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बसपा की कहानी-1: एक निलंबन ने कांशीराम को कैसे वंचितों की लड़ाई का चेहरा बनाया? ऐसे अस्तित्व में आई पार्टी
Tue, 15 Sep 2026 10:19 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 15 Sep 2026 10:19 AM IST
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बसपा की स्थापना की कहानी।
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अमर उजाला
विस्तार
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में उथल-पुथल का दौर जारी है। पार्टी सुप्रीमो मायावती ने पहले भतीजे आकाश आनंद को पार्टी बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद उन्होंने कहा कि उनके भतीजे नहीं, बल्कि उनकी भतीजी दीपिका आनंद बसपा के मिशन को आगे बढ़ाएंगी। मायावती के इस बयान के बाद एक बार फिर बसपा के भविष्य को लेकर चर्चाएं शुरू हो गईं।ऐसे में आइये जानते हैं आखिर बसपा का गठन कैसे हुआ? पहले पार्टी में उत्तराधिकारी कैसे तय हुआ? पार्टी बनने के बाद बसपा कैसे शीर्ष पर पहुंची? कब पार्टी संकट में फंसी? चुनाव दर चुनाव इसका प्रदर्शन कैसा रहा? इन सभी सवालों के जवाब हम आपको बताएंगे हमारी खास सीरीज 'सियासी दलों का सफरनामा' में। इसकी पहली कड़ी में जानें बहुजन समाज पार्टी के एक विचार से लेकर अस्तित्व तक में आने की कहानी...
पंजाब का वह लड़का, जिसने राजनीति यूपी में की, पर घर की जमीन साधे रखी
कांशीराम का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ (अब रूपनगर) जिले के खवासपुर गांव में एक रामदासिया सिख परिवार में हुआ था। रामदासिया सिख वह सिख होते हैं, जो कि कभी दलित-वंचित वर्ग से रहे थे। माना जाता है है कि सिखों के चतुर्थ गुरु- गुरु रामदास ने इन दलितों को सिख धर्म में शामिल कर रामदासिया सिख समुदाय की स्थापना की थी।नारायण बद्री की किताब कांशीराम: लीडर ऑफ द दलित्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश से उलट पंजाब के दलित कृषि क्षेत्र से भी जुड़े थे और उत्तर भारत के बाकी दलितों से उनकी स्थिति बेहतर थी। कांशीराम के दादा ढेलूराम भी सेना में थे। परिवार के पास थोड़ी जमीन, आम के बाग और चमड़े का कारोबार था, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति सामान्य ग्रामीण परिवारों से बेहतर थी। उस दौर में सिख धर्म की समतावादी यानी बराबरी की सोच और शिक्षाओं की वजह से कांशीराम को पंजाब में अपने बचपन और छात्र जीवन के दौरान सामाजिक भेदभाव का खास सामना नहीं करना पड़ा था।
कांशीराम के पिता हरि सिंह ने उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित किया। उनकी पढ़ाई भी पंजाब में ही हुई और उन्होंने पंजाब के स्थानीय स्कूलों के बाद 1956 में गवर्नमेंट कॉलेज, रोपड़ से विज्ञान में स्नातक (बीएससी) की डिग्री हासिल की।
यूं तो उन्होंने उत्तर प्रदेश को बहुजन आंदोलन की मुख्य कर्मभूमि बनाया, लेकिन पंजाब से उनका राजनीतिक रिश्ता हमेशा बना रहा। 1996 के 11वें लोकसभा चुनाव में कांशीराम पंजाब की होशियारपुर संसदीय सीट से सांसद चुने गए थे। इसके अलावा, उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी ने पंजाब विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों में भी छोटी लेकिन अहम सफलताएं हासिल की थीं।
यूं तो उन्होंने उत्तर प्रदेश को बहुजन आंदोलन की मुख्य कर्मभूमि बनाया, लेकिन पंजाब से उनका राजनीतिक रिश्ता हमेशा बना रहा। 1996 के 11वें लोकसभा चुनाव में कांशीराम पंजाब की होशियारपुर संसदीय सीट से सांसद चुने गए थे। इसके अलावा, उनकी पार्टी बहुजन समाज पार्टी ने पंजाब विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों में भी छोटी लेकिन अहम सफलताएं हासिल की थीं।
कांशीराम।
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नौकरी के लिए आए पंजाब से बाहर, तब हुआ भेदभाव का बदसूरत अहसास?
कांशीराम को बीएससी पूरी करने के बाद जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) में नौकरी मिल गई। हालांकि, इस सरकारी नौकरी के लिए कर्मचारियों का एक निश्चित अवधि तक काम करने के लिए अनुबंध भरना अनिवार्य था। हालांकि, कांशीराम ने इसे बंधुआ मजदूरी बताते हुए नौकरी करने से मना कर दिया। इसके बाद 1958 में कांशीराम को रक्षा उत्पादन विभाग के तहत आने वाले पुणे के एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लैबोरेट्री (ईआरडीएल) में रिसर्च असिस्टेंट के पद पर पक्की नौकरी मिल गई।कांशीराम की नौकरी ठीक ढंग से चलती भी रही। लेकिन यहीं वह घटना हुई, जिसने उनके जीवन का रंग-ढंग ही बदल दिया। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि 1965 में ईआरडीएल के अधिकारियों ने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती पर मिलने वाली छुट्टियों को खत्म करने का एलान कर दिया। चूंकि सरकरी महकमे के कर्मियों को डर था कि अधिकारियों के इस फैसले के विरोध में उनकी नौकरी जा सकती थी, इसलिए वे चुप ही रहे। हालांकि, एक राजस्थानी दलित कर्मचारी दीना भान ने अधिकारियों को इस फैसले के लिए चिट्ठी लिखी और इसे सांविधानिक अधिकार बताते हुए आंबेडकर जयंती की छुट्टी वापस बहाल करने की मांग की। हालांकि, अधिकारियों ने उनकी मांग मानने के बजाय दीना भान को निलंबित कर दिया।
इस घटना ने कांशीराम को पहली बार दलितों की आवाज उठाने के लिए मजबूर किया। उन्होंने प्रबंधन के इस फैसले का विरोध किया और साथी कर्मियों को एकजुट कर प्रदर्शन आयोजित किए। आखिरकार ईआरडीएल अधिकारियों को आंबेडकर जयंती की छुट्टियों को रद्द करने का अपना फैसला वापस लेना पड़ा। यह कांशीराम के जीवन में दलितों के हक के लिए लड़ाई की पहली कड़ी थी।
सूर्यकांत वाघमोरे की किताब सिविलिटी अगेंस्ट कास्ट: दलित पॉलिटिक्स एंड सिटीजनशिप इन वेस्टर्न इंडिया के मुताबिक, अपने पहले संघर्ष के दौरान उन्होंने डॉ. बीआर. आंबेडकर की ऐतिहासिक किताब- एनाहिलेशन ऑफ कास्ट पढ़ी, जिसने उनकी सोच और जीवन के लक्ष्य को पूरी तरह बदल दिया। 1964 में उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपना पूरा जीवन बहुजन समाज के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।
इतना ही नहीं उन्होंने अपने परिवार को 24 पन्नों का एक ऐतिहासिक पत्र लिखा और तीन कठोर प्रतिज्ञाएं लीं
पहली: कभी घर वापस न लौटने की।
दूसरी: आजीवन विवाह न करने की।
तीसरी: अपने नाम पर कोई निजी संपत्ति या बैंक बैलेंस न रखने की।
...फिर सरकारी नौकरी ही नहीं, खुद को भी बहुजन अधिकारों के लिए समर्पित किया
सूर्यकांत वाघमोरे की किताब सिविलिटी अगेंस्ट कास्ट: दलित पॉलिटिक्स एंड सिटीजनशिप इन वेस्टर्न इंडिया के मुताबिक, अपने पहले संघर्ष के दौरान उन्होंने डॉ. बीआर. आंबेडकर की ऐतिहासिक किताब- एनाहिलेशन ऑफ कास्ट पढ़ी, जिसने उनकी सोच और जीवन के लक्ष्य को पूरी तरह बदल दिया। 1964 में उन्होंने अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपना पूरा जीवन बहुजन समाज के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया।
इतना ही नहीं उन्होंने अपने परिवार को 24 पन्नों का एक ऐतिहासिक पत्र लिखा और तीन कठोर प्रतिज्ञाएं लीं
पहली: कभी घर वापस न लौटने की।
दूसरी: आजीवन विवाह न करने की।
तीसरी: अपने नाम पर कोई निजी संपत्ति या बैंक बैलेंस न रखने की।
पढ़े-लिखे-नौकरीपेशा लोगों का संगठन बनाया, बहुजन की आवाज को उठाया
बद्री नारायण की किताब कांशीराम: लीडर्स ऑफ दलित के मुताबिक, सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद कांशीराम ने महाराष्ट्र में तेजी से उभार पर रही रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) और फिर दलित पैंथर्स पार्टी में शामिल होने पर भी विचार किया। हालांकि, बाद में उन्हें अहसास हुआ कि इन दोनों ही दलों में कई धड़े हैं, जो कि दलितों के उत्थान के मिशन में मार्क्सवाद और बौद्ध धर्म के बीच उलझे हैं। उन्हें आरपीआई की कांग्रेस से करीबी भी साफ दिखी, जिसके चलते उन्होंने इससे दूरी बना ली। उनका मानना था कि तत्कालीन दलित नेता मुख्यधारा की पार्टियों के 'चमचा' बन गए हैं और अपने समाज के स्वतंत्र राजनीतिक अधिकारों से समझौता कर रहे हैं।आखिरकार उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूर दलितों और पिछड़ों की आवाज उठाने के लिए 1971 में ऑल इंडिया एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक कर्मचारी संगठन की स्थापना की। कांशीराम का मानना था कि एक बार दलित और पिछड़े समुदाय के लोगों की पढ़ने के बाद नौकरी लग जाती है तो वह समाज के प्रति कम जागरूक हो जाते हैं। बताया जाता है कि उन्होंने इसी समस्या को दूर करने और संगठन से पिछड़े समाज के लोगों को जोड़ने के लिए साइकिल से मीलों तक सफर किया। यहां तक कि ट्रेनों के जनरल डिब्बों में वे पढ़े-लिखे सरकारी कर्मचारियों को संगठित करने की कोशिश करते रहे। इस संगठन का सीधा मकसद एससी-एसटी समुदाय के लोगों के साथ कार्यस्थल पर हो रहे भेदभाव और उत्पीड़न की घटनाओं पर नजर रखना और उनके खिलाफ समाज को एकजुट रखते हुए विरोध करना था। कांशीराम का यह पहला सामाजिक प्रयोग काफी चर्चा में आया और देखते ही देखते हजारों लोग इस संगठन से जुड़ते चले गए।
कांशीराम ने 1984 में की बसपा की स्थापना।
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फिर आया साल 1978, जब दिसंबर की छह तारीख को कांशीराम ने अपने संगठन का नाम बदलकर इसे ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी एम्पलॉयी फेडरेशन (BAMCEF) कर दिया। इसकी लॉन्चिंग के साथ ही इसमें दो हजार लोग जुड़ गए। बामसेफ का ध्येय वाक्य था- शिक्षित करें, संगठित करें और उत्तेजित करें (एजुकेट, ऑर्गनाइज, एजिटेट)। इस संस्थान में उस दौरान कई शिक्षित, नौकरीपेशा दलित कार्यकर्ता जुड़े थे, जो कि संगठन को दलित-पिछड़ों के अधिकारों के लिए लड़ने वाला एक थिंक-टैंक, प्रतिभाओं और आर्थिक मदद का बैंक बना रहे थे। इस एक गैर-राजनीतिक कैडर संगठन ने बहुजन कर्मचारियों को समाज के प्रति उनके दायित्वों का अहसास कराया।
बामसेफ को आगे बढ़ाने के दिनों में कांशीराम की तरफ से संगठन से जुड़े लोगों को एक संदेश जोर-शोर से दिया जाता था। यह संदेश था कि देश में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और धार्मिक अल्पसंख्यक मिलकर कुल आबादी का 85 फीसदी हिस्सा हैं। लेकिन महज 15 फीसदी लोग हुकूमत और संसाधनों पर कब्जा किए हैं। यहीं से उन्होंने नया नारा दिया- जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी।
बसपा से पहले भी अलग संगठन बनाकर की राजनीति में आने की कोशिश
बामसेफ को आगे बढ़ाने के दिनों में कांशीराम की तरफ से संगठन से जुड़े लोगों को एक संदेश जोर-शोर से दिया जाता था। यह संदेश था कि देश में अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) और धार्मिक अल्पसंख्यक मिलकर कुल आबादी का 85 फीसदी हिस्सा हैं। लेकिन महज 15 फीसदी लोग हुकूमत और संसाधनों पर कब्जा किए हैं। यहीं से उन्होंने नया नारा दिया- जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उतनी उसकी भागीदारी।
अपने इसी वक्तव्य के जरिए कांशीराम ने आगे राजनीति में उतरने का विचार बनाया, ताकि हुकूमत में भी दलित-शोषित वर्ग को आवाज दी जा सके। इसी एवज में उन्होंने बाबासाहेब की पुण्यतिथि पर 6 दिसंबर 1981 में पहले राजनीतिक संगठन की नींव रखी। इसे नाम दिया- दलित, शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4)। यह बहुजन समाज को राजनीतिक रूप से लामबंद करने का उनका पहला प्रत्यक्ष प्रयास था, जो कि बामसेफ के समानांतर खड़ा किया गया था। 1982 में उन्होंने अपनी बहुचर्चित किताब- द चमचा एज (The Chamcha Age) लिखी। इस किताब में उन्होंने मुख्यधारा की सवर्ण प्रभुत्व वाली पार्टियों की कठपुतली (चमचा) बने दलित नेताओं की तीखी आलोचना की और तर्क दिया कि जब तक बहुजन समाज का अपना स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व नहीं होगा, तब तक उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहेगा।
हालांकि, बामसेफ और डीएस-4 से जुड़े अधिकतर मुख्य कार्यकर्ता सरकारी कर्मचारी थे, जिन्हें नियमानुसार चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने या चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी। इस वजह से डीएस-4 सीधे चुनाव लड़ने के मामले में सीमित रहा। कांशीराम को खुद भी यह बात समझ में आ गई। यहीं से नींव पड़ी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की।
हालांकि, बामसेफ और डीएस-4 से जुड़े अधिकतर मुख्य कार्यकर्ता सरकारी कर्मचारी थे, जिन्हें नियमानुसार चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने या चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं थी। इस वजह से डीएस-4 सीधे चुनाव लड़ने के मामले में सीमित रहा। कांशीराम को खुद भी यह बात समझ में आ गई। यहीं से नींव पड़ी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की।
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आखिरकार 1984 में जमीन पर आई बहुजन समाज पार्टी
महविश हफीज के रिसर्च पेपर- पॉलिटिकल स्ट्रगल ऑफ अनटचेबल्स एंड द राइज ऑफ बहुजन समाज पार्टी में बताया गया है कि बसपा के औपचारिक गठन (14 अप्रैल 1984) से पहले कांशीराम ने अपने आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए देश भर में 100 दिनों की विशाल साइकिल यात्राएं और जनसभाएं आयोजित कीं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान 7,000 से अधिक जनसभाएं आयोजित की गईं।आखिरकार बामसेफ और डीएस-4 के जरिए पूरे देश में बहुजन समाज में राजनीतिक जागरूकता फैलाने के बाद डॉ. बीआर. आंबेडकर की जयंती के मौके पर 14 अप्रैल 1984 को कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। बहुजन समाज पार्टी के पहले अध्यक्ष कांशीराम खुद बने। इस दल का मुख्य लक्ष्य करीब 6000 पिछड़ी जातियों को साथ लाकर बहुजन समाज (एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक) को एक राजनीतिक झंडे के तले लाकर देश में सत्ता हासिल करना था।
कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी को खड़ा करने के लिए शुरुआत में फंड जुटाने की कोशिश की। इसके लिए भी उन्होंने बहुजन समाज से अपील की और कहा कि लोग 'एक टाइम का खाना' दें और 'वोट के साथ नोट' मांगना शुरू किया। कांशीराम का मानना था कि उनके पास संसाधनों की कमी थी लेकिन हाथों की नहीं।
अगली कड़ी में पढ़ें: कांशीराम ने कैसे ढूंढा मायावती को, कैसे चुनावों में उभरती चली गई बसपा