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पुणे सामूहिक दुष्कर्म: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बरकरार रखी तीन लोगों की उम्रकैद की सजा, सत्र न्यायाधीश को निशाने पर लिया

Wed, 29 Sep 2021 10:35 PM IST
गौरव पाण्डेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: गौरव पाण्डेय Updated Wed, 29 Sep 2021 10:35 PM IST
सार

पुणे में हुए एक सामूहिक दुष्कर्म के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उम्र कैद की सजा काट रहे तीन लोगों की सजा बरकरार रखने का फैसला किया है। हालांकि, इस दौरान अदालत ने सत्र न्यायाधीश को निशाने पर लेते हुए उन पर पीड़िता की गरिमा को बचाने में असफल रहने का आरोप लगाया।

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Bombay High Court upholds life term to three men in Pune gang rape case slamming session trial court judge news in Hindi
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : पीटीआई (फाइल)

विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे सत्र अदालत के साल 2011 में पारित एक आदेश को बरकरार रखा है जिसमें तीन लोगों को सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। लेकिन, इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में बचाव पक्ष के वकीलों और न्यायाधीश के खिलाफ आलोचनात्मक टिप्पणी भी थी।

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बता दें कि 28 सितंबर को पारित एक आदेश में न्यायाधीश साधना जाधव और सारंग कोतवाल की पीठ ने आरोपियों की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए, इस मामले में बचाव पक्ष के वकीलों और न्यायाधीश के आचरण पर, विशेष रूप से पीड़िता से जिरह के दौरान, कुछ कठोर टिप्पणियां कीं।
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अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम रहे सत्र न्यायाधीश
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वर्तमान मामले में सत्र न्यायाधीश, पीड़ित युवती की मर्यादा की सुरक्षा करने के अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में नाकाम रहे हैं। उल्लेखनीय है कि यह मामला पुणे का है जहां के हिंजेवाड़ी इलाके में एक एमबीए स्नातक युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया गया था।
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बचाव पक्ष के वकीलों ने की बेहद अनुचित जिरह
मामले में उच्च न्यायालय ने आगे कहा कि बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपियों को बचाने की कोशिश में अन्य वस्तुओं के साथ यह साबित करने की भी कोशिश की कि पीड़िता ने शराब का सेवन किया हुआ था और उसने आरोपी के साथ अपनी सहमति से शारीरिक संबंध बनाए थे और उसके साथ दुष्कर्म नहीं किया गया था।


अभियोजन पक्ष की चुप्पी पर भी खड़े किए सवाल
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने इस तरह के सवालों के दौरान अभियोजन पक्ष के चुप रहने पर पर भी सवाल खड़े किए। अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई करने वाले सत्र न्यायाधीश को निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए था और जब वकील पीड़िता के साथ इस तरह की अनुचित जिरह कर रहे थे तब उन्हें इसमें दखल देना चाहिए था। 

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