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Calcutta HC: हाईकोर्ट ने कहा- जजों का रक्त पिपासु होना ठीक नहीं, मौत की सजा आजीवन कारावास में बदली

Fri, 08 Aug 2025 05:15 AM IST
दीपक कुमार शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता
अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 08 Aug 2025 05:15 AM IST
सार

हाईकोर्ट ने अपने मामा की हत्या के दोषी एक युवक की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दंड के तीन प्रमुख स्तंभ हैं-दंड, निवारण और सुधार। समाज का विकास सजा देने की बजाय सुधारात्मक दृष्टिकोण की ओर रहा है, न कि दंडात्मक दृष्टिकोण की ओर। 

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Calcutta High Court said that  reformative aspect of punishment has led to the development of society
कलकत्ता हाईकोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति को मृत्युदंड के कारण फांसी दी जाती है या किसी अन्य तरह से मार दिया जाता है तो जो नुकसान होता है उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। इसलिए दंड के बजाय सुधारात्मक दृष्टिकोण पर गौर किया जाना चाहिए और न्यायाधीशों को कभी भी रक्त पिपासु नहीं होना चाहिए।  

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इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने अपने मामा की हत्या के दोषी एक युवक की फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया। जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य ने फैसला सुनाते हुए कहा कि दंड के तीन प्रमुख स्तंभ हैं-दंड, निवारण और सुधार। समाज का विकास सजा देने की बजाय सुधारात्मक दृष्टिकोण की ओर रहा है, न कि दंडात्मक दृष्टिकोण की ओर। उन्होंने कहा, निवारण अब भी एक उचित कदम के तौर पर मान्य है। वहीं, भारत और अन्य जगहों पर आधुनिक आपराधिक न्यायशास्त्र में सजा का स्थान धीरे-धीरे दंड का सुधारात्मक पहलू लेने लगा है। जस्टिस भट्टाचार्य ने जलपाईगुड़ी सत्र न्यायालय की तरफ से आफताब आलम को सुनाई गई मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया, जिसमें 20 साल तक समयपूर्व रिहाई का तब तक कोई विकल्प नहीं होगा, जब तक कि कोर्ट संतुष्ट न हों। जलपाईगुड़ी जिले के धूपगुड़ी में 28 जुलाई 2023 को अपने मामा की हत्या के लिए आलम को दोषी ठहराया गया था।
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अपराध से घृणा करें अपराधी से नहीं
जस्टिस भट्टाचार्य ने कहा, हाल के दिनों में कारागारों को बदलकर सुधार गृह कर दिए जाने का एक कारण यह है कि यह समाज की बदला लेने की मूल प्रवृत्ति से अभियुक्तों को सुधारने की एक अधिक सभ्य नीति की ओर बढ़ा जाए। यह इस सिद्धांत पर केंद्रित है कि व्यक्ति को अपराध से घृणा करनी चाहिए, अपराधी से नहीं।

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