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BMC Election Results: साथ आए ठाकरे बंधु, फिर क्यों रह गए जीत से दूर? गठबंधन को पारंपरिक गढ़ों में मिली बढ़त
Sat, 17 Jan 2026 12:03 AM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 17 Jan 2026 12:03 AM IST
सार
BMC Election Results: शिवसेना (यूबीटी) और मनसे का गठबंधन बीएमसी में जीत से दूर रहा, लेकिन मुंबई के मराठी बहुल इलाकों में अपनी पकड़ बचाने में कामयाब रहा। सवाल यह है कि जब ठाकरे परिवार साथ आया, तो असर सिर्फ कुछ इलाकों तक ही क्यों सीमित रहा? प्रचार की कमी, कम रैलियां और गलत सीट बंटवारा इसकी बड़ी वजह मानी जा रही है। पढ़ें रिपोर्ट-
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उद्धव राज ठाकरे
- फोटो : PTI
विस्तार
शिवसेना (उद्धव गुट) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के बीच हुआ रणनीतिक गठबंधन ठाकरे परिवार को बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) जीतने में भले ही मदद न कर सका, लेकिन इस समझौते ने उनके पारंपरिक गढ़ों को बचाए रखने में मदद की। इस गठबंधन ने मराठी भाषी इलाकों में अच्छी बढ़त बनाई। इनमें मुंबई के पुराने हिस्से (द्वीप शहर) में माहिम, सिवरी और वर्ली विधानसभा क्षेत्रों के तहत आने वाले वार्ड, साथ ही पूर्व में स्थित उपनगर भांडुप और विक्रोली शामिल हैं।
किस पार्टी की कितनी सीटों पर बढ़त रही?
ये भी पढ़ें: क्या बीएमसी में बहुमत जुटा पाएगी भाजपा+?: 110-114 के बीच में फंसी सीटें, सत्ता के लिए करनी पड़ सकती है मशक्कत
कहां गठबंधन का असर नहीं दिखा?
देश की सबसे बड़ी और सबसे अमीर 227 सदस्यीय नगर निकाय के लिए चुनाव गुरुवार को हुए थे और शुक्रवार को मतगणना की गई। हालांकि यह गठबंधन ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, मीरा-भायंदर, भिवंडी-निजामपुर, उल्हासनगर, नवी मुंबई, वसई-विरार और पनवेल में कोई खास असर नहीं दिखा सका। ये सभी शहर मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) का हिस्सा हैं, जो देश के सबसे अधिक शहरीकृत क्षेत्रों में से एक है।कुल 29 नगर निगमों के लिए चुनाव हुए। यह गठबंधन नासिक और पुणे जैसे शहरों में भी कोई असर नहीं डाल सका।
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उद्धव और राज ठाकरे साथ क्यों आए?
2024 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे ने नगर निकाय चुनावों के लिए साथ आने का फैसला किया। उन्होंने 'मराठी मानुष' और महाराष्ट्र के हित के नाम पर अपनी 20 साल पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को खत्म किया।
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चुनाव प्रचार में कहां चूक हुई?
राज्य विधानसभा में शिवसेना (यूबीटी) को 20 सीटें मिली थीं, जबकि मनसे का खाता नहीं खुल पाया था। शिवसेना पर किताब लिख चुके राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश अकोलकर ने कहा कि चुनाव से पहले ठाकरे बंधुओं ने पर्याप्त प्रचार नहीं किया, जिससे गठबंधन के लिए समर्थन जुटाया जा सके। उन्होंने कहा कि दोनों भाइयों ने काफी अहम समय गंवा दिया। वे पांच जुलाई 2025 को पहली बार साथ आए थे, जब भाजपा नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने कक्षा एक से पांच तक के छात्रों के लिए तीन-भाषा के फार्मूले से जुड़ा विवादित सरकारी आदेश वापस ले लिया था और हिंदी को 'अनिवार्य' बनाने का फैसला किया था।
संयुक्त रैलियों का पूरा फायदा क्यों नहीं उठा पाए?
अकोलकर ने कहा, दोनों चचेरे भाइयों के साथ आने से राजनीतिक हलकों में चर्चा तो खूब हुई, लेकिन वे इसका फायदा नहीं उठा सके। वरिष्ठ विश्लेषक ने बताया कि ठाकरे बंधुओं ने कई सभाएं करने की घोषणा के बावजूद मुंबई, नासिक और ठाणे में केवल तीन संयुक्त रैलियां कीं।
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किस पार्टी की कितनी सीटों पर बढ़त रही?
- शुक्रवार शाम साढ़े सात बजे बृहन्मुंबई महानगरपालिका की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक भाजपा 67 सीटों पर आगे थी।
- शिवसेना 18 सीटों पर आगे रही।
- शिवसेना (यूबीटी) 55 सीटों पर आगे थी।
- मनसे पांच सीटों पर आगे रही।
- कांग्रेस 14 सीटों पर आगे थी।
- एआईएमआईएम सात सीटों पर आगे रही।
- एनसीपी दो और एनसीपी (शरद पवार गुट) एक सीट पर आगे थी।
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कहां गठबंधन का असर नहीं दिखा?
देश की सबसे बड़ी और सबसे अमीर 227 सदस्यीय नगर निकाय के लिए चुनाव गुरुवार को हुए थे और शुक्रवार को मतगणना की गई। हालांकि यह गठबंधन ठाणे, कल्याण-डोंबिवली, मीरा-भायंदर, भिवंडी-निजामपुर, उल्हासनगर, नवी मुंबई, वसई-विरार और पनवेल में कोई खास असर नहीं दिखा सका। ये सभी शहर मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) का हिस्सा हैं, जो देश के सबसे अधिक शहरीकृत क्षेत्रों में से एक है।कुल 29 नगर निगमों के लिए चुनाव हुए। यह गठबंधन नासिक और पुणे जैसे शहरों में भी कोई असर नहीं डाल सका।
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उद्धव और राज ठाकरे साथ क्यों आए?
2024 के विधानसभा चुनावों में हार के बाद शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और मनसे अध्यक्ष राज ठाकरे ने नगर निकाय चुनावों के लिए साथ आने का फैसला किया। उन्होंने 'मराठी मानुष' और महाराष्ट्र के हित के नाम पर अपनी 20 साल पुरानी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता को खत्म किया।
ये भी पढ़ें: बंगाल में निपाह वायरस से संक्रमित दो नर्सों में से एक की हालत ठीक, दूसरी गंभीर; निगरानी में सरकार
चुनाव प्रचार में कहां चूक हुई?
राज्य विधानसभा में शिवसेना (यूबीटी) को 20 सीटें मिली थीं, जबकि मनसे का खाता नहीं खुल पाया था। शिवसेना पर किताब लिख चुके राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश अकोलकर ने कहा कि चुनाव से पहले ठाकरे बंधुओं ने पर्याप्त प्रचार नहीं किया, जिससे गठबंधन के लिए समर्थन जुटाया जा सके। उन्होंने कहा कि दोनों भाइयों ने काफी अहम समय गंवा दिया। वे पांच जुलाई 2025 को पहली बार साथ आए थे, जब भाजपा नेतृत्व वाली महायुति सरकार ने कक्षा एक से पांच तक के छात्रों के लिए तीन-भाषा के फार्मूले से जुड़ा विवादित सरकारी आदेश वापस ले लिया था और हिंदी को 'अनिवार्य' बनाने का फैसला किया था।
संयुक्त रैलियों का पूरा फायदा क्यों नहीं उठा पाए?
अकोलकर ने कहा, दोनों चचेरे भाइयों के साथ आने से राजनीतिक हलकों में चर्चा तो खूब हुई, लेकिन वे इसका फायदा नहीं उठा सके। वरिष्ठ विश्लेषक ने बताया कि ठाकरे बंधुओं ने कई सभाएं करने की घोषणा के बावजूद मुंबई, नासिक और ठाणे में केवल तीन संयुक्त रैलियां कीं।
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