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दुष्कर्म पीड़िता का बयान हमेशा पक्का सबूत नहीं होता: बॉम्बे हाईकोर्ट
Fri, 17 May 2019 12:56 AM IST
Avdhesh Kumar
एजेंसी, मुंबई
एजेंसी, मुंबई
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 17 May 2019 12:56 AM IST
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Bombay High Court
- फोटो : Bombay High Court
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बॉम्बे हाईकोर्ट की एक एकल पीठ ने एक अहम टिप्पणी करते हुए दुष्कर्म मामले में 19 साल के युवक को निचली अदालत से मिली सजा और दोषसिद्धि को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल पीड़िता का बयान हमेशा पर्याप्त साक्ष्य के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस रेवती मोहिते-देरे ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता के बयान को पूरी तरह अकाट्य और विश्वसनीय होना चाहिए। जस्टिस रेवती ने आगे कहा, यदि पीड़िता का बयान ‘विश्वसनीय’ नहीं लगता, तो ऐसे मामलों में आरोपी व्यक्ति संदेह का लाभ पाने का अधिकारी होता है। जस्टिस रेवती ने महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक गांव के निवासी सुनील शेल्के की याचिका पर फैसला करते हुए यह टिप्पणियां की।
जस्टिस रेवती ने इस मामले में पिछले महीने फैसला दिया था, लेकिन फैसले का विस्तृत ब्योरा इस सप्ताह की शुरुआत में सार्वजनिक किया गया। शेल्के को 2014 में एक स्थानीय अदालत ने दुष्कर्म के आरोप में दोषी घोषित किया था और सात साल कैद की सजा दी थी। शेल्के ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी।
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मार्च, 2009 की है घटना
शेल्के की याचिका के मुताबिक, दुष्कर्म की घटना मार्च, 2009 में घटी थी। पीड़िता ने बयान में कहा था कि जब उसके गांव में हर कोई होली का त्योहार मनाने में मशगूल था, तो शेल्के और उसके तीन दोस्त उसे खींचकर नदी किनारे ले गए और वहां उसके साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता के मुताबिक, अगली सुबह हालत सुधरने पर उसने घर लौटकर परिजनों को सारी जानकारी दी थी।
हालांकि मुकदमा एक महीने बाद दर्ज कराया गया था। जांच के दौरान सामने आया था कि दुष्कर्म की घटना से पहले शेल्के और पीड़िता की शादी तय हो चुकी थी। शेल्के का दावा था कि किन्हीं कारणों से शादी टूटने का बदला लेने के लिए उसके ऊपर यह आरोप लगाए गए थे।
हाईकोर्ट ने बरकरार रखी नाबालिग से दुष्कर्म पर मिली सजा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म करने और जबरन वेश्यावृत्ति कराने के आरोप में निचली अदालत से 28 वर्षीय आरोपी युवक को दी गई 10 साल की सजा बरकरार रखी है। जस्टिस साधना जाधव ने आरोपी अराबली अशरफ मुल्ला, निवासी पश्चिम बंगाल की तरफ से दाखिल याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उसकी हरकत ने 15 वर्षीय पीड़िता की जिंदगी बरबाद कर दी। मुल्ला को मार्च, 2015 में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था।
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जस्टिस रेवती मोहिते-देरे ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता के बयान को पूरी तरह अकाट्य और विश्वसनीय होना चाहिए। जस्टिस रेवती ने आगे कहा, यदि पीड़िता का बयान ‘विश्वसनीय’ नहीं लगता, तो ऐसे मामलों में आरोपी व्यक्ति संदेह का लाभ पाने का अधिकारी होता है। जस्टिस रेवती ने महाराष्ट्र के ठाणे जिले के एक गांव के निवासी सुनील शेल्के की याचिका पर फैसला करते हुए यह टिप्पणियां की।
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जस्टिस रेवती ने इस मामले में पिछले महीने फैसला दिया था, लेकिन फैसले का विस्तृत ब्योरा इस सप्ताह की शुरुआत में सार्वजनिक किया गया। शेल्के को 2014 में एक स्थानीय अदालत ने दुष्कर्म के आरोप में दोषी घोषित किया था और सात साल कैद की सजा दी थी। शेल्के ने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी।
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मार्च, 2009 की है घटना
शेल्के की याचिका के मुताबिक, दुष्कर्म की घटना मार्च, 2009 में घटी थी। पीड़िता ने बयान में कहा था कि जब उसके गांव में हर कोई होली का त्योहार मनाने में मशगूल था, तो शेल्के और उसके तीन दोस्त उसे खींचकर नदी किनारे ले गए और वहां उसके साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता के मुताबिक, अगली सुबह हालत सुधरने पर उसने घर लौटकर परिजनों को सारी जानकारी दी थी।
हालांकि मुकदमा एक महीने बाद दर्ज कराया गया था। जांच के दौरान सामने आया था कि दुष्कर्म की घटना से पहले शेल्के और पीड़िता की शादी तय हो चुकी थी। शेल्के का दावा था कि किन्हीं कारणों से शादी टूटने का बदला लेने के लिए उसके ऊपर यह आरोप लगाए गए थे।
हाईकोर्ट ने बरकरार रखी नाबालिग से दुष्कर्म पर मिली सजा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक नाबालिग बच्ची से दुष्कर्म करने और जबरन वेश्यावृत्ति कराने के आरोप में निचली अदालत से 28 वर्षीय आरोपी युवक को दी गई 10 साल की सजा बरकरार रखी है। जस्टिस साधना जाधव ने आरोपी अराबली अशरफ मुल्ला, निवासी पश्चिम बंगाल की तरफ से दाखिल याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि उसकी हरकत ने 15 वर्षीय पीड़िता की जिंदगी बरबाद कर दी। मुल्ला को मार्च, 2015 में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराया था।