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CAPF: सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं ने सीएपीएफ एक्ट को बताया मौलिक अधिकारों का उल्लंघन, सरकार को नोटिस
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CAPF
- फोटो : Adobe Stock
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम 2026 को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। सीएपीएफ के कैडर अफसरों की याचिका में नए कानून को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सरकार को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 18 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ताओं में सीएपीएफ के शौर्य चक्र विजेताओं के अलावा कैडर की महिला अधिकारी भी शामिल हैं।
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लगभग 56 आईपीएस ने सीएपीएफ ज्वाइन की
याचिकाओं में यह तर्क दिया गया है कि सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम 2026, शीर्ष अदालत के उस फैसले को कानूनी तौर पर अमान्य करने जैसा है, जिसमें केंद्रीय बलों में आईपीएस की प्रतिनियुक्ति को धीरे-धीरे कम करने की बात कही गई थी। सर्वोच्च अदालत के इस फैसले के बाद केंद्रीय बलों में आईपीएस प्रतिनियुक्ति में तेजी आ गई। गत वर्ष 23 मई के बाद से लेकर अब तक लगभग 56 आईपीएस ने सीएपीएफ ज्वाइन की है। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने 34 कैडर अफसरों की याचिका पर सुनवाई की। इसके अलावा उक्त बेंच ने ही 890 अन्य अधिकारियों द्वारा दायर याचिकाओं पर भी विचार किया। इनमें भी सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम 2026 की वैद्यता को चुनौती दी गई है।
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मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की बात कही
याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि सीएपीएफ (सामान्य प्रशासन) अधिनियम 2026, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। इसके चलते 'अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता', 'अनुच्छेद 16 लोक नियोजन में अवसर की समानता' और 'अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण', इन प्रावधानों का उल्लंघन हो रहा है। सीएपीएफ के इस नए कानून को असंवैधानिक करार देने की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं की तरफ से कहा गया कि यह एक्ट, 'शक्तियों के पृथक्करण' के सिद्धांत का भी उल्लंघन करता है।
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क्या था सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय?
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मई 2025 में संजय प्रकाश एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया गया था। न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने सीएपीएफ के ग्रुप 'ए' कार्यपालक संवर्ग को संगठित ग्रुप 'ए' सेवा (ओजीएएस) घोषित करते हुए महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। उनमें आईजी लेवल तक आईपीएस प्रतिनियुक्ति में चरणबद्ध तरीके से कमी लाना, ताकि संवर्ग अधिकारियों को स्वाभाविक पदोन्नति का अवसर मिल सके। नियमित कैडर समीक्षा हो, नए सेवा नियमों का निर्माण तथा नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) लागू कर दीर्घकालीन पदोन्नति ठहराव को दूर करना शामिल था। केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ संसद में 'सीएपीएफ (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन) अधिनियम, 2026' पारित करा लिया।
कोर्ट के फैसले से ज्यादा अहमियत
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, नए एक्ट में कई प्रावधान ऐसे हैं, जिन्हें कोर्ट के किसी भी फैसले से ज्यादा अहमियत दी गई है। सेक्शन 3 में कहा गया है कि 'किसी भी कोर्ट के फैसले या आदेश के बावजूद, सरकार एक नोटिफिकेशन जारी कर नियम बना सकती है। इन नियमों के अंतर्गत सीएपीएफ में अफसरों की भर्ती (पदोन्नति एवं प्रतिनियुक्ति सहित) और उनकी सेवा शर्तों का तरीका व प्रक्रिया तय की जा सकती है। एक्ट में आईपीएस प्रतिनियुक्ति के जरिए किन पदों को भरा जाएगा, यह प्रावधान किया गया है। सभी केंद्रीय बलों में आईजी के कुल पदों में से 50 प्रतिशत, एडीजी रैंक में कम से कम 67 प्रतिशत पद और एसडीजी व डीजी रैंक के सभी पदों को आईपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति से भरने की बात कही गई है।
कैडर अफसरों को पदोन्नति के अवसरों से दूर
याचिकाकर्ताओं की दलील है कि विधायिका के पास कानून में पिछली तारीख से बदलाव करने का अधिकार है, लेकिन वह उन कमियों को दूर किए बिना या उन फैसलों के मूल कानूनी आधार को बदले बिना न्यायिक फैसलों को रद्द नहीं कर सकती। नया एक्ट, विधायी आदेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के असर को खत्म करने की कोशिश करता है। यह 'शक्तियों के बंटवारे' के संवैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि वर्गीकरण और तय प्रतिनियुक्ति कोटा मनमाना है। इसमें कोई तार्किक अंतर या उचित संबंध नहीं है। इसके चलते प्रशिक्षित एवं अनुभवी कैडर अफसर, पदोन्नति के अवसरों से संरचनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं। याचिका में 'मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ' (2022) और 'इंडियन एल्युमीनियम कंपनी बनाम केरल राज्य' (1996) जैसे पुराने फैसलों का हवाला दिया गया। यह तर्क भी रखा गया कि सीएपीएफ का मुख्य काम, राष्ट्रीय सुरक्षा और बॉर्डर की सुरक्षा करना है। ऐसे में कमांड स्ट्रक्चर और प्रतिनियुक्ति नीति के मामले में उनकी तुलना राज्य पुलिस बलों से नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू कराया जाए
याचिकाकर्ताओं ने 2026 के एक्ट को असंवैधानिक घोषित करने की मांग करते हुए मांग की है कि 23 मई 2025 को सुप्रीम द्वारा दिया गया फैसला लागू कराया जाए। पूर्व कैडर अफसरों का कहना है कि इस एक्ट के माध्यम से सीएपीएफ में आईजी तथा उससे ऊपर के पदों पर आईपीएस प्रतिनियुक्ति को न्यूनतम प्रतिशत के साथ वैधानिक संरक्षण प्रदान किया गया है। साथ ही, सेवा संबंधी मामलों में गृह मंत्रालय को व्यापक एवं सर्वोपरि अधिकार दिए गए हैं, जिससे सीएपीएफ की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका व्यक्त की जा रही है। लंबे इंतजार से निराश होकर कैडर अफसरों ने दिसंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय में अवमानना याचिका दायर की थी। इस मामले की सुनवाई अभी जारी है। सरकार ने बार-बार निर्णय लागू करने के लिए समय मांगा, किंतु आश्चर्यजनक रूप से उसी दौरान ऐसा विधेयक लेकर आई जिसे अनेक अधिकारियों ने सर्वोच्च न्यायालय की भावना और निर्देशों के विपरीत बताया।
CAPF Act