम संशोधित नहीं किए गए।
न पदोन्नति मिली और न ही आर्थिक फायदा
कैडर अफसरों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी वे दोहरी मार झेल रहे हैं। सरकार ने सर्वोच्च अदालत के फैसले को मनमर्जी से लागू कर दिया है। एनएफएफयू का फायदा देने के लिए पदोन्नति का नियम लागू किया गया। जब पदोन्नति का लाभ नहीं मिल रहा था तो ही सरकार, एनएफएफयू लेकर आई थी। अब जिसकी पदोन्नति हो रही है, उसे ही एनएफएफयू दिया जा रहा है। कैडर अधिकारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना का नोटिस, सर्वोच्च अदालत में फाइल किया गया है। कैडर रिव्यू को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट का जो आदेश आया था, वह भी सुप्रीम कोर्ट में है। सर्वोच्च अदालत ने इन दोनों केसों को एक साथ क्लब कर दिया है। मौजूदा स्थिति में अधिकांश कैडर अफसरों को न तो एनएफएफयू का फायदा मिल सका और न ही समय पर उनका कैडर रिव्यू हो सका है। कैडर रिव्यू नहीं होने के कारण सीएपीएफ के ग्राउंड कमांडर व अन्य रैंक वाले अधिकारी पदोन्नति के मोर्च पर बुरी तरह पिछड़ गए हैं। सीधी भर्ती के माध्यम से विशेषकर सीआरपीएफ और बीएसएफ में आने वाले सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति लगभग 15 वर्ष में मिल रही है। डिप्टी कमांडेंट तक पहुंचने में 22 साल तो कमांडेंट के लिए 27 साल लग रहे हैं। डीआईजी, आईजी व एडीजी के पद तक कैसे और कब पहुंचेंगे, इस बाबत अंदाजा लगाया जा सकता है।
'एचआरए' देने के लिए लंबी लड़ाई
देश के दो बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' और 'बीएसएफ' के अफसरों ने दिल्ली हाई कोर्ट में 'एचआरए' देने की मांग को लेकर एक लंबी लड़ाई लड़ी थी, वे जीत भी गए। गत वर्ष दिसंबर में अधिकारियों को यह उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें देर सवेर 'एचआरए' मिल जाएगा। दिल्ली उच्च न्यायालय ने गत वर्ष 16 दिसंबर को अपने फैसले में कहा था, जिस तरह से इन बलों में 'पर्सनल ब्लिो ऑफिसर रैंक' के नीचे वाले सभी कार्मिकों को एचआरए का फायदा मिलता है, उसी तरह अफसरों को भी वह लाभ दिया जाए। अदालत ने छह सप्ताह में 'एचआरए' को लेकर काम पूरा करने का समय दिया था। हालांकि फैसले में ये नहीं लिखा था कि 'एचआरए' का लाभ कब से देना है। इसके बाद सभी अधिकारी 'एचआरए' की राह देखते रहे। केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट का फैसला लागू नहीं किया। नतीजा, 'एचआरए' का मामला अधर में लटक गया। जब अदालत की अवमानना को लेकर सीआरपीएफ अधिकारी दिल्ली हाई कोर्ट में पहुंचे, तो जस्टिस जसमीत सिंह ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, सात सप्ताह में कोर्ट का यह आदेश लागू नहीं हुआ तो बल के डीजी 23 नवंबर को अदालत में पेश होंगे।
सीएपीएफ में 'पुरानी पेंशन' का मामला अटका
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस साल 11 जनवरी को दिए अपने एक फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। अदालत ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। केंद्र सरकार ने इस फैसले को भी लागू नहीं किया। इसके विपरित केंद्र सरकार ने उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्टे ले लिया है। इस मामले में एसोसिएशन के चेयरमैन एवं पूर्व एडीजी 'सीआरपीएफ' एचआर सिंह कह चुके हैं कि वे सीएपीएफ में पुरानी पेंशन को लेकर लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं।
दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में पुरानी पेंशन बहाली का फैसला दिया था। केंद्र सरकार इस फैसले को लागू करने की बजाए, उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। एसोसिएशन के महासचिव रणबीर सिंह ने कहा, गत फरवरी में जंतर मंतर पर आयोजित प्रदर्शन में विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों ने सीएपीएफ में ओपीएस लागू नहीं करने को लेकर नाराजगी जाहिर की थी। पदाधिकारियों ने उस वक्त कहा था कि कोई खिलाड़ी ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत कर आता है, तो उसे केंद्र सरकार पांच करोड़ रुपये देती है। राज्य सरकार भी दो करोड़ रुपये दे देती है। एक प्लाट भी मिलता है और दूसरी कई सुविधाओं का अंबार लगता है, जिसे ये सब मिलता है, वह एक जिंदा व्यक्ति है। दूसरी तरफ सीएपीएफ के जवान को देखें, वह देश के लिए शहीद हो जाता है। वह दोबारा से जीवन में नहीं आ सकता। सरकार उसके मां बाप को एक तय राशि देकर राम-राम बोल देती है।
'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात
एसोसिएशन के मुताबिक, दिल्ली उच्च न्यायालय ने 11 जनवरी को दिए अपने एक फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों 'सीएपीएफ' को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना है। इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही गई है। अदालत ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। केंद्र ने इस फैसले को भी लागू नहीं किया। दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि 'सीएपीएफ' में आठ सप्ताह के भीतर पुरानी पेंशन लागू कर दी जाए। अदालत की वह अवधि होली पर खत्म हो गई। तब तक केंद्र सरकार, उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में तो नहीं गई, मगर अदालत से 12 सप्ताह का समय मांग लिया है। जब वह अवधि भी खत्म हो गई तो केंद्र सरकार ने ओपीएस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले लिया।