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36वां राफेल 2022 में मिलेगा, तब तक चीन-पाकिस्तान की धमकी से कैसे निपटेंगे

Fri, 04 Jan 2019 05:09 PM IST
प्रदीप पांडे जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Published by: प्रदीप पांडे Updated Fri, 04 Jan 2019 05:09 PM IST
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By the end of 2022 IAF will capable to deal with neighbours like pakistan and china with rafael jets
राफेल

यदि सब कुछ तय समय पर हुआ तो देश को पहला राफेल सितंबर-2019 में मिलेगा और 36 वां यानी आखिरी राफेल 2022 तक आएगा। अब सवाल यह है कि तब तक सरकार चीन-पाकिस्तान की धमकी से कैसे निपटेगी। कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि पीएम मोदी ने इस सौदे को लंबा खींच कर राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता किया है।

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राहुल गांधी ने कहा, मोदी को यह बताना होगा कि 126 हवाईजहाजों की जरुरत थी तो फिर 36 ही क्यों खरीदे गए। साथ ही 36 राफेल का डिलीवरी शेड्यूल 126 एमएमआरसीए जहाजों की बिड से ज्यादा बेहतर नहीं था।
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राफेल को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस पार्टी के बीच तकरार बढ़ती जा रही है। कांग्रेस पार्टी आए दिन राफेल पर कोई न कोई नया खुलासा कर भाजपा को घेरने का प्रयास करती है। शुक्रवार को कांग्रेस पार्टी के नेता गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे और रणदीप सुरजेवाला ने राफेल पर कई खुलासे कर दिए। दो दिन पहले ही वित्तमंत्री अरुण जेटली ने सदन में राफेल पर चर्चा के दौरान कहा था, जब उन्होंने कुछ समय के लिए रक्षामंत्री का कार्यभार संभाला तो वायु सेना के अफसरों से बात हुई। 
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पहली बैठक में वायुसेना ने लड़ाकू जहाजों का मुद्दा उठाया था। वायुसेना की दलील थी कि राफेल मिलना बहुत जरुरी है। पड़ोसी राष्ट्र के साथ संबंध ठीक नहीं है, उनके पास बड़ी मारक क्षमता वाले लड़ाकू जहाज मौजूद हैं।

गुलाम नबी आजाद का कहना था कि 36 वां राफेल 2022 तक मिल सकेगा, जबकि इनका ऑर्डर 2015 में दिया गया है। साढ़े आठ साल बाद सभी जहाज मिलेंगे तो क्या इससे देश की सुरक्षा प्रभावित नहीं होगी। जेटली ने खुद ही कहा था कि पड़ोसी देशों के पास अधिक संख्या में ऐसे जहाज हैं।


रणदीप सुरजेवाला ने कहा, अब 2022 तक देश की सुरक्षा कैसे होगी। जेटली ने तो कहा है कि चीन पाकिस्तान से खतरा है। मोदी को यह बात सार्वजनिक करनी चाहिए कि 126 जहाजों की बात 36 पर कैसे सिमट गई। वायुसेना, रक्षा मंत्रालय, कानून मंत्रालय, डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसीजर, एयर एक्विजीशन विंग और कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) इन सबको किनारे कर मनमर्जी से फैसला ले लिया। कानून मंत्रालय के सुझाव, बैंक गारंटी जैसी बातों को भी नहीं माना गया।

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