जम्मू-कश्मीर में भाजपा को 'बेमेल गठबंधन' से बाहर निकलने के लिए था 'सही वक्त' का इंतजार
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आखिरकार जम्मू-कश्मीर में 'बेमेल गठजोड़' वाली सरकार साढ़े तीन साल बाद गिर ही गई। अभी इस सरकार को ढाई साल और चलना था, लेकिन 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी ने 40 महीने बाद 'सही वक्त' पर गठबंधन से बाहर आने का फैसला कर लिया। राइजिंग कश्मीर अखबार के संपादक शुजात बुखारी की हत्या और सेना के जवान औरंगजेब की शहादत ने बीजेपी को गठबंधन से बाहर आने का मौका दे दिया, जिसकी वह काफी वक्त से तलाश कर रही थी। घाटी में जब से यह बेमेल गठबंधन वाली सरकार बनी थी, तभी से दोनों पार्टियों के बीच तमाम मुद्दों को लेकर टकराव देखने को मिल रहा था।
मार्च में दरार की असल शुरुआत
भाजपा के वरिष्ठ नेता के मुताबिक इस गठबंधन में असली दरार मार्च के महीने में पड़नी शुरू हुई। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने जब वित्त मंत्री हसीब द्राबू को अपनी कैबिनेट से बर्खास्त करने के फैसला किया, तो बीजेपी इसके विरोध में खड़ी हुई। क्योंकि द्राबू ही ऐसे शख्स थे, जिन्होंने मार्च 2015 में पीडीपी और बीजेपी को मिलाने में अहम भूमिका निभाई थी और कई मुद्दों पर वह जम्मू-कश्मीर सरकार और केंद्र के बीच सेतु का काम करते थे।
यहां तक कि द्राबू ने केंद्र के जीएसटी जैसे अहम फैसलों को लागू करने में राह आसान बनाई थी, जिसमें उनकी भूमिका प्रशंसनीय थी। लेकिन द्राबू की एक टिप्पणी से पूरी पीडीपी बौखला गई और उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने का फैसला ले लिया। द्राबू ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि राज्य को संघर्षग्रस्त प्रदेश या राजनीतिक समस्या के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक मुद्दों वाले एक समाज के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा था कि लोगों को राज्य की स्थिति की शुरुआत और प्रवृति के बारे में आत्मचिंतन करना चाहिए और विचार करना चाहिए कि इसका हल कैसे हो सकता है और यह राष्ट्रीय स्तर पर भी होना चाहिए।
आफ्सपा बना विवाद का कारण
सूत्रों के मुताबिक 40 महीने पुरानी इस गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों को विशेष शक्तियां प्रदान करने वाले कानून (आफ्सपा) को हटाने की मांग करना और रमजान बाद पीडीपी का अलगावादियों से बातचीत का वादा करना जैसे मुद्दे भी बीजेपी के लिए काफी कष्टदायी साबित हो रहे थे। वहीं सेना ने जब भी पत्थरबाजों के प्रति सख्त रवैया अपनाया, तो महबूबा मुफ्ती ने उन्हें 'भटके हुए युवा' करार दिया। जिसके चलते पार्टी के कैडर को इस बेमेल गठबंधन से छटपटाहट हो रही थी।
पाक से बातचीत के पक्ष में महबूबा
सूत्र बताते हैं कि सरकार ने रमजान के दौरान सीजफायर का फैसला महबूबा के दबाव में ही लिया, जबकि पूरी पार्टी सीजफायर के विरोध में थी। पार्टी को इस बात का पूरा अंदाजा था आतंकी अपनी हरकतों से बाज नहीं आएंगे और नागरिकों और सुरक्षा बलों पर हमले जारी रहेंगे। सूत्रों के मुताबिक महबूबा चाहती थीं कि मौजूदा सीजफायर को जारी रखा जाए जबकि केंद्र सरकार केंद्र सरकार कश्मीर के बिगड़ते माहौल और रमजान के दौरान घटित हिंसक घटनाओं के चलते इसके खिलाफ थी। वहीं महबूबा अलगाववादियों के प्रति नरम रुख अपनाते हुए बातचीत करने पर जोर दे रही थीं। वहीं बीते शनिवार को ईद के बाद केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह कड़ा आतंकियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा था कि जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों को सैन्य अभियान ऑपरेशन ऑलआउट फिर से शुरू करने का निर्देश दिया जा चुका है।
बढ़ सकता है राज्यपाल का कार्यकाल
वरिष्ठ पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस गठबंधन के खत्म होने से सरकार को बड़ी राहत की सांस मिली है। सूत्रों का कहना है कि जबसे गठबंधन की सरकार बनी थी, तभी से वह लगातार कई वजहों से लगातार विपक्ष के निशाने पर थी और विपक्ष इसे सरकार की नाकामियां बता रहा था। सूत्रों के मुताबिक 2019 तक अगर ये गठबंधन बरकरार रहता, तो विपक्ष के हाथ में मुद्दा होता कि कैसे अलगाववादियों के प्रति नरम दिल रुख रखने वाली पीडीपी के साथ मिल कर उन्होंने सरकार बनाई और सैकड़ों जवानों की शहादत का कारण बनी। सूत्रों का कहना है कि गठबंधन जारी रहने से विपक्ष के पास एक मजबूत हथियार होता कि कैसे भाजपा केवल सरकार बनाने के लिए किसी भी विचारधारा की पार्टी से समझौता कर लेती है। लेकिन अब गठबंधन तोड़ कर भाजपा ने यह साबित कर दिया कि आतंकियों के खात्मे के मामले में वो किसी से समझौता नहीं कर सकती।
2019 में हो सकते हैं जम्मू-कश्मीर विधानसभा और लोकसभा के एकसाथ चुनाव
सूत्रों का कहना है कि गठबंधन टूटने के बाद से एक साल तक राज्य में राज्यपाल शासन लगा रह सकता है और यह वक्त ही सरकार के लिए टर्नआउट साबित होगा। सूत्रों का कहना है कि अभी सरकार का कार्यकाल ढाई साल का और बचा था लेकिन अब सरकार सालभर से पहले राज्य में चुनाव कराने की पक्षधर नहीं है। सूत्र बताते हैं कि आने वाले वक्त में राज्य में आतंकियों के खिलाफ चल रहे ऑपरेशन ऑलआउट में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।
सूत्रों के मुताबिक आर्टिकल 370 पर किया वायदा भी सरकार के लिए चुनौती बन रहा था। भाजपा ने वायदा किया था कि सरकार में आते ही वह इस धारा को खत्म कर देगी। गठबंधन सरकार बनने के बाद भी भाजपा इस वायदे को पूरा नहीं कर पाई और पार्टी कैडर में इसे लेकर काफी नाराजगी जाहिर की जा रही थी। सूत्र बताते हैं कि पीडीपी इसके खिलाफ थी और दोनों में धारा 370 को हटाने को लेकर सहमति बनना नामुमकिन था। पार्टी के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि अगर पार्टी को बहुमत मिलता तो वह अपने वायदे को जरूर पूरा करती।